Yes Milord: हवा से वोट तक, 2026 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले आपकी ज़िंदगी कैसे बदलेंगे

By अभिनय आकाश | Jan 03, 2026

किसे मिलेगा वोट का अधिकार, कौन जेल से कदम रखेगा बाहर, हम कैसी हवां में सांसे लेंगे और कितनी आजादी के साथ अपनी बातें कह सकेंगे। 2026 की शुरुआत भारत के लिए सिर्फ एक नया कैलेंडर नहीं, बल्कि संवैधानिक परीक्षा का साल है। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित मामलों में मतदाता सूची से जुड़ा विशेष गहन संशोधन सबसे संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरा है। इस प्रक्रिया के खिलाफ दायर याचिकाएँ यह सवाल उठा रही हैं कि क्या लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित हैं या उन्हें नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है। 2026 में अदालत के फैसले देश की राजनीति और नागरिक स्वतंत्रताओं की दिशा तय करेंगे। दिल्ली दंगे मामले में आरोपियो की जमानत अर्जी पर भी नए साल में फैसला आने वाला है। ऐसे तमाम मामले हैं जिन पर आने वाले साल में सुप्रीम कोर्ट की नजर रहेगी।

SIR मामला

कई राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मामला चल रहा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बड़ी संख्या में नाम हटाए गए, कभी-कभी बिना सूचना दिए। इनमें प्रवासी मजदूर, शहरी गरीब और बुजुर्ग शामिल हैं। कई लोगों का कहना है कि उन्हें तब पता चला कि वे अब मतदाता नहीं रहे, जब बहुत देर हो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि मतदाता सूचियों को कैसे संशोधित किया जाएगा, प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए और चुनाव से ठीक पहले कितनी बार मतदान किया जा सकता है। लाखों लोगों के लिए, यह एक सीधा सा सवाल है: क्या मेरा वोट गिना जाएगा? सुनवाई के लिए लंबित मामलों का एक और समूह व्यक्तिगत जीवन को गहराई से प्रभावित करता है। अदालत एसआईआर प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी सुनवाई कर रही है। कई याचिकाओं में चुनाव आयोग के बिहार समेत कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) करने के फैसले को चुनौती दी गई है। अदालत ने इन याचिकाओं की सुनवाई करते हुए इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। बिहार की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद, चुनाव आयोग ने तमिलनाडु और तीन केंद्र शासित प्रदेशों समेत नौ और राज्यों में मतदाता सूचियों के संशोधन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में इस साल विस्तार से सुनवाई होने वाली है।

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एसिड अटैक

सुप्रीम कोर्ट एसिड अटैक मामले में सुनवाई अगले साल करने वाली है। 11 दिसंबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एसिड अटैक अपराध में शामिल शख्स समाज, के शासन के लिए भी खतरा है और उन पर आम नागरिकों और यहां तक कि कानून कुछ कठोर शर्ते लागू की जानी चाहिए।

तलाक ए हसन

यह वह प्रथा है जिसमे एक मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तीन महीनों तक हर महीने एक बार "तलाक" कहकर तलाक दे सकता है। अदालत ने पिछली सुनवाई के दौरान कहा था कि ऐसी प्रथा एक सभ्य समाज में कैसे चल सकती है?

निकाह हलाला, बहुविवाह

निकाह, हलाला और बहुविवाह जैसी प्रथाओं को चुनौती दी जा रही हैसमर्थकों का तर्क है कि ये धार्मिक स्वतंत्रता के मामले हैंयाचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये समानता और गरिमा का उल्लंघन करते हैंये मामले कई वर्षों से लंबित हैं। निकाह हलाला और बहुविवाह के संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट पाच जजों की सवैधानिक बेंच का गठन कर सुनवाई करेगा। पिछले दिनों इस मामले को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेच के सामने उठाया गया था।

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मुफ्त उपहार

सुप्रीम कोर्ट चुनाव में मुफ्त उपहार बाटने के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दे चुकी है। याचिका में मतदाताओं को लुभाने के लिए किए जाने वाले लोक लुभावना घोषणा पर बैन की मांग की गई है। साथ ही चुनाव आयोग को इस मामले में उचित कदम उठाना चाहिए।

उन्नाव केस

सीबीआई ने उन्नाव बलात्कार मामले के दोषी कुलदीप सिंह सेगर की सजा निलंबित करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। दिल्ली हाई कोर्ट ने सेगर को 23 दिसंबर को जमानत दे दी थी। उनकी सजा को सस्पेंड करते हुए उन्हें राहत दी गई थी। हाई कोर्ट द्वारा सेंगर को दी गई राहत के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

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