By ललित गर्ग | Oct 15, 2026
किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी संसदों में पारित कानूनों से कम और उसके शिक्षण संस्थानों में गढ़े जा रहे विद्यार्थियों के चरित्र से अधिक निर्धारित होता है। छात्र केवल किसी देश की युवा आबादी नहीं, बल्कि उसकी संभावनाओं, विचारों, मूल्यों और विकास की जीवंत पूंजी होते हैं। उनकी आंखों में पलते सपने राष्ट्र की तकदीर लिखते हैं और उनके हाथों में संवरता भविष्य सभ्यता की दिशा तय करता है। किंतु जब यही हाथ सृजन के औजारों के बजाय विध्वंस के हथियार उठाने लगें, जब ज्ञान की जिज्ञासा हिंसा की उत्तेजना में बदलने लगे और जब शिक्षा के मंदिरों में अनुशासन की जगह अराजकता पनपने लगे, तब यह केवल छात्र जीवन का संकट नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की चेतना के लिए खतरे की घंटी है। विश्व छात्र दिवस इसी संदर्भ में आत्ममंथन का अवसर है। प्रतिवर्ष 15 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व छात्र दिवस भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और ‘मिसाइल मैन’ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती को समर्पित है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस दिवस को आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किए जाने का दावा नहीं करना चाहिए, फिर भी भारत में यह दिन व्यापक रूप से कलाम के विद्यार्थी-केंद्रित विचारों, शिक्षा के प्रति समर्पण और युवाओं के स्वप्नशील व्यक्तित्व के सम्मान के रूप में मनाया जाता है। डॉ. कलाम के लिए विद्यार्थी केवल परीक्षाओं में अंक प्राप्त करने वाले छात्र नहीं थे, बल्कि वे ऐसे स्वप्नदृष्टा थे, जिनके भीतर देश की तस्वीर बदलने की क्षमता थी। वे बच्चों के बीच जाते, उनसे संवाद करते, उनके प्रश्नों को प्रोत्साहित करते और उन्हें बड़े सपने देखने की प्रेरणा देते थे। उनका विश्वास था कि सपने वे नहीं होते जो नींद में आते हैं, बल्कि वे होते हैं जो व्यक्ति को सोने नहीं देते। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि साधारण परिस्थितियों में जन्मा व्यक्ति भी असाधारण संकल्प, ज्ञान और परिश्रम से इतिहास रच सकता है।
इसे भी पढ़ें: Education और Innovation को बढ़ावा देने के लिए 15 October को मनाते हैं World Students Day
छात्र आंदोलनों का इतिहास बताता है कि युवाओं की आवाज ने अनेक बार सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक अधिकारों और जनहित के प्रश्नों को नई धार दी है। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, व्यवस्था से जवाबदेही मांगना और शिक्षा संबंधी समस्याओं पर संगठित होना छात्र जीवन का सकारात्मक पक्ष है। लेकिन आंदोलन और अराजकता के बीच एक महीन, किंतु निर्णायक रेखा होती है। जब तर्क की जगह ताव, संवाद की जगह टकराव और विरोध की जगह हिंसा ले लेती है, तब उद्देश्य पीछे छूट जाता है और अहंकार आगे आ जाता है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार अनिवार्य है, लेकिन असहमति के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, शिक्षकों का अपमान करना अथवा दूसरे विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित करना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। आग लगाकर उजाला नहीं किया जा सकता और शाख काटकर वृक्ष को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। इस स्थिति के लिए केवल विद्यार्थियों को दोष देना भी समस्या का सरलीकरण होगा। परिवारों में संवाद का अभाव, शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण, रोजगार को लेकर अनिश्चितता, मानसिक दबाव, सोशल मीडिया पर आक्रामकता का महिमामंडन, नशे की आसान उपलब्धता और छात्र राजनीति में बाहरी स्वार्थों का हस्तक्षेप भी इस संकट को गहरा सकते हैं। जब युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा नहीं मिलती, तब वह कभी निराशा, कभी आक्रोश और कभी अनुकरण की प्रवृत्ति में बहने लगती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है, यह लोकोक्ति हर परिस्थिति में सत्य नहीं, लेकिन इतना अवश्य है कि उद्देश्यहीन ऊर्जा भटकाव का कारण बन सकती है। इसलिए विद्यार्थियों को केवल उपदेश नहीं, अवसर, मार्गदर्शन, विश्वास और सार्थक भागीदारी भी चाहिए।
यहां जैन दर्शन की अहिंसा, अनेकांत और आत्मानुशासन की शिक्षाएं विशेष प्रासंगिक हो जाती हैं। जैन परंपरा में अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार में भी संयम रखना है। अनेकांतवाद सिखाता है कि सत्य को समझने के लिए दूसरे पक्ष को सुनना और अपने विचारों की सीमाओं को स्वीकार करना आवश्यक है। यदि इन मूल्यों को छात्र जीवन में व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए, तो मतभेद शत्रुता में नहीं बदलेंगे और विरोध संवाद का माध्यम बनेगा। विद्यार्थी यह समझ सकेंगे कि साहस का अर्थ किसी को पराजित करना नहीं, बल्कि अपने क्रोध, आवेग और अहंकार पर विजय पाना है। विश्व छात्र दिवस पर डॉ. कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित संकीर्णता से निकालकर जीवन निर्माण का माध्यम बनाएंगे। विद्यालयों और महाविद्यालयों में पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, खेलों, कला, साहित्य, सामाजिक सेवा और नवाचार को प्रोत्साहित करना होगा। नशे के विरुद्ध जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य पर खुला संवाद, शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों में विश्वास और छात्र राजनीति में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का विकास भी आवश्यक है। विद्यार्थियों को स्थानीय समस्याओं के समाधान, पर्यावरण संरक्षण, वंचित बच्चों की शिक्षा और सामुदायिक सेवा से जोड़कर उनकी ऊर्जा को सकारात्मक कर्मभूमि दी जा सकती है। साथ ही शिक्षण संस्थानों को भयमुक्त, न्यायपूर्ण और उत्तरदायी वातावरण उपलब्ध कराना होगा, क्योंकि अनुशासन का अर्थ दमन नहीं और स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है।
डॉ. कलाम का विद्यार्थी-दर्शन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक नेता, सरकार या वैज्ञानिक का अकेला अभियान नहीं, बल्कि करोड़ों जाग्रत मस्तिष्कों की सामूहिक साधना है। आज के विद्यार्थी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रतियोगिता में आगे निकलना नहीं, बल्कि अपनी सफलता को सार्थक बनाना है। उसे यह तय करना होगा कि उसकी प्रतिभा समाज को जोड़ने में लगेगी या तोड़ने में, उसकी बुद्धि समाधान खोजेगी या संकट बढ़ाएगी और उसका साहस निर्माण का इतिहास लिखेगा या विनाश की कहानी। विश्व छात्र दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि युवा शक्ति को केवल नियंत्रित करने की नहीं, सही दिशा देने की आवश्यकता है। विद्यार्थियों के सपनों को पंख मिलें, उनकी जिज्ञासा को अवसर मिले और उनके चरित्र को नैतिक आधार मिले, तभी शिक्षा राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बनेगी। क्योंकि देश का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि उसके विद्यार्थी कितना जानते हैं, बल्कि इससे भी तय होता है कि वे अपने ज्ञान का उपयोग किसके लिए और किस उद्देश्य से करते हैं। डॉ. कलाम का भारत तभी साकार होगा, जब कक्षाओं से चरित्र, प्रयोगशालाओं से नवाचार, आंदोलनों से उत्तरदायित्व और युवाओं के संकल्पों से सृजन की नई संस्कृति जन्म लेगी। यही विश्व छात्र दिवस की सार्थकता है और यही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला।
- ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार