By अभिनय आकाश | Sep 15, 2026
क्या जिन अंग्रजों ने हम पर 200 साल राज किया उनका अपना देश अब टूट रहा है? ये सवाल इसलिए क्योंकि 14 सितंबर को वेल्स की राजधानी कैरेटिफ के एक होटल में यूनाइटेड किंगडम के चार देशों में से तीन के मुखिया एक मेज पर बैठते हैं और फिर ये तीनों एक कागज पर हस्ताक्षर करते हैं। जिसमें वो कहते हैं कि अपना भविष्य वो खुद तय करना चाहते हैं। ब्रिटेन कभी ये शब्द ही ताकत का दूसरा नाम हुआ करता था। वो साम्राज्य जिसके बारे में कहा जाता था कि इसका सूरज कभी नहीं डूबता। लेकिन आज ब्रिटेन महज एक दशक में सात प्रधानमंत्री को देख चुका है। लिज ट्रस सिर्फ 45 दिन टिकीं, बोरिस जॉनसन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, ऋषि सुनक दो साल से कम पद पर रहे और अबकी बार भी दो साल तक पूरे नहीं कर पाए। ऐसे अस्थिर दौर में देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है। अमीर लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं। सड़कों पर हिंसा आम हो चली है और लोग पूछ रहे हैं कि ये ब्रिटेन को क्या हो गया है? दरसअल, जिस इंग्लैंड को आप एक देश समझते हैं वो यूनाइटेड किंगडम के चार टुकड़ों (इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड, नॉर्दन आइलैंड) में से एक टुकड़ा है। ऐसे में सवाल ये है कि बाकी तीन टुकड़े यूके से क्यों अलग होना चाहते हैं? एक और दिलचस्प बात आपको बता दें कि दरअसल, आप अक्सर यूनाइटेड किंगडम के झंडे के प्रिंट वाला टी-शर्ट या बैग इस्तेमाल करते होंगे वो तीन झंडों को सिलकर बना है, लेकिन इसमें वेल्स है ही नहीं। फुटबॉल के मैदान पर चारों की टीम अलग-अलग खेलती है। लेकिन पासपोर्ट सभी का एक है। 2014 में स्कॉटलैंड ने अपनी जनता से वोट करवाया था, तब 100 में से 55% लोगों ने कहा कि हम यूनाइटेड किंगडम के साथ रहेंगे। 2022 में यूके की सबसे बड़ी अदालत ने कह दिया कि दोबारा वोट करवाना है तो बगैर लंदन की इजाजत के बगैर नहीं होगा। वेल्स के मुखिया ने भले ही आजादी के कागज पर दस्तगत किए। लेकिन उनके अपने लोगों में 100 में से सिर्फ 26% लोग अजादी चाहते हैं। यूके का सबसे बड़ा स्टील कारखाना खुद वेल्स में है। सवाल ये है कि ये चार देश एक कैसे हैं, एक हैं तो अलग कैसे होंगे। इनकी चाबी जब लंदन के पास है तो ये तीनों कागज लिखकर किसे दिखाना चाह रहे हैं। इसके साथ ही सबसे अहम और हमारे मतलब का सवाल कि यूनाइटेड किंगडम अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा?
19वीं सदी ब्रिटेन की सदी थी। उस वक्त दुनिया की 25 फीसदी जमीन उसके कब्जे में थी। दुनिया की 20 फीसदी आबादी उसके अधीन थी। ब्रिटिश पाउंड दुनिया की रिजर्व करेंसी था, वैसे ही जैसे आज अमेरिकी डॉलर है। उस ब्रिटेन ने दुनिया को बहुत कुछ दिया। इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन वहीं से शुरू हुआ। भाप के इंजन, रेलवे, वैश्विक व्यापार। ब्रिटेन ने दुनिया को आधुनिकता सिखाई, लेकिन यहां यह जिक्र भी जरूरी है कि यह साम्राज्य खून और शोषण पर खड़ा था।
वह सूरज जो कभी नहीं डूबता था, भारत, अफ्रीका और कैरेबियन के लाखों लोगों के खून पसीने की कीमत पर चमकता था। पतन की कहानी समझने के लिए उदय की असलियत का पता होना चाहिए। वैसे तो दूसरे विश्वयुद्ध ने जाहिर कर दिया था कि ब्रिटेन अब कमजोर हो रहा है और अमेरिका नई ताकत बनकर उभर रहा था, लेकिन उसकी ताकत को पहला बड़ा झटका लगा। 1956 में मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ब्रिटेन और फ्रांस ने सैन्य कार्रवाई की, लेकिन अमेरिका ने कहा, रुको और ब्रिटेन रुक गया। जीसी पेन जैसे कई इतिहासकारों ने माना है कि स्वेज संकट ने ब्रिटेन के एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पीएम का बयान और मच गया हंगामा
14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं। स्कॉटलैंड तो 2014 में एक रेफरेंडम करवा भी चुका है और उत्तरी आयरलैंड 1998 के गुड फ्राइडे एग्रीमेंट की वजह से ब्रिटेन के साथ बना हुआ है। वेल्स में भी 1990 के दशक में आजादी को लेकर प्रोटेस्ट हो चुके हैं। हालिया बवाल जो मचा है वह ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर एंडडी बर्नहम की एक टिप्पणी की वजह से शुरू हुआ था। 9 सितंबर को वह हाउस ऑफ कॉमंस में बोल रहे थे। एसएपी के क्रिस लॉ ने उनसे स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह पर सवाल कर लिया। इसके जवाब में बर्नहम ने कहा कि स्कॉटलैंड के मामले में भी वही स्थिति लागू होती है, वही नियम लागू होते हैं जो नॉर्दन आइलैंड के मामले में होते हैं। यानी अगर जनता के बीच बहुत स्पष्ट बहुमत को लेकर समर्थन है तो जनमत संग्रह के सवाल पर विचार किया जा सकता है। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बाद स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन शिवनी ने तो यह तक कह दिया कि एंडडी बर्नहम यूनाइटेड किंगडम के आखिरी प्रधानमंत्री होंगे। उनके बाद ब्रिटेन बट जाएगा।
ट्रंप ने डाला आग में घी
ट्रंप 12 सितंबर को डबलिन पहुंचे थे। वहां उन्होंने कह दिया कि वो एक यूनाइटेड आयरलैंड देखना पसंद करेंगे। नॉर्दर्न आयरलैंड का रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ जुड़ना एक अच्छी बात होगी। फैंटास्टिक चीज होगी। उन्होंने ऐसा बोला। ब्रिटेन के खिलाफ ट्रंप अपने नए कार्यकाल की शुरुआत से ही एकदम लगे हुए हैं। पहले वह अपने दोस्त एलन मस्क के साथ मिलकर पूर्व प्रधानमंत्री की स्टारमर को ट्रोल किया करते थे और अब वो बर्नहम को ट्रोल कर रहे हैं। वैसे ट्रंप की यूनाइटेड आयरलैंड वाली टिप्पणी के पीछे एक पॉलिटिकल स्ट्रेटजी भी हो सकती है। नवंबर महीने में अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन है जिसमें ट्रंप हारते नजर आ रहे हैं। अमेरिका में 3 करोड़ से ज्यादा आयरिश मूल के लोग रहते हैं। हो सकता है कि इसी वोट बैंक को रिझाने के लिए ट्रंप ऐसी टिप्पणी कर रहे हो। 1998 में भी जब बिल क्लिंटन ने आयरलैंड और ब्रिटेन के बीच गुड फ्राइडे एग्रीमेंट करवाया था। तब भी आयरिश वोटर्स ने डेमोक्रेट्स को खूब वोट दिया था। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में उनकी पांच सीट ज्यादा आई थी उस साल। हो सकता है कि ट्रंप भी उसी तरह का कोई तीर मारने की कोशिश कर रहे हो।
14 सितंबर को क्या हुआ
14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं।
क्या है तीनों नेताओं का मकसद
जॉन स्विनी (स्कॉटलैंड): स्कॉटलैंड को आजाद देश बनाना व ईयू की सदस्यता लेना इनका लक्ष्य है। इसके पीछे ये तर्क दिया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था, टैक्स, ऊर्जा व अन्य फैसले देश में ही हों। शिकायतः ब्रिटेन ने ईयू छोड़ा, जबकि 62% स्कॉटलैंडवासी साथ रहना चाहते थे। स्कॉटलैंड के तेल, गैस, समुद्री इलाके का लाभ ब्रिटेन को मिल रहा।
रुन एप इओरवर्थ (वेल्स): स्वतंत्र वेल्स को बनान लक्ष्य है। तर्क है कि वेल्स को ब्रिटेन से उचित फंड नहीं मिलता। प्राकृतिक संसाधनों व नीतियों पर नियंत्रण नहीं है। तपुलिस, न्याय व्यवस्था और वित्तीय अधिकार वेल्स को सौंपे जाएं। आजादी को वेल्स की संवैधानिक यात्रा का अंतिम पड़ाव बता रहे इओरवर्थ।
मिशेल ओ'नील (नॉर्दन आयरलैंड) उत्तरी आयरलैंड व आयरलैंड गणराज्य को मिलाकर एक देश बनाना। द्वीप के लोगों को संवैधानिक भविष्य तय करने दिया जाए। 1998 की डील रेफरेंडम में एकीकरण की अनुमति।
चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान
यूके के नक्शे को देखेंगे तो आपको इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड दिख रहे होंगे। इन चारों से मिलकर बनता है यूनाइटेड किंगडम जिसका पूरा नाम है यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दन आयरलैंड। अब चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान भी है। इंग्लैंड की राजधानी लंदन है। स्कॉटलैंड की राजधानी है एडिन्रा। वेल्स की राजधानी है कार्टिफ जहां पे आज ये मीटिंग हुई है। और नॉर्दन आयरलैंड की राजधानी है बेलफास्ट। यह सब कहलाते तो ब्रिटेन का हिस्सा ही हैं। लेकिन विदेश नीति इन तीनों की,डिफेंस के जो मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम से चलाए जाते हैं। इसलिए इन तीनों इलाकों में जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं, उन्हें कहा जाता है फर्स्ट मिनिस्टर। भारत की चीफ मिनिस्टर की तरह आप इन्हें समझ सकते हैं। लेकिन उनकी भूमिका एक स्टेट से बढ़कर होती है। अब स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड के पास अपनी-अपनी विधानसभा है और कुछ-कुछ अलग-अलग अधिकार हैं। इंग्लैंड में इस तरह की कोई अलग से संसद या विधानसभा नहीं है। इंग्लैंड से जो जुड़े मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम की संसद के कानून से ही बनाए जाते हैं। वहीं से मंजूर होते हैं।
ये तीनों इलाके ब्रिटेन का हिस्सा कैसे बने हैं?
वेल्स ब्रिटेन के पश्चिम में है। पहाड़ों वाला इलाका है। 10वीं शताब्दी में जब विलियम द कॉनकरर ने इंग्लैंड पर कब्जा किया। उसके बाद इंग्लैंड के शासकों की नजर थी। वो वेल्स पर बन गई थी। वेल्स में उस समय कई छोटे-छोटे राज्य और राजघराने थे। इंग्लैंड के राजा पूरे वेल्स पर एक साथ कब्जा नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने वेल्स की सीमा पर बहुत सारे किले बना लिए और किलों के जरिए वहां पर वो देखरेख करने लगे और धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। पर 1280 के दशक में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने वेल्स के खिलाफ मिलिट्री कैंपेन शुरू किया। उनकी सेना ने वेल्स के अहम इलाकों पर कब्जा किया और कई विशाल किले बनवाए। कैनफोन, कॉनवी और हारले जैसे किले जो बहुत फेमस किले हैं वह उसी दौर के बनाए गए थे। लेकिन 16वीं सदी में इंग्लैंड के राजा हेनरी ए्थ के समय दो ऐसे कानून पास हुए जिसकी वजह से आज ये पूरी स्थिति बनी। जिन्हें कहते हैं एक्ट्स ऑफ यूनियन। इन कानूनों का मकसद वेल्स और इंग्लैंड के बीच मौजूदा जो उस समय जो मौजूदा कानूनी दीवारें थी उसको हटाना था और उन्हीं के बदौलत वेल्स को इंग्लैंड की राजनीतिक व्यवस्था में शामिल किया गया। इसी कानून के बाद वेल्स ब्रिटेन का हिस्सा बना।
स्कॉटलैंड ब्रिटेन के उत्तरी हिस्से में पड़ता है। कई सदियों तक स्कॉटलैंड एक अलग देश हुआ करता था। उसका अपना राजा था। अलग कानूनी व्यवस्था थी। दक्षिण में इंग्लैंड था और दोनों देशों के बीच में सीमा को लेकर संघर्ष चलता चलता रहता था। इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड को कब्जाने की पहली बड़ी कोशिश की थी। 1296 में। इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने स्कॉटलैंड पर हमला किया और वहां के राजा जॉन बेलील को हटा दिया। अंग्रेजी सेना ने स्कॉटलैंड के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। लेकिन यह नियंत्रण ज्यादा समय तक नहीं चल सका। स्कॉटलैंड में विद्रोह हुआ। विलियम वालेस और बाद में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 1314 में बन कबर्न की लड़ाई में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी सेना को हरा दिया। और 1328 में इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड की आजादी को मान्यता दे दी। करीब 400 साल तक स्कॉटलैंड आजाद रहा। लेकिन 1707 में बड़ा बदलाव हुआ। उस समय स्कॉटलैंड आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहा था और इंग्लैंड के साथ व्यापार और राजनीतिक संबंधों को लेकर भी वहां पे तनाव था दोनों के बीच। इंग्लैंड ने उस समय ऑफर दिया कि आप हमारे साथ आ जाइए। इंग्लैंड में अपना विलय कर लीजिए। अपना कानून अलग रखिएगा लेकिन देश एक होगा। इसी को लेकर 1706 में दोनों देशों के बीच एक संधि हो गई और स्कॉटलैंड इंग्लैंड की मातहत आ गया। स्कॉटलैंड की अलग संसद खत्म हो गई और उसके जो सांसद थे वो नई ब्रिटिश संसद में शामिल हो गए। 20वीं सदी में फिर से यह मांग उठी कि स्कॉटलैंड के घरेलू मामलों पर फैसले लेने के लिए उसके पास भी अधिकार होने चाहिए। इसका होता है कि 1997 में 1997 में एक जनमत संग्रह होता है। करीब 74 74% लोगों ने इसके पक्ष में वोट दिया। इसके बाद 1999 में स्कॉटलैंड पार्लियामेंट दोबारा अस्तित्व में आई। इसे डेवोल्यूशन कहा गया।
नॉर्दन आयरलैंड 1801 से ही आयरलैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन गया था। लेकिन वहां आजादी की मुहिम वेल्स और स्कॉटलैंड के मुकाबले काफी तेज थी। 1916 में डबलिन में ईस्टर राइजिंग हुआ। आरिश रिपब्लिकन आंदोलन के नेताओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया और आइलैंड को एक आजाद मुल्क घोषित करने की कोशिश की। विद्रोह कुछ ही दिनों में दबा दिया गया। लेकिन ब्रिटिश सरकार द्वारा इसके नेताओं को फांसी दी गई और उससे क्या हुआ कि आरिश जनता भड़क गई और एक नेशनलिस्ट मूवमेंट वहां पर तेज हो गया। इसके बाद सिंफेन पार्टी तेजी से उभरी। 1918 के चुनाव में उसने आयरलैंड में बड़ी जीत हासिल की। उसके सांसदों ने लंदन की ब्रिटिश सांसद में जाने के बजाय डबलिन में ही अपनी अलग संसद बनाने का फैसला किया जिसे डॉयल आयरन कहा गया और स्वतंत्र आई स्टेट की मांग को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद 1919 से 1921 तक आयरलैंड की आजादी के लिए लड़ाई चलती रही। आयरलैंड के उत्तर में छह काउंटियां यूनाइटेड किंगडम में ही रही। यही इलाका बाद में नॉर्दर्न आयरलैंड कहलाया। वो इसलिए क्योंकि नॉर्दन आइलैंड में खासकर अलस्टर नाम के इलाके की कुछ हिस्सों में जो थी वो प्रोटेस्टेंट्स क्रिश्चियंस की आबादी वहां पे ज्यादा थी और वो ब्रिटेन के साथ रहना चाहते थे। दूसरी तरफ कैथोलिक राष्ट्रवादी समूह जो थे जिसके कई लोग पूरे आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना चाहते थे। इसलिए जब आयरलैंड का विभाजन हुआ तो नॉर्दन आयरलैंड यूनाइटेड किंगडम में बना रहा।
ब्रिटेन के बंटने का भारत पर असर
ब्रिटेन UNSC का स्थायी सदस्य (P5) है। विभाजन के बाद ब्रिटेन की वैश्विक हैसियत और भू-राजनीतिक प्रभाव में भारी गिरावट आएगी। इससे UNSC में स्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी को नैतिक और रणनीतिक बल मिलेगा, क्योंकि सिकुड़ता हुआ ब्रिटेन अपनी पुरानी ताकत खो चुका होगा। भारत को सिर्फ लंदन (वेस्टमिंस्टर) से रिश्ते संभालने के बजाय एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड), डबलिन (आयरलैंड) और कार्डिफ (वेल्स) के साथ अलग-अलग स्वतंत्र द्विपक्षीय रिश्ते और दूतावास स्थापित करने होंगे। भारत हमेशा से संप्रभु राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थक रहा है। किसी स्थापित लोकतंत्र के टूटने से वैश्विक स्तर पर अलगाववादी ताकतों को शह मिल सकती है, जिसे लेकर नई दिल्ली बेहद सतर्क रहेगी। ब्रिटेन अपने आंतरिक विवादों और पुनर्गठन में इस कदर उलझ जाएगा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी मौजूदगी सीमित हो जाएगी। भारत को सुरक्षा और रक्षा तकनीक (जेट इंजन, नौसैनिक उपकरण) के मामले में फ्रांस, अमेरिका या खुद की घरेलू क्षमताओं पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा। भारतीय छात्रों और कामगारों के लिए नियम बदल सकते हैं। यदि स्कॉटलैंड स्वतंत्र होकर ईयू की नीतियों की ओर बढ़ता है, तो वहां भारतीय छात्रों के लिए वर्क वीजा या आव्रजन के नियम लंदन के कड़े नियमों से ज्यादा उदार हो सकते हैं। यूके में रहने वाले लाखों भारतीय मूल के लोग मुख्य रूप से इंग्लैंड में केंद्रित हैं। विभाजन के बाद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रभाव पर भी नया समीकरण बनेगा।
कुल मिलाकर कहे तो ब्रिटेन के टूटने से लंदन की वैश्विक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी। भारत के लिए यह स्थिति एक तरफ नए व्यापारिक और कूटनीतिक दरवाजे खोलेगी, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा परिषद में सुधार की भारतीय मांग को एक ठोस आधार प्रदान करेगी।