Supreme Court ने Packaged Food पर नमक, चीनी और वसा के Warning Label में देरी पर मांगा जवाब

By Ankit Jaiswal | Sep 28, 2026

खाने-पीने की पैक की गई चीजों पर चेतावनी वाले लेबल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि जब मामला सीधे लोगों की सेहत से जुड़ा है, तो नए सिरे से सार्वजनिक और उद्योग जगत से राय लेने में इतना समय क्यों लगाया जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि वह इस मामले में जल्द अपना अंतिम आदेश जारी कर सकती है।

यह मामला पैक की गई खाद्य वस्तुओं पर सामने की तरफ चेतावनी वाले निशान लगाने से जुड़ा है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत जिन उत्पादों में नमक, चीनी या वसा की मात्रा ज्यादा होगी, उन पर लाल हेक्सागन के आकार का चेतावनी निशान लगाने की योजना है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से इस व्यवस्था को लेकर अदालत का रुख किया गया है। उनका कहना है कि इस तरह के नियमों को लागू करने पर लंबे समय से चर्चा हो रही है, लेकिन अब तक सख्त कदम नहीं उठाए गए हैं।

गौरतलब है कि भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर हाल के महीनों में कार्रवाई तेज हुई है। देश के कई हिस्सों में खाने-पीने की दुकानों, रेस्तरां और खाद्य कारखानों पर जांच की गई है। साफ-सफाई और स्वास्थ्य मानकों में कमी मिलने पर कई प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई भी हुई है। इसके साथ ही स्कूलों के आसपास और स्कूल परिसरों में ज्यादा नमक, चीनी और वसा वाले जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा रहे हैं।

मौजूद जानकारी के अनुसार, खाद्य नियामक ने पिछले सप्ताह कहा था कि नए चेतावनी लेबल से जुड़ी अधिसूचना और सार्वजनिक राय लेने की प्रक्रिया में करीब 4 महीने लग सकते हैं। इसके बाद नियमों को लागू करने के लिए लगभग 1 साल का समय प्रस्तावित है। इसी समयसीमा पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया और पूछा कि पिछले 4 वर्षों में इस मुद्दे पर क्या किया गया।

भारत में बढ़ते मोटापे को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। एक अध्ययन के मुताबिक 2021 में देश में करीब 180 मिलियन वयस्क ज्यादा वजन या मोटापे की समस्या से प्रभावित थे। यह संख्या 2050 तक 450 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। बच्चों में बढ़ते मोटापे को लेकर भी सरकार और स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंता जता चुके हैं।

वहीं, खाद्य उद्योग ने चेतावनी निशान के लाल रंग और इसमें तय की जाने वाली सीमा को लेकर कुछ सवाल उठाए हैं। ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने कहा है कि भारत में लाल रंग का इस्तेमाल पहले से ही मांसाहारी खाद्य पदार्थों की पहचान के लिए किया जाता है। ऐसे में एक और प्रमुख लाल निशान से उपभोक्ताओं में भ्रम पैदा हो सकता है।

हालांकि, संगठन ने पैकेट के सामने चेतावनी देने की व्यवस्था का पूरी तरह विरोध नहीं किया है। उसका कहना है कि नमक, चीनी और वसा की सीमा वैज्ञानिक आधार पर तय होनी चाहिए। प्रस्ताव में ठोस खाद्य पदार्थों में अतिरिक्त चीनी 3% और वसा 4.2% से अधिक होने पर चेतावनी देने की बात है। उद्योग का यह भी कहना है कि सीमा तय करते समय 100 ग्राम के बजाय एक बार में खाई जाने वाली सामान्य मात्रा को आधार बनाया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर अचार करीब 10 ग्राम, चटनी या अन्य लेप 15 से 20 ग्राम और ब्रेड करीब 30 ग्राम खाई जाती है। अदालत के अंतिम आदेश से इस व्यवस्था की आगे की दिशा साफ होने की उम्मीद है।

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