स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को तो ईसाई मिशनरियों ने छीन लिया, लेकिन उनकी शिक्षाएं आज भी करती हैं मार्गदर्शन

By टीम प्रभासाक्षी | Aug 23, 2022

वेदांत केसरी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को 23 अगस्त, 2008 की रात को ईसाई मिशनरियों के षड्यंत्र से निर्दयतापूर्वक मार दिया गया था क्योंकि वह असहाय वनवासियों का ईसाई धर्म में धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे और वनवासी बहुल ओडिशा के कंधमाल जिले में स्थानीय वनवासियों के कल्याण के लिए काम कर रहे थे। ओडिशा के वन प्रधान फूलबनी (कंधमाल) जिले के ग्राम गुरजंग में 1924 में जन्मे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की बचपन से ही आकांक्षा थी कि वे समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करें। गृहस्थ और दो बच्चों के पिता होने के बावजूद उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करने के उद्देश्य से एक दिन अंततः साधनाओं के लिए हिमालय का मार्ग पकड़ लिया। जब 1965 में वह हिमालय से लौटे तब वह गोरक्षा आंदोलन से जुड़ गए। आरंभ में उन्होंने अपने काम का केंद्र वन बहुल फुलबानी (कंधमाल) जिले के चकपाद गांव को बनाया। कुछ ही वर्षों में उनकी सेवा कार्य की ख्याति चारों तरफ वन क्षेत्रों में गूंजने लगी।

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1969 में उन्होंने चकपाद में अपना पहला आश्रम शुरू किया और यह आश्रम स्थानीय वनवासी आबादी के कल्याण के उद्देश्य से गतिविधियों का केंद्र बन गया। उन्होंने बिरुपाक्ष्य, कुमारेश्वर और जोगेश्वर मंदिरों का जीर्णोद्धार किया।

स्वामीजी वेदांत दर्शन और संस्कृत व्याकरण के मूर्धन्य विद्वान थे और इसलिए उन्हें "वेदांत केसरी" के नाम से जाना जाता था। वह लंबे समय तक फूलबनी जिले में डटे रहे और वनवासी संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए कड़ा संघर्ष करते रहे, पूरी की गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य ने उन्हें "विधर्मी कुचक्र विदारण महारथी" की उपाधि से सम्मानित किया था। उनके कंधमाल में अपना काम शुरू करने के समय से ही आरएसएस के समर्पित प्रचारक श्री रघुनाथ सेठी लंबे समय तक उनके साथ जुड़े रहे। उन्होंने शुरू में चकपाद में अपनी गतिविधियों के स्थान का चयन किया क्योंकि वहाँ प्रसिद्ध बिरूपाख्या मंदिर है। इसके बाद उन्होंने जलेस्पट्टा में कन्याश्रम, तुलसीपुर में सेवा स्कूल, कटक जिले के बांकी और अंगुल जिले के पाणिग्रोला में एक आश्रम की स्थापना की।

चकपाद स्थित बिरुपाख्या मंदिर कंधमाल (फूलबनी) जिले में स्थित है। यह समुद्र तल से लगभग 800 फीट की ऊंचाई पर है। मंदिर के पास बुरुटंगा नदी बह रही है। यह स्थान मनोरम प्राकृतिक दृश्यों से घिर हुआ है। रामायण में भी चकपाद का उल्लेख किया गया है। चकपाद का प्राचीन नाम एकचक्रनगरी है। यह नाम रामायण से जुड़ा है। यहां एक शिव मंदिर मौजूद है जहां लिंग दक्षिण की ओर झुका हुआ है और उस स्थान के सभी वृक्ष भी दक्षिण की ओर झुके हुए हैं।

स्वामी जी दूरदर्शी थे जोकि उनकी गतिविधियों से स्पष्ट होता है। उन्होंने एक एक क्षेत्र में अपनी गतिविधियों के माध्यम से कंधमाल के लोगों की जीवन शैली को आमूल चूल रूप से बदल दिया। उन्होंने प्रौढ़ शिक्षा के लिए रात्रि विद्यालय शुरू किया था। उन्होंने वर्ष 1969 में चकपाद में कल्याण आश्रम नाम का एक संस्कृत विद्यालय खोला, जिसे अब संस्कृत कॉलेज के रूप में प्रोन्नत कर दिया गया है। लड़कियों की शिक्षा के लिए उन्होंने वर्ष 1988 में कंधमाल के जलेस्पेट्टा में पूर्ण आवासीय विद्यालय 'शंकराचार्य कन्याश्रम' की स्थापना की, जहां 250 छात्राएं पढ़ रही हैं। उन्होंने अंगुल जिले के बांकी में एक स्कूल और पांडीगोला में एक आश्रम की स्थापना भी की।

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स्वामीजी ने कक्षा में छात्रों को व्याकरण और खेतों में अच्छी खेती की तकनीक सिखाई। उन्होंने ग्रामीणों को धान और सब्जी आदि की खेती कब और कैसे करनी है, यह सब सिखाया। उनके प्रयासों के कारण उदयगिर और रायकिया ब्लॉक क्षेत्र में ओडिशा के किसान सेम की सर्वोत्तम गुणवत्ता और उच्चतम मात्रा का उत्पादन करते हैं। उन्होंने कटिंगिया में सब्जी सहकारी समिति भी बनाई। इन प्रयासों के जरिए स्थानीय आबादी की आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ।

अब हम कंधमाल में हर जगह हरियाली देख सकते हैं क्योंकि यहाँ किसी अन्य जिले की तुलना में अधिक वन क्षेत्र है। यह सब स्वामीजी के प्रयासों के कारण है। उन्होंने जिले के कई हिस्सों में पहाड़ी की चोटियों पर "math" भी स्थापित किए और उन्होंने ग्रामीणों को बताया कि पहाड़ी में पेड़ मुठों और ग्रामीण समुदाय के हैं। यदि आपातकाल उत्पन्न होता है तो कोई भी ग्राम समिति की अनुमति के बाद ही एक पेड़ काट सकता है और लकड़ी ले सकता है। यह प्रारूप काफी काम आया। संयुक्त वन प्रबंधन प्रणाली जिसे सरकार ने अब शुरू किया है, उसे स्वामीजी ने 1970 में ही शुरू कर दिया था। स्वामीजी वनवासी संस्कृति और परंपरा के संरक्षण और विकास के लिए काफी गंभीर थे। उन्होंने कई स्थानों पर वनवासी देव स्थान (धर्माणीपेनू) की स्थापना और जीर्णोद्धार किया। इसी तरह उन्होंने गजपति और कंधमाल जिले से होते हुए एक रथयात्रा शुरू की थी, जिसके दौरान हजारों वनवासी अपनी विश्वास व्यवस्था में वापस जाकर उसका पालन करने के लिए प्रेरित हुए थे।

वह प्रायः कहा करते थे कि जहां आंसू या खून गिरता है वह क्षेत्र समृद्ध नहीं होगा। वह अंधाधुंध गोहत्या के खिलाफ थे। उन्होंने लोगों को पशुओं को कत्लेआम से बचाने की शिक्षा दी। कई मौकों पर उन्होंने प्रदर्शन, धरना दिया और राज्य के कई हिस्सों में भूख हड़ताल में हिस्सा लिया। उन्होंने इस कारण से राज्य भर में दौरा किया। वह कई सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक संगठनों से जुड़े रहे। उन्होंने राज्य के विभिन्न हिस्सों में कई मंदिरों की स्थापना और जीर्णोद्धार किया है। कंधमाल में उनका मुख्य काम वनवासियों को ईसाई धर्मांतरण से बचाना था। उन्होंने आदिवासियों को उनके मूल विश्वास में वापस लाने के लिए अपने स्तर पर भरसक प्रयास किया। उनके काम से प्रेरित होकर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हजारों लोग उनके शिष्य बन जाते थे।

संदर्भ-

ट्रुथ बिहाइंड द मर्डर ऑफ स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती, विश्व संवाद केंद्र, भुवनेश्वर उड़ीसा द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक

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