क्रांतिकारी सुखदेव के मन में बचपन से ही कूट-कूट कर भरी थी देशभक्ति की भावना

By अमृता गोस्वामी | May 15, 2021

भारत की पावन भूमि पर ऐसे अनेक वीरों ने जन्म लिया जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना भारत को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराने का संकल्प लिया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सुखदेव थापर का नाम इसी श्रेणी में आता है जिन्होंने अपने क्रांतिकारी जज्बे से अंग्रेजी हुकूमत को हिला कर रख दिया था। देशभक्ति की भावना उनके मन में बचपन से ही कूट-कूट कर भरी थी। 


सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को पंजाब के लुधियाना शहर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रामलाल थापर और माता का नाम रल्ली देवी था। छोटी उम्र ही सुखदेव के पिता का देहांत हो गया था। वे अपने चाचा के पास पले-बढ़े। सुखदेव के मन में बचपन से ही ब्रिटिश हुकूमत की ज्यादतियों के खिलाफ क्रांतिकारी विचार उठने लगे थे जिसके कारण पढाई में भी उनका ध्यान कम था उनके दिमाग में बस एक ही विचार चलता था देश को अंग्रजी दासता से मुक्त कराने का विचार। 


1909 में जब जालियांवाला बाग में अंधाधुंध गोलियां चलाकर अंग्रेजों ने भीषण नरसंहार किया था, तब सुखदेव 12 साल के रहे होंगे जब लाहौर के सभी प्रमुख इलाकों में मार्शल लॉ लगा दिया गया था। स्कूल, कॉलेज में छात्रों को अंग्रेज पुलिस अधिकारियों को सलाम करने को कहा जाता था। सुखदेव के स्कूल में कई अंग्रेज अधिकारी तैनात थे किन्तु सुखदेव ने पुलिस अधिकारियों को सैल्यूट करने से मना कर दिया जिसके बदले में उन्हें अंग्रेज अधिकारियों के बेंत भी खाने पड़े। भारत में जब साइमन कमीशन लाया गया तो उसका भी सुखदेव ने जमकर विरोध किया।

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लायलपुर के सनातन धर्म हाई स्कूल से दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुखदेव ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में एडमिशन लिया, इस दौरान उनकी मुलाकात भगत सिंह और राजगुरू से हुई जिनके मन में भी अंग्रेजो के खिलाफ क्रांतिकारी विचार सुलग रहे थे। वे सभी अच्छे मित्र बन गए। सुखदेव का मानना था कि भारत से तानाशाही ब्रिटिश हुकूमत को समाप्त करने में नौजवानों को आगे आना पड़ेगा इसके लिए उन्होंने भगतसिंह के साथ मिलकर लाहौर में ‘नौजवान भारत’ नाम से एक संगठन शुरू किया जिसने देश के युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए कई सभाएं कर उन्हें प्रेरित किया गया। उनकी टीम में राजगुरू, बट्टूकेश्वर दत्त, शिववर्मा, जयदेव कपूर, भगवती चरण गौरा जैसे कई क्रांतिकारियों ने एकजुट होकर बढ़-चढ़कर अंग्रजों के खिलाफ जंग लड़ी।  


सुखदेव महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय से बहुत प्रभावित थे, पंजाब में लाठीचार्ज के दौरान लाला लाजपत राय के निधन से उनका मन बहुत आहत हुआ जिसके बाद उन्होंने अपने मित्रों भगतसिंह, राजगुरू के साथ मिलकर इसका बदला लेने की ठानी। लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने योजना बनाकर 1928 में अंग्रेजी हुकूमत के एक पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना ने जहां ब्रिटिश साम्राज्य की नीव हिला दी वहीं भारत में इन क्रांतिकारियों के जज्बे की बहुत जय जयकार हुई।


सेंट्रल असेंबली दिल्ली में अंग्रेजो के लाए जा रहे दमनकारी कानून पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिसप्यूट बिल पेश होने के विरोध की योजना भी सुखदेव ने बनाई। इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए 8 अप्रैल, 1929 को सेंट्रल असेंबली में पर्चियां बांटी गईं और बम फेंका गया जिसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि अंग्रेजों के कुशासन के खिलाफ आजादी का बिगुल बजाना था, यह बम असेंबली की खाली जगह पर फेंका गया जिससे कोई हताहत न हो। इस घटना को भगतसिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने अंजाम दिया जिसके लिए उन्हें जेल में डाल दिया गया। बाद में बटुकेश्वर दत्त को काले पानी की सजा और भगतसिंह को सुखदेव और राजगुरू सहित सांडर्स हत्याकांड का दोषी ठहराकर फांसी की सजा दी गई।

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23 मार्च 1931 को सुखदेव थापर, भगत सिंह और शिवराम राजगुरु को लाहौर के जेल में फांसी दी गई। भारत की आजादी के लिए इन तीनो महान क्रांतिकारियों ने भारत की जयकार करते हुए हँसते-हँसते फांसी के फंदे को अपने गले लगाया। इस समय सुखदेव मात्र 24 साल के थे। 


फांसी पर जाते हुए ये तीनों वीर गर्व से देश के लिए गाना गा रहे थे - मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे बसंती चोला....


- अमृता गोस्वामी

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