By नीरज कुमार दुबे | Aug 31, 2026
कॉर्पोरेट जगत से इस समय चौंकाने वाली खबर आ रही है। एक तरफ करीब 22 हजार करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले महज 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना, दूसरी तरफ विपक्ष के तीखे हमले और इसे ‘‘99.97 प्रतिशत हेयरकट’’ बताकर उठाए जा रहे सवाल। लेकिन इसी बीच Essel Group के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्रा ने खुद सामने आकर इस पूरे मामले पर ऐसा पक्ष रखा है, जिसने बहस को एक नया मोड़ दे दिया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सुभाष चंद्रा ने वास्तव में हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लिया था? या फिर मामला व्यक्तिगत गारंटी का है, जिसे राजनीतिक बहस में सीधे ‘लोन माफी’ के रूप में पेश किया जा रहा है?
यहीं से इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल पैदा होता है कि क्या उधारकर्ता और गारंटर को एक ही तराजू पर तौला जा सकता है? डॉ. चंद्रा के मुताबिक, उधारकर्ता वह होता है जो पैसा लेता है, जबकि गारंटर वह व्यक्ति होता है जो ऋणदाता को भुगतान की गारंटी देता है। उनका दावा है कि कंपनियों ने विस्तार, रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों के लिए कर्ज लिया था, न कि उनके निजी इस्तेमाल के लिए।
हालांकि, डॉ. चंद्रा ने गारंटी देने के अपने फैसले को सही ठहराने की बजाय उसे अपनी “सबसे बड़ी गलती” तक बताया। उनका कहना था कि शायद यही निर्णय उन्हें आज इस स्थिति तक ले आया। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों और कंपनियों के लिए उन्होंने गारंटी दी, वे उनके परिचित थे। कुछ परिवार से जुड़े थे तो कुछ करीबी लोग थे।
लेकिन विवाद सिर्फ गारंटी और उधारकर्ता के अंतर तक सीमित नहीं है। NCLT ने 25 अगस्त को Insolvency and Bankruptcy Code के तहत डॉ. चंद्रा की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी, जिसके अनुसार 6.25 करोड़ रुपये लेनदारों को और 25 लाख रुपये दिवाला प्रक्रिया की लागत के लिए, यानी कुल 6.5 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। दूसरी ओर, स्वीकृत दावों की राशि 22,006.57 करोड़ रुपये बताई गई है। यही आंकड़ा विपक्ष के हमलों का आधार बन गया है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे लेकर तीखा हमला बोला और NCLT को लेकर कटाक्ष किया। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इसे साधारण ‘हेयरकट’ नहीं बल्कि ‘‘मुंडन’’ तक करार दिया। विपक्ष का सवाल है कि जब आम किसान छोटी रकम नहीं चुका पाता तो उसकी संपत्ति पर कार्रवाई होती है, तब इतने बड़े वित्तीय दावों के मामले में इतनी कम राशि वाली योजना कैसे स्वीकार की जा सकती है?
लेकिन डॉ. चंद्रा का जवाब अलग तस्वीर पेश करता है। उनका कहना है कि व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में उनके खिलाफ वास्तविक दावा 22 हजार करोड़ नहीं, बल्कि 3,992 करोड़ रुपये का है और इस राशि के लिए भी वह उधारकर्ता नहीं बल्कि व्यक्तिगत गारंटर हैं। उनके अनुसार, करीब 620 करोड़ रुपये के दावों का पहले ही निस्तारण हो चुका है, जबकि उधार लेने वाली इकाइयों ने 1,063 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान करने की पेशकश की है। उनका दावा यह भी है कि जिन कंपनियों के लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी, वे अब तक 43 हजार करोड़ रुपये चुका चुकी हैं और यदि कोई राशि शेष है तो उसके निपटान का आश्वासन दिया गया है।
तो फिर असली सवाल क्या है? क्या 22,006 करोड़ रुपये का आंकड़ा व्यक्तिगत देनदारी का है या उसमें उन दावों और गारंटियों का भी व्यापक मूल्यांकन शामिल है, जिन्हें लेकर कानूनी विवाद जारी है? क्या 3,992 करोड़ और 22,006 करोड़ के बीच का अंतर ही इस पूरे राजनीतिक विवाद की जड़ है? और क्या सोशल मीडिया तथा राजनीतिक बयानबाजी में ‘लोन लेने’ और ‘गारंटी देने’ के कानूनी अंतर को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?
उधर, मामला अब और दिलचस्प हो गया है क्योंकि LIC Housing Finance, HDFC Bank और Union Bank of India समेत कई लेनदारों ने NCLT की मंजूरी को चुनौती दी है। NCLAT ने इस चुनौती पर तत्काल सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। HDFC Bank समेत कई बैंकों ने योजना का विरोध किया है। ऐसे में अंतिम कानूनी तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं है।
वहीं, डॉ. चंद्रा ने यह भी स्पष्ट किया है कि बैंकों ने कोई लोन माफ नहीं किया है और जो भी वैध बकाया है, उसका निपटान किया जाएगा। उन्होंने अपनी निजी संपत्ति को लेकर भी कहा कि चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने कभी करीब 39 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी, जो अब लगभग 31 करोड़ रुपये है।
सबसे अहम बात यह है कि व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया के बावजूद डॉ. चंद्रा ने नया स्टार्टअप शुरू करने की योजना भी जाहिर की है। उनका कहना है कि वह कानून के दायरे में रहकर कुछ दोस्तों और साझेदारों के साथ नया उद्यम शुरू करेंगे।
बहरहाल, फिलहाल सुभाष चंद्रा का मामला केवल एक कारोबारी की दिवाला प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह अब कानून, बैंकिंग व्यवस्था, व्यक्तिगत गारंटी, कॉरपोरेट कर्ज और राजनीतिक आरोपों के बीच एक बड़ी बहस बन चुका है। सवाल बहुत हैं और जवाब अब NCLAT की सुनवाई तथा आगे की कानूनी प्रक्रिया से और स्पष्ट होंगे। लेकिन इतना तय है कि इस मामले को केवल “22 हजार करोड़ का कर्ज और 6.5 करोड़ की वापसी” कहकर समझना शायद पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। असली बहस इस बात पर है कि कर्ज किसने लिया, गारंटी किसने दी, वास्तविक व्यक्तिगत देनदारी कितनी है और कानून के तहत गारंटर की जिम्मेदारी आखिर कितनी दूर तक जाती है?