By दिव्यांशी भदौरिया | Jun 06, 2026
हिंदू धर्म में हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है। हनुमान जी अपने भक्तों के दुख-दर्द, पीड़ा और संकट सब हर लेते हैं। लोग बजरंगबली की कृपा प्राप्त करने के लिए सुंदरकांड का पाठ जरुर करते हैं, लेकिन इसका पाठ करते समय कुछ न कुछ गलती कर ही देते हैं। रामचरितमानस का पांचवां अध्याय सुंदरकांड हनुमान जी की महिमा, उनके साहस और बुद्धि का अद्भुत विवरण दिया है।
लेकिन कई बार लोग पूरी श्रद्धा से पाठ करते हैं, फिर भी मनचाह फल प्राप्त नहीं होता है, जिसका मुख्य कारण पाठ के दौरान होने वाली कुछ अनजानी गलतियां है। क्या आप जानते हैं कि अनजाने में की गई कुछ गलतियों से इसके पुण्य फल समाप्त हो जाते हैं।
अपवित्रता और सूतक का ध्यान न रखना
धार्मिक मान्यता के अनुसार, हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी हैं और उन्हें पवित्रता बहुत प्रिय है। पाठ शुरु करने से पहले स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। यदि परिवार में सूतक यानी के किसी के जन्म या मरण का समय लगा हो, तो सुंदरकांड का पाठ न करें।
आसन और स्थान का बार-बार बदलना
जब आप सुंदरकांड का पाठ शुरु करते हैं, तो एक शांत स्थान का चयन करें और कुशा या ऊनी आसान पर बैठ जाएं। पाठ के दौरान इधर-उधर बैठना, बीच-बीच में उठना या किसी से बात करना वर्जित है। ऐसा करने से एकाग्रता समाप्त हो जाती है और पाठ का आध्यात्मिक प्रभाव खत्म हो जाता है।
बीच में पाठ अधूरा छोड़ना
अगर आप सुंदरकांड का पाठ करते हैं, तो इसे एक ही बार में पूरा पाठ करना चाहिए। कई लोग समय की कमी के कारण आधा पाठ आज और आधा कल करते हैं, जो कि सही नहीं है। अगर आपके पास ज्यादा समय नहीं है, तो आप हनुमान चलीसा या बजरंग बाण का पाठ कर सकते हैं, लेकिन सुंदरकांड को बीच में अधूरा न छोड़ें।
तामसिक भोजन और आचरण
यदि आप नियमित रूप से सुंदरकांड का पाठ करते हैं या मंगलवार अथवा शनिवार को इसका विशेष व्रत एवं संकल्प रखते हैं, तो उस दिन घर में मांसाहार, शराब, प्याज और लहसुन का सेवन या उपयोग करने से परहेज करना चाहिए। साथ ही, पाठ के दौरान और पूरे दिन अपने विचारों को सकारात्मक बनाए रखें तथा किसी के प्रति द्वेष, गुस्सा या कटु वचन बोलने से बचें।
आरती और भोग को नजरअंदाज करना
सुंदरकांड का पाठ समाप्त होने के बाद श्री राम जी और हनुमान जी की आरती करना अनिवार्य है। इसके बाद ही उन्हें बूंदी के लड्डू , चना-चिरौंजी या फल का भोग लगाएं। आरती किए बिना और बिना प्रसाद के सुंदरकांड का पाठ पूरा नहीं माना जाता।