By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Sep 10, 2026
उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि कोई न्यायिक अधिकारी अदालत में न्यायाधीशों पर चीख नहीं सकता। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा एक न्यायिक अधिकारी के खिलाफ ‘‘अनुचित आक्रोशपूर्ण व्यवहार’’ को लेकर शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ा सकता है, लेकिन 28 सितंबर तक इसपर अंतिम फैसला नहीं करेगा।
पीठ ने कहा, ‘‘एक न्यायिक अधिकारी को उच्च न्यायालय से यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि पदों को नहीं भरने के लिए अदालत जिम्मेदार है। उसे अपने शब्दों पर पछतावा होना चाहिए। यह गंभीर अनुशासनहीनता है।’’ शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह उच्च न्यायालय में वापस जाए और वहां बिना शर्त माफी मांगे।
सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही उच्च न्यायालय के समक्ष माफी मांग चुका है और उसका तबादला नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कर दिया गया है, जो करीब 1,000 किलोमीटर दूर है। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 28 सितंबर तय की। उच्च न्यायालय में यह विवाद त्वरित अदालतों के लिए 179 पदों के सृजन का निर्देश देने का अनुरोध करने वाली अंतरिम याचिका की सुनवाई के दौरान उठा।
उच्च न्यायालय ने पाया था कि राज्य के विधि एवं न्याय विभाग में सचिव और वरिष्ठ कानूनी सलाहकार रहे अधिकारी द्वारा पहले दाखिल किया गया हलफनामा संतोषजनक नहीं था। उच्च न्यायालय ने अपने एक सितंबर के आदेश में कहा था कि उसने अतिरिक्त सरकारी वकील से पूछा था कि अतिरिक्त हलफनामे में कौन-से कथन यह बताते हैं कि त्वरित अदालतों के लिए 179 नए पद सृजित किए गए हैं। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारे सवाल का जवाब देने के बजाय, हलफनामा देने वाले अधिकारी ने आक्रामक और ऊंची आवाज में बोलना शुरू कर दिया (जो लगभग चीखने जैसा था)।
उन्होंने अन्य बातों के अलावा उच्च न्यायालय प्रशासन को दोषी ठहराया और भरी अदालत में कहा कि ‘179 पदों को नहीं भरने के लिए उच्च न्यायालय प्रशासन जिम्मेदार है’।’’ उच्च न्यायालय ने अधिकारी को नोटिस जारी करके पूछा था कि उनके खिलाफ क्यों नहीं अवमानना की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। उच्च न्यायालय ने मामले को 11 सितंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था।