स्टेटस का चक्कर (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Aug 23, 2025

गोस्वामी जी ने जब सरकारी दफ़्तर से सेवानिवृत्ति ली तो उनका जीवन एक साधारण, व्यवस्थित दिनचर्या का आदर्श नमूना था। सुबह छह बजे की चाय, फिर अख़बार, दोपहर में पत्नी से हल्की-फुल्की बहस, और शाम को मोहल्ले की बेंच पर बैठकर दुनिया भर की समस्याओं पर ‘अंतिम निर्णय’ देना। जीवन का हर पृष्ठ, मानो, तयशुदा क़ानूनों के अनुसार पलटा जा रहा था।

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अब गोस्वामी जी का जीवन, ‘लाइक’ की खेती में बदल गया था। उनका दार्शनिक मन यह समझने में लगा था कि आख़िर किस प्रकार की पोस्ट पर ज़्यादा ‘फसल’ उगती है। उन्होंने पाया कि जो तस्वीर वे पूरे मन से लेते हैं, जैसे कि किसी पुरानी किताब की, उस पर इक्का-दुक्का लाइक आते हैं। मगर, अगर वे अधखाए समोसे की तस्वीर खींचकर, “अहो! समोसा!” लिख दें, तो 'फसल' दोगुनी हो जाती है। यह एक ऐसा वैज्ञानिक विरोधाभास था, जिसने उनकी जीवनभर की समझ को चुनौती दी। यह सिद्ध हुआ कि ज्ञान और कला की तुलना में, पेट और बाज़ार का दर्शन अधिक प्रभावी है। उन्होंने इस नए विज्ञान को आत्मसात कर लिया और हर पोस्ट के साथ ‘#’ नामक एक धार्मिक मंत्र का जाप करने लगे, जिसे लगाने से, उनकी पोस्ट, बिना किसी कारण, हज़ारों लोगों की पवित्र दृष्टि तक पहुँच जाती थी।

कुछ ही महीनों में, गोस्वामी जी की सारी दुनिया स्क्रीन के भीतर समा गई थी। सुबह की चाय, अख़बार का सब्ज़ी बेचना, पत्नी की डाँट, सब अब ‘कंटेंट’ था। पत्नी अगर किसी बात पर नाराज़ होकर ऊँची आवाज़ में बोलती तो वे तुरंत कैमरा निकालकर रिकॉर्ड करने लगते। उनका तर्क था, “अगर कोई फ़िल्मकार परिवार की समस्याओं पर ‘सीरियल’ बना सकता है, तो हम अपनी समस्याओं का ‘रियल’ क्यों नहीं बना सकते?” उनके लिए अब परिवार एक परिवार नहीं, बल्कि एक दर्शक-समूह था, और घर एक ‘शूटिंग लोकेशन’। वे अपने हर अनुभव को कैमरे की आँख से देखने लगे थे। जीना कम, और जीकर दूसरों को दिखाना ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया था।

सोशल मीडिया का सामाजिक नियम-शास्त्र, किसी भी सरकारी विभाग से ज़्यादा जटिल निकला। यहाँ ‘फॉलो’ का अर्थ था 'अनुदान', और ‘लाइक’ का अर्थ था 'मंज़ूरी'। यदि कोई आपको फॉलो करता है तो यह आवश्यक था कि आप भी उसे फॉलो करें, अन्यथा ‘संबंध-विच्छेद’ का नोटिस आ सकता था। सबसे बड़ा संकट था ‘नकारात्मक टिप्पणी’ का। किसी अजनबी ने एक बार लिख दिया, “अंकल, फ़ोटो क्लियर नहीं है।” गोस्वामी जी के लिए यह केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक अपमान था, एक ऐसी चोट जिसका घाव कोई सरकारी फाइल भी नहीं दे सकती थी। उन्होंने तुरंत साइबर क़ानून की किताबें पढ़ना शुरू कर दिया, ताकि इस अपराधी को खोज सकें।

धीरे-धीरे, उनके ‘फॉलोवर्स’ की संख्या बढ़ती गई। सौ से हज़ार, हज़ार से दस हज़ार। उन्हें ‘इन्फ़्लुएंसर’ कहा जाने लगा। अब उन्हें कई कंपनियों से ‘सहयोग’ के प्रस्ताव आने लगे, जिसमें एक कंपनी ने उन्हें मुफ़्त में एक कलम देने का प्रस्ताव रखा, बशर्ते वे उसकी तारीफ़ करें। गोस्वामी जी का सीना गर्व से फूल गया। उन्हें लगा कि वे अब केवल एक सेवानिवृत्त बाबू नहीं, बल्कि देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। वे रात-दिन अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा में लगे रहते, और इस बात का ध्यान रखते कि कोई भी उनकी ‘ऑनलाइन छवि’ पर उँगली न उठा पाए।

एक दिन, पूरे शहर का इंटरनेट अचानक बंद हो गया। गोस्वामी जी के हाथ से मानो उनका जीवन-सार छिन गया। स्क्रीन काली थी, और कोई नोटिफिकेशन नहीं आ रही थी। उन्हें ऐसा महसूस हुआ, जैसे उनका अस्तित्व ही मिट गया हो। उन्होंने निराशा से चारों ओर देखा। पत्नी बैठी हुई ऊन का गोला बना रही थी, दीवार पर लगी घड़ी की टिकटिक सुनाई दे रही थी, और कमरे में एक अजीब-सी ख़ामोशी थी। उन्हें लगा, ये सब कितना बेमानी है। जब तक कोई इसे ‘लाइक’ नहीं करता, तब तक इसका क्या मूल्य? जब इंटरनेट वापस आया, तो उन्हें यह सब कुछ, एक पल में, निरर्थक लगा, और वे तुरंत अपने ‘डिजिटल जीवन’ में लौट गए।

आज गोस्वामी जी अपने क्षेत्र के एक ‘सफल’ व्यक्ति हैं। उनके कई हज़ार अनुयायी हैं, और वे हर सुबह ‘सुबह मुबारक’ का स्टेटस अपडेट करते हैं। उनके पास अब हज़ारों डिजिटल मित्र हैं, जिनसे वे कभी मिले नहीं, और कुछ ही वास्तविक मित्र हैं, जिनसे वे अब बात नहीं करते। उनका जीवन, एक ऐसे मंच पर एक नाटक बन गया है, जो हकीक़त में मौजूद नहीं है। और इस नाटक में वे इतनी शिद्दत से लगे हुए हैं कि उन्हें यह याद ही नहीं कि वे असली जीवन में कौन थे, और क्या कर रहे थे।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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