Jan Gan Man: SC/ST Act सुरक्षा का कानून है या दुरुपयोग का हथियार? Swatantra Bhardwaj Case से उठे बड़े सवाल

By नीरज कुमार दुबे | Sep 08, 2026

जब कोई कानून समाज के कमजोर और वंचित वर्गों की सुरक्षा के लिए बनाया जाता है, तो उसका उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना होता है। लेकिन जब उसी कानून के दुरुपयोग के आरोप सामने आने लगें, निर्दोष लोगों के फंसने की आशंका उठे और अदालतें भी बार-बार सावधानी बरतने की जरूरत महसूस करें, तब बहस केवल कानून के समर्थन या विरोध तक सीमित नहीं रह सकती। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़ा हालिया मामला इसी व्यापक बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है।

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हालांकि, इस प्रकरण का दूसरा पक्ष भी महत्वपूर्ण है। स्वतंत्र भारद्वाज का कहना है कि उन्होंने किसी पर जानबूझकर हमला नहीं किया, बल्कि लगभग 25-30 लोगों की भीड़ ने उन पर हमला किया था और उन्होंने आत्मरक्षा में प्रतिक्रिया दी। उनका दावा है कि हाथ में पहने कड़े से संजय आजाद के सिर पर अनजाने में चोट लग गई होगी। प्रदर्शन का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें भीड़ के बीच पुलिसकर्मी भारद्वाज को वहां से निकालने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि संजय आजाद के एक वीडियो में भी चोट को अनजाने में लगी चोट बताया गया था। दिल्ली पुलिस ने भी पहले कहा था कि सिर की चोट साधारण प्रकृति की थी। ऐसे में मामला अदालत और जांच एजेंसियों के सामने है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा। लेकिन इस प्रकरण ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या हर विवाद, झगड़े या मारपीट को स्वतः जातिगत अत्याचार का मामला मान लेना उचित है?

यहीं से एससी/एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग पर बहस शुरू होती है। देखा जाये तो 1989 का एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम जाति आधारित हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न से अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों को विशेष सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाया गया था। यह कानून आवश्यक है, क्योंकि भारत में जातिगत अत्याचार की वास्तविक और गंभीर समस्या से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन कानून की मजबूती के साथ उसके निष्पक्ष उपयोग की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में इस कानून के संभावित दुरुपयोग और अप्रासंगिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका का उल्लेख किया था। अदालत ने तब यह सवाल उठाया था कि क्या किसी निर्दोष व्यक्ति की स्वतंत्रता बिना पर्याप्त विचार के छीनी जा सकती है? बाद में विधायी और न्यायिक प्रक्रियाओं के जरिए कानून की मूल कठोरता बहाल कर दी गई, लेकिन निर्दोष को झूठे मामले में फंसने से बचाने का प्रश्न आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।

एनसीआरबी के आंकड़ों को लेकर भी बहस जटिल है। उपलब्ध आंकड़ों में एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या में वृद्धि दिखाई देती है। 2020 में लगभग 45,995 मामले दर्ज हुए, 2022 में यह संख्या 52,866 तक पहुंची और 2023 में 53,372 मामलों का पांच वर्षीय उच्च स्तर दर्ज किया गया। 2024 में मामलों की संख्या घटकर 48,669 बताई गई। लेकिन केवल एफआईआर की संख्या से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि हर मामला सिद्ध जातिगत अत्याचार था। एफआईआर दर्ज होने और अदालत में अपराध साबित होने के बीच लंबी जांच और न्यायिक प्रक्रिया होती है।

इसीलिए कम दोषसिद्धि, अंतिम रिपोर्ट, बरी होने और मामलों के बंद होने के आंकड़ों को भी गंभीरता से समझना होगा। कम दोषसिद्धि के पीछे कमजोर जांच, गवाहों का मुकरना, समझौता या साक्ष्यों की कमी जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए हर बरी होने को स्वतः “फर्जी केस” कहना भी गलत होगा। लेकिन जब अदालतें स्वयं दुर्भावनापूर्ण मुकदमों और कानून के दुरुपयोग की बात करें, तब इस समस्या को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं।

हाल के वर्षों में कई हाईकोर्टों ने स्पष्ट किया है कि हर पेशेवर विवाद, प्रशासनिक मतभेद या व्यक्तिगत झगड़े को एससी/एसटी एक्ट के दायरे में नहीं लाया जा सकता। फरवरी 2026 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर हर अपमान या विवाद तब तक एससी/एसटी एक्ट का अपराध नहीं बन सकता, जब तक स्पष्ट रूप से जाति आधारित सार्वजनिक अपमान या दुर्व्यवहार के तत्व न हों। इसी प्रकार कर्नाटक और बॉम्बे हाईकोर्ट के कुछ मामलों में भी अदालतों ने कथित जातिगत अपराध और सामान्य विवाद के बीच अंतर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

एक और संवेदनशील मुद्दा मुआवजे की व्यवस्था है। एससी/एसटी अत्याचार निवारण नियमों के तहत पीड़ितों को आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है, जो वास्तविक पीड़ितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा तंत्र है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि एफआईआर और चार्जशीट के चरणों में मिलने वाली राहत के कारण कुछ मामलों में आर्थिक लाभ के लिए झूठे आरोप लगाने की आशंका पैदा हो सकती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जुड़े कुछ मामलों और टिप्पणियों में बार-बार मुआवजे के दावों तथा कथित बिचौलियों की भूमिका की जांच की आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की गई है।

देखा जाये तो समस्या का समाधान कानून को कमजोर करना नहीं है। वास्तविक जातिगत अत्याचारों के पीड़ितों को मजबूत कानूनी सुरक्षा और त्वरित न्याय मिलना ही चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद, राजनीतिक प्रतिशोध, कार्यस्थल संघर्ष या आर्थिक लाभ के लिए किसी कठोर कानून का कथित हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं हो।

स्वतंत्र भारद्वाज का मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और किसी भी व्यक्ति के दोष या निर्दोष होने का फैसला अदालत ही करेगी। लेकिन यह प्रकरण एक बड़ी बहस का अवसर जरूर देता है। कानून इतना मजबूत होना चाहिए कि वास्तविक पीड़ित न डरें, लेकिन जांच इतनी निष्पक्ष भी हो कि कोई निर्दोष व्यक्ति केवल आरोप लगने के कारण अपना सम्मान, आजादी और जीवन के वर्ष न गंवा दे।

बहरहाल, न्याय का अर्थ केवल दोषी को सजा देना नहीं है। न्याय का अर्थ निर्दोष को बचाना भी है। एससी/एसटी एक्ट जैसे कठोर और आवश्यक कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहेगी, जब वास्तविक अत्याचारों पर कठोर कार्रवाई के साथ-साथ उसके किसी भी कथित दुरुपयोग को भी समान गंभीरता से रोका जाएगा। आखिर कानून का उद्देश्य समाज में न्याय स्थापित करना है न कि न्याय के नाम पर किसी नई अन्यायपूर्ण व्यवस्था को जन्म देना।

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