Subedaar Movie Review | अनिल कपूर का दमदार अभिनय, लेकिन कमजोर कहानी ने फीका किया फिल्म का असर

By रेनू तिवारी | Mar 05, 2026

प्राइम वीडियो की नई फिल्म 'सूबेदार', जिसका निर्देशन सुरेश त्रिवेणी (जलसा और तुम्हारी सुलु फेम) ने किया है, कागज पर एक बेहद प्रभावशाली और गहरी फिल्म लगती है। लेकिन पर्दे पर उतरते ही यह फिल्म कई सामाजिक मुद्दों, व्यक्तिगत त्रासदियों और हाई-ऑक्टेन एक्शन के बीच उलझकर रह जाती है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें विचार तो बहुत हैं, लेकिन किसी भी एक विचार को पनपने का पर्याप्त समय नहीं दिया गया है।


कहानी की पृष्ठभूमि और किरदार

फिल्म की कहानी एक छोटे शहर में सेट है जहाँ रेत माफिया (Sand Mafia) का आतंक है। यहाँ हमारी मुलाकात होती है सूबेदार मेजर आदित्य मौर्या (अनिल कपूर) से, जो सेना से रिटायर होकर घर लौटे हैं। मौर्या का किरदार गर्व और अपराधबोध (Guilt) के बीच झूल रहा है- वर्दी का गर्व, लेकिन परिवार को समय न दे पाने का पछतावा। उनकी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं हैं और वह अपनी बेटी श्यामा (राधिका मदान) के साथ टूटे हुए रिश्तों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ फिल्म का विलेन प्रिंस (आदित्य रावल) है, जो रेत माफिया की क्वीन बबली दीदी (मोना सिंह) का भाई है। प्रिंस एक बिगड़ैल, अहंकारी और हिंसक युवक है जो पूरे शहर को अपनी जागीर समझता है। जब एक अनुशासित पूर्व सैनिक का सामना एक सनकी अपराधी के अहंकार से होता है, तो संघर्ष की शुरुआत होती है।


बिखरी हुई पटकथा और उप-कहानियों का बोझ

'सूबेदार' की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी बिखरी हुई पटकथा है। फिल्म तय नहीं कर पाती कि उसे रिवेंज ड्रामा बनना है या माफिया थ्रिलर। यह एक साथ कई मोर्चों पर चलती है: पिता और बेटी के बीच का तनाव। कॉलेज लाइफ में होने वाली बदतमीजी और पितृसत्ता (Misogyny)। अवैध रेत खनन की कड़वी सच्चाई। दिक्कत यह है कि फिल्म इन सभी मुद्दों को उठाती तो है, लेकिन किसी पर भी इतनी गहराई से बात नहीं करती कि दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ सकें। सब कुछ 'चेकलिस्ट' टिक करने जैसा सतही लगता है।


सूबेदार: बिखरी हुई कहानी और बहुत सारे सबप्लॉट

सूबेदार के साथ सबसे बड़ी दिक्कत इसका टूटा-फूटा स्क्रीनप्ले है। फिल्म सिर्फ एक रिवेंज ड्रामा या माफिया थ्रिलर नहीं रहती; यह कई दूसरे ट्रैक्स को शामिल करने की कोशिश करती है। यह मौर्य और उसकी बेटी श्यामा के बीच के खराब रिश्ते को दिखाती है, जहाँ श्यामा अपने पिता की गैरमौजूदगी की वजह से कड़वाहट महसूस करती है। कहानी कॉलेज लाइफ में औरतों से नफ़रत और बुलीइंग जैसे गंभीर मुद्दों को भी छूती है। सैंड माफिया सबप्लॉट भारत में गैर-कानूनी माइनिंग की कड़वी सच्चाई और सत्ता में बैठे लोग कैसे पिछड़ों का शोषण करते हैं, इस पर रोशनी डालता है। दिक्कत यह है कि फिल्म इन सभी मुद्दों को उठाती है, लेकिन उनमें से किसी पर भी इतनी देर तक नहीं टिकती कि दर्शक उनसे इमोशनली जुड़ सकें। सब कुछ ऊपरी लगता है, जैसे चेकलिस्ट से बॉक्स टिक करना।


सूबेदार: कमज़ोर इमोशनल ट्रिगर और अजीब स्क्रीनप्ले चॉइस

जिन वजहों से मेन कॉन्फ्लिक्ट शुरू होता है, वे अक्सर कमज़ोर और अजीब लगती हैं। जैसे, सूबेदार मौर्य का गुस्सा तब चरम पर पहुँच जाता है जब उसकी पुरानी जीप खराब हो जाती है, यह गाड़ी उसकी गुज़र चुकी पत्नी के सपनों से जुड़ी है। इसी तरह, विलेन प्रिंस अपनी गुज़र चुकी माँ के गहनों से चाँदी से बनी रिवॉल्वर पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। ये सिंबॉलिक चीज़ें कहानी में इमोशनल गहराई जोड़ने के लिए होती हैं, लेकिन स्क्रीन पर, ये मतलब वाली मोटिवेशन के बजाय बचकानी ज़िद ज़्यादा लगती हैं। जब तक दर्शक इन चीज़ों का मतलब समझते हैं, तब तक फिल्म अगले एक्शन सीक्वेंस पर जा चुकी होती है।


सूबेदार: चैप्टर फॉर्मेट और टोनल इम्बैलेंस

कई मॉडर्न फिल्मों की तरह, सूबेदार अपनी कहानी को 'डर' या 'घाव' जैसे चैप्टर में बाँटता है। हालांकि यह टेक्निक धुरंधर जैसी फिल्मों में काम कर चुकी है, लेकिन यहां चैप्टर ड्रामैटिक सबहेडिंग जैसे लगते हैं जिनका असली कहानी से कोई खास कनेक्शन नहीं है। इसके अलावा, फिल्म का टोन भारी और दबाने वाला है। सारे टेंशन और टकराव के बीच, ह्यूमर या हल्के-फुल्के पलों की साफ कमी है। एक लंबी फिल्म में, दर्शकों को कुछ राहत देने के लिए कभी-कभी डायलॉग या सिचुएशनल हल्कापन ज़रूरी होता है, लेकिन यहां डायरेक्टर ने टोन को लगातार डार्क रखा है, जिससे आखिर तक एक्सपीरियंस थका देने वाला हो जाता है।


सूबेदार: सबसे मज़बूत पहलू – एक्टिंग

अगर फिल्म कुछ खास है, तो वह इसकी शानदार परफॉर्मेंस है। अनिल कपूर एक बार फिर साबित करते हैं कि 'गुस्सैल बूढ़े आदमी' के रोल के लिए इससे बेहतर कोई चॉइस नहीं है। वह सूबेदार में एक शांत इंटेंसिटी लाते हैं, एक ऐसा आदमी जिसके अंदर मिलिट्री डिसिप्लिन है और जो अपनी लिमिट से आगे धकेले जाने पर ही भड़कता है। एक्शन सीक्वेंस में उनकी फुर्ती और स्क्रीन प्रेजेंस यंग एक्टर्स के बराबर है। प्रिंस के रोल में आदित्य रावल ने अपनी पिछली फिल्म दलदल से बिल्कुल अलग परफॉर्मेंस दी है, जिसमें उन्होंने एक साइकोटिक विलेन का रोल बहुत अच्छे से निभाया है। राधिका मदान, कम रोल के बावजूद, अपने किरदार में ईमानदारी लाती हैं, हालांकि उनके रोल को और गहराई से दिखाया जा सकता था। सौरभ शुक्ला, मोना सिंह और फैजल मलिक जैसे पुराने एक्टर छोटी सी भूमिका में भी अपनी छाप छोड़ते हैं।


सूबेदार: नेक इरादे, अधूरा असर

सुरेश त्रिवेणी की सूबेदार कोई बुरी फिल्म नहीं है, लेकिन यह बहुत ज़्यादा 'भरी हुई' है। इसमें इतने सारे आइडिया ठूंस दिए गए हैं कि उनमें से कोई भी पूरी तरह से डेवलप नहीं हो पाया है। अनिल कपूर की शानदार परफॉर्मेंस और कुछ शानदार एक्शन सीक्वेंस के बावजूद, फिल्म एक एवरेज एक्सपीरियंस ही है। अगर स्क्रीनप्ले थोड़ा और फोकस्ड होता, सिर्फ दो या तीन मेन ट्रैक पर फोकस करता, तो यह एक यादगार क्लासिक बन सकती थी। जैसा है, यह एक ऐसी फिल्म है जिसे आप मुख्य रूप से अनिल कपूर की परफॉर्मेंस के लिए देखते हैं।

 

प्लेटफॉर्म: प्राइम वीडियो

निर्देशक: सुरेश त्रिवेणी

कलाकार: अनिल कपूर, राधिका मदान, आदित्य रावल, मोना सिंह

रेटिंग: 2.5/5 

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