By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 04, 2026
नयी दिल्ली, चार अगस्त उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि वह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151ए की व्याख्या से जुड़े मुद्दे पर 22 सितंबर को सुनवाई करेगा। यह धारा संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानमंडलों में रिक्त सीटों को भरने की समय-सीमा से संबंधित है। इस प्रावधान के अनुसार, यदि किसी रिक्त सीट के संबंध में संबंधित सदस्य का शेष कार्यकाल एक वर्ष या उससे अधिक का हो, तो निर्वाचन आयोग को रिक्ति की तिथि से छह महीने के भीतर उपचुनाव कराना अनिवार्य है।
इस मामले को लेकर मंगलवार को सुनवाई के दौरान पक्षों की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने कहा कि अधिनियम की धारा 151ए की व्याख्या किए जाने की आवश्यकता है। एक अधिवक्ता ने दलील दी कि मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि निर्वाचन आयोग अलग-अलग उपचुनावों के मामलों में धारा 151ए की अलग-अलग तरीके से व्याख्या कर रहा है। अधिवक्ता ने कहा, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि निर्वाचन आयोग मामलों का चयन अपनी सुविधा के अनुसार कर रहा है।’’ इस पर पीठ ने कहा, ‘‘इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151ए की व्याख्या किए जाने की आवश्यकता है।’’ इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने मामले को 22 सितंबर को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 2024 में बंबई उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें निर्वाचन आयोग को पुणे लोकसभा सीट पर तत्काल उपचुनाव कराने का निर्देश दिया गया था। उस समय उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि रिक्तियों के कारण होने वाले चुनावों के संबंध में वह दिशानिर्देश निर्धारित करेगी। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा था कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151ए को ध्यान में रखते हुए ऐसे दिशानिर्देशों की आवश्यकता पड़ सकती है।
दिसंबर 2023 में बंबई उच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को पुणे लोकसभा सीट पर तत्काल उपचुनाव कराने का निर्देश देते हुए कहा था कि किसी निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को लंबे समय तक प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रखा जा सकता। उच्च न्यायालय ने कहा था, ‘‘किसी भी संसदीय लोकतंत्र में शासन निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से चलता है, जो जनता की आवाज होते हैं। यदि कोई प्रतिनिधि नहीं रहता, तो उसकी जगह दूसरे प्रतिनिधि का चयन किया जाना चाहिए।
जनता को बिना प्रतिनिधित्व के नहीं छोड़ा जा सकता। यह पूरी तरह असंवैधानिक है और हमारी संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना के विपरीत है।