सुशांत सिंह राजपूत का जाना मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा है

By प्रियंका सौरभ | Jun 14, 2020

कोरोना वायरस के कारण मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी तेजी से देश में उभरकर आया है। लॉकडाउन ने लोगों की आदतें तो जरूर बदल दी हैं लेकिन एक बड़ा तबका तनाव के बीच जिंदगी जी रहा है। यह तनाव बीमारी और भविष्य की चिंता को लेकर है। कोरोना से बचने के लिए लोग घरों में तो हैं लेकिन उन्हें कहीं ना कहीं इस बीमारी की चिंता लगी रहती है और वह दिमाग के किसी कोने में मौजूद रहती है, जिसकी वजह से इंसान की सोच पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है लॉकडाउन ही नहीं उसके बाद की भी चिंता से लोग ग्रसित हैं क्योंकि कई लोगों के सामने रोजगार, नौकरी और वित्तीय संकट पहले ही पैदा हो चुके हैं।

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मैं स्वयं भी जीवन के बड़े उतार-चढ़ावों से जूझ रही हूँ और जानती हूँ कि मेरे जैसे अधिकांश युवाओं की कमोबेश ऐसी ही हालत है। मैं भी डिप्रेशन का दंश झेल चुकी हूँ। बन्दे को अपने जीने-खाने तक कि खबर नही होती। लेकिन, अपनी ही कोशिशों के दम पर उससे बाहर भी आई हूँ बिना दवाइयों के क्योंकि कारण और निवारण जिन्हें मालूम है उनके लिए थोड़ा आसान होता है बाहर निकलना। मगर अधिकांश समझ ही नही पाते इसके लक्षण और कारण, तब इलाज में भी देरी ही हो जाती है। फीस समाज का रवैय्या भी ऐसा होता कि आपको बीमार नही, बल्कि पागल घोषित कर दिया जाएगा। तब जरूरी हो जाता है कि स्वयं को किसी भी प्रकार की नकारात्मकता से दूर रखा जाए और परिजनों से भी अपील है कि अपने अपनों का खयाल रखें।

अकेलापन अपने आप में एक बड़ी त्रासदी है। इसलिए खुद को उस अकेलेपन से बचाने का प्रयास करें। जीवन में जो भी है जितना भी है उतने में ही संतुष्ट रहना सीखना होगा। अपनी खुशी अपने भीतर भी तलाशनी होगी किसी के साथ या फिर किसी के बगैर भी। आत्महत्या जैसी घटना को अंजाम देने के लिए कुछ पल ही काफी होते हैं किसी भी व्यक्ति के लिए इसलिए हम सबको ऐसे पलों के साथ डील करना सीखना होगा। आपके किसी मित्र, किसी परिजन, किसी जानने वाले की कॉल आये तो नजरअंदाज मत कीजिये। सम्भव है यह उस व्यक्ति के जीवन के वही कठिन पल हों और आपके बात कर लेने से उसकी जिंदगी बच सके।

दरअसल लॉकडाउन लगने और उसके बढ़ने से दो तरह के मुद्दे सामने आ रहे हैं। पहला लोग लगातार घर पर रह रहे हैं और ऐसे में अंतर्वैयक्तिक संबंध जैसे कि घरेलू हिंसा और बच्चों को संभालने को लेकर विवाद बढ़ा है, क्योंकि सभी लोग अपने दैनिक रूटीन से कट चुके हैं। दूसरी समस्या यह है कि लोग लॉकडाउन खत्म होने के बाद की स्थिति को लेकर चिंतित है। जैसे कि अपनी आर्थिक स्थिति और आजीविका। कई अन्य बीमारियों की तरह इस बार भी सबसे निचले स्तर के लोग प्रभावित हैं।

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मौजूदा हालात और भविष्य की चिंता ना केवल गरीबों को सता रही है बल्कि उन्हें भी परेशान कर रही है जो समृद्ध परिवार से आते हैं। दूसरे शहरों में काम करने वाले प्रवासी अपने शहर और गांव जाने को लेकर चिंतित हैं। उन्हें आने वाले दिनों में रोजगार नहीं मिलने का भी डर है। जो लोग अपने गांव पहुंच भी जा रहे हैं उन्हें भी गांव में अपनापन नहीं मिल रहा है। गांव वाले उन्हें शक की नजर से देख रहे हैं। गांवों में लोगों पर शक किया जा रहा है कि कहीं वे संक्रमित तो नहीं हैं। कोरोना के साथ आया दिमागी खौफ भारत जैसे बड़े देश में कमोबेश सबकी स्थिति एक समान बनाता है। भले ही अधिकांश लोग मानसिक तौर पर पीड़ित नहीं हो लेकिन एक बड़ा तबका है जिसे भविष्य की चिंता है। वे अपने बच्चे के भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।

हालांकि तनाव तो सभी को है। किसी को लॉकडाउन के खत्म होने का तनाव है तो किसी को वित्तीय स्थिति ठीक करने का तनाव, घर पर नहीं रहने वालों को जल्द आजाद घूमने का तनाव है। इसे सामूहिक तनाव भी कह सकते हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि लोगों को लॉकडाउन जैसे हालात से निपटने के लिए समय का सही इस्तेमाल करना चाहिए। उनके मुताबिक जिन विषयों में रूचि हैं उन पर किताबें पढ़नी चाहिए, घर में पेड़ और पौधों से भी सकारात्मकता का एहसास हो सकता है। वे कहते हैं साथ ही सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप पर आने वाली नकारात्मक चीजों को नजरअंदाज कर सकारात्मक चीजों को ही अपनाना चाहिए। मनोचिकित्सकों का कहना है कि लोग शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को स्वस्थ रखें ताकि समय आने पर वे चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहें।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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