सिनेमा के सुनहरे परदे और सुनहरे दौर का रोशन सितारा थीं सुलक्षणा पंडित

By कमल शर्मा | Nov 08, 2025

अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित का दाह संस्कार मुम्बई के उपनगर विलेपार्ले स्थित पवन हंस श्मशान में हुआ। विजेयता जी के बेटे अवितेश ने उन्हें मुखाग्नि दी। चिता पर लेटी उनकी शांत काया देखकर मुझे बहुत सी बातें फिल्म के फ़्लैश बैक तरह बीते हुए सालों में ले गयीं। मुझे उनसे न केवल एक लम्बी बातचीत करने का मौक़ा मिला था बल्कि, बाद में उनसे संगीतकार आदेश जी के घर पर भी मिलना हुआ जो सुलक्षणाजी के बहनोई थे और अभिनेत्री और गायिका विजेयता पंडित जी (श्रीवास्तव) के पति। सुलक्षणा जी को घर में सब मुन्नी बुलाया करते थे लेकिन वो अपने भाई बहनों के लिए माँ जैसी ही थीं और विजेयता जी भी पूरे समर्पण से उनकी देखभाल करती रहीं.....सच तो ये है कि अपनी आयु की सांध्य बेला में सुलक्षणा जी बच्चों जैसी ही हो गयीं थीं और छोटी बहन विजेयता ने माँ बनकर उनकी देखभाल की थी। कैसा सुन्दर मणि-कांचन संयोग रहा कि, दोनों प्रतिभाशाली बहनें हिंदी सिनेमा के उस दौर का भी प्रतिनिधित्व करती थीं जब कलाकार अभिनय के साथ-साथ गायन भी किया करते थे। बहन विजेयता जी की तरह सुलक्षणा जी भी न केवल एक बेहतरीन अभिनेत्री थीं बल्कि एक मंजी हुई गायिका भी, और संगीत के ये संस्कार उन्हें अपने पिता प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक संगीत आचार्य पंडित प्रताप नारायण पंडित और माँ कमला पंडित से मिले थे। हिंदी सिनेमा में अभिनय और संगीत के पंडित, पंडित परिवार का उल्लेखनीय और मूल्यवान योगदान है। सुलक्षणा जी के दादा मोतीराम जी और उनके भाई ज्योति राम जी सिद्ध गायक थे जिनका सम्बन्ध मेवाती घराने से था। पंडित प्रताप नारायण जी का जन्म हिसार (अब फतेहाबाद) ज़िले के पीलीमंदोरी में हुआ था। उनके 3 और भाई थे पंडित मणीराम जी, संगीत मार्तंड पंडित जसराज जी और राजाराम जी|राजाराम जी को संगीत में रूचि नहीं थी इसलिए वो गाँव में ही रहकर खेती-किसानी का काम करने लगे। पंडित प्रताप नारायण जी की कुल 9 संतानें हुईं जिनमें पहली दो संतानें जल्द ही चल बसीं, रह गयीं माया पंडित (माया एंडरसन), मंधीर पंडित, सुलक्षणा पंडित, संध्या पंडित, जतिन पंडित, विजेयता पंडित (अब विजेयता श्रीवास्तव) और ललित पंडित। इन सभी भाई-बहनों को आगे बढ़ाने में, इनकी परवरिश में सुलक्षणा जी का अमूल्य योगदान था।

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छोटी उम्र में ही उनके नन्हें कन्धों ने परिवार के आर्थिक बोझ को संभाल लिया था। संघर्ष जीवन का हिस्सा बन गया था। उन्होंने मंचों पर गाना शुरू किया। पार्श्व गायिका के रूप में पहली फिल्म मिली 13 बरस की उम्र में, 1967 में आयी तक़दीर में, गाना भारत रत्न लता जी के गीत के साथ गाया था। इस मासूम गीत के बोल थे सात समंदार पार से गुड़ियों के बाज़ार से अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना पर पप्पा जल्दी आ जाना और गुड़िया खेलने की उम्र में नन्ही गुड़िया सुलक्षणा, पप्पा के साथ अपनी और परिवार तक़दीर बदलने का संघर्ष कर रही थी। उन्होंने नामचीन गायक मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार के साथ फिल्म संगीत पर आधारित कई मंचीय कार्यक्रमों में भाग लिया। 1975 में उन्होंने नायिका के रूप में संजीव कुमार के साथ फिल्म उलझन में अभिनय किया और दर्शकों के दिलों पर अपनी बेमिसाल प्रतिभा के दस्तख़त कर दिए। इसके बाद उन्होंने इंडस्ट्री के लगभग हरेक नामचीन एक्टर के साथ काम किया उन्होंने जीतेंद्र के साथ संकोच और खंजर, संजीव कुमार के साथ बजरंग बली, राजेश खन्ना के साथ भोला भाला और बंधन कच्चे धागों का, विनोद खन्ना के साथ फिल्म हेरा फेरी और आरोप , शशि कपूर के साथ चंबल की कसम और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ अमीरी ग़रीबी में अभिनय  किया था...उनकी अन्य यादगार फ़िल्में हैं अपनापन,ख़ानदान,चेहरे पे चेहरा, धर्म कांटा और वक्त की दीवार।

अभिनेता संजीव कुमार से उनके भावनात्मक लगाव के बारे में बहुत कुछ लिखा गया जो भी हो फ़िल्म कलाकार भी तो इंसान ही हैं, किसी को चाहना और उसकी चाहत में पूरी ज़िन्दगी अकेले गुज़ार देना भी आसान नहीं...सबने उनकी कामयाबी, उनके संघर्ष के बारे में बहुत कुछ लिखा लेकिन, कोई उनके मन के उदासी भरे अकेलेपन को नहीं जान पाया। फ़िल्मी सितारों के बारे में बहुत कुछ मसालेदार बना दिया जाता है और सच्चाई जाने बिना बहुत कुछ लिख दिया जाता है लेकिन बहित कम लोग उनकी भीगी पलकें, उदासियाँ अकेलापन देख पाते हैं। मैं जब उनसे मिला तो उनको मैंने एक निष्पाप शिशु की तरह मासूम पाया। जिन्होंने  दुनिया भर का मनोरंजन किया, अपने बेमिसाल भारतीय सौन्दर्य से दिलों पर राज किया लेकिन अपने जज़्बात का; अपने ही दिल का इलाज न कर पायीं। और दिल ही दिल में अधूरी हसरतें और अरमान लिए इस दुनिया से किनारा कर लिया। पंडित जसराज जी की बेटी और सुलक्षणा जी की चचेरी बहन दुर्गा जसराज जी ने...अपने फेस बुक अकाउंट पर सुलक्षणा पंडित के लिए एक भावुक पोस्ट में लिखा है कि, हमारी सुलक्षणा जीजी सही अर्थों में परिवार की स्त्री शक्ति थीं।

- कमल शर्मा 

(भूतपूर्व वरिष्ठ उद्घोषक विविध भारती सेवा, मुंबई)

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