कुरैशी की पुस्तक से उठा सवाल, मनमोहन को 'आत्महत्या' के लिए क्यों 'मजबूर' कर रहे थे कांग्रेसी मंत्री?

By नीरज कुमार दुबे | Jul 14, 2026

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी की आने वाली पुस्तक ने देश की राजनीति में जोरदार हलचल मचा दी है। सबसे सनसनीखेज खुलासा उस घटना का है, जब वर्ष 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उनसे कथित तौर पर कहा, "यदि आप ऐसा सोचते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।" यह टिप्पणी उस समय सामने आई, जब कुरैशी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से शिकायत की थी कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ मंत्री और नेता चुनाव आयोग की संवैधानिक गरिमा पर लगातार चोट कर रहे हैं। कुरैशी ने इस पूरे घटनाक्रम को अपनी पुस्तक के उस अध्याय में दर्ज किया है, जिसका शीर्षक है, "वह दिन जब प्रधानमंत्री ने अकल्पनीय बात कह दी।"

इसे भी पढ़ें: पूर्व CEC SY Quraishi का बड़ा खुलासा, Manmohan Singh ने घबराकर कहा था- मैं Suicide कर लूंगा

कुरैशी के अनुसार उन्होंने अपनी पीड़ा प्रधानमंत्री के तत्कालीन प्रेस सलाहकार हरीश खरे के सामने रखी। अगले ही दिन प्रधानमंत्री कार्यालय से तत्काल बुलावा आया। शाम को हुई मुलाकात में मनमोहन सिंह बेहद व्यथित नजर आए। कुरैशी के अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा, "यदि आपको ऐसा लगता है तो मैं आत्महत्या कर लूंगा।" यह सुनकर वह खुद भी स्तब्ध रह गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी शिकायत प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि कुछ मंत्रियों के व्यवहार से थी। इसके बाद मनमोहन सिंह ने कथित तौर पर कहा कि उन्हें इस तरह की टिप्पणियों की कोई जानकारी नहीं थी। यदि पहले पता होता तो वह संबंधित मंत्रियों को कड़ी फटकार लगाते। उन्होंने यह भी कहा कि आगे कभी ऐसी कोई बात हो तो सीधे उन्हें बताई जाए। कुरैशी के अनुसार मनमोहन सिंह ने चुनाव आयोग को भारत के लोकतंत्र की आत्मा बताते हुए कहा कि यदि यह संस्था कमजोर हुई तो सब कुछ कमजोर हो जाएगा। कुरैशी का दावा है कि इस मुलाकात के बाद चुनाव आयोग के खिलाफ कांग्रेस नेताओं की बयानबाजी थम गई। हालांकि यहां एक सवाल यह उठता है कि क्या तत्कालीन कांग्रेसी मंत्री मनमोहन सिंह को आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर कर रहे थे?

साथ ही पुस्तक में कुरैशी ने एक और चौंकाने वाली बात कही है। उनका कहना है कि सरकार का हाथ हमेशा लंबा होता है, जबकि विपक्ष को सहारे की जरूरत पड़ती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अपने कार्यकाल के दौरान उनके उदार रवैये का लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला। यह टिप्पणी सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है कि आखिर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त किस संदर्भ में यह बात कह रहे थे और इसका वास्तविक अर्थ क्या है।

उधर, कुरैशी की पुस्तक के इन खुलासों पर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। पार्टी के आईटी विभाग के प्रमुख अमित मालवीय ने कहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक रणनीति रही है। उन्होंने कहा कि जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार सत्ता में थी, तब भी उसके मंत्री आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर चुनाव आयोग के खिलाफ बयान देते थे और आज विपक्ष में बैठकर भी कांग्रेस चुनावी नतीजे मनमाफिक नहीं आने पर आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है। अमित मालवीय ने यह भी कहा कि कुरैशी के खुलासे से साफ है कि स्वयं मनमोहन सिंह अपने मंत्रियों की टिप्पणियों से दुखी थे और उन्हें अपने सहयोगियों पर नियंत्रण नहीं था।

दूसरी ओर कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी के हमलों को पुरानी घटना के सहारे ध्यान भटकाने की कोशिश बताया। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव प्रणव झा ने कहा कि चुनिंदा घटनाओं और सुनी सुनाई बातों के आधार पर आज उठ रहे गंभीर सवालों को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, निर्णय लेने की व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को लेकर उठाए जाने वाले सवाल किसी संस्था पर हमला नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस हमेशा चुनाव आयोग को संविधान के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक मानती रही है और जहां जरूरी हो वहां जवाबदेही मांगना लोकतांत्रिक अधिकार है।

देखा जाये तो कुरैशी की पुस्तक केवल इस एक विवाद तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपने लंबे प्रशासनिक जीवन के सौ महत्वपूर्ण प्रसंग इसमें शामिल किए हैं। वह लिखते हैं कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव का पद इसलिए स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उन्हें डर था कि एक मुसलमान होने के कारण उनकी योग्यता से अधिक उनके धर्म की चर्चा होगी। उनका दावा है कि बाद में एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह तक कह दिया था कि वहां पहले से एक मुसलमान मौजूद है। पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद चुनाव आयोग ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को मादक पदार्थों के चुनावी इस्तेमाल को लेकर आगाह किया था, लेकिन इस पर गंभीर ध्यान कई वर्ष बाद गया। उन्होंने राष्ट्रमंडल खेल आयोजन से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं पर भी चिंता जताने, उत्तर प्रदेश चुनाव में हाथी की मूर्तियों को ढकने के फैसले का बचाव करने और दूरदर्शन में अपनी नियुक्ति के समय सुषमा स्वराज द्वारा उनका खुलकर समर्थन किए जाने जैसी कई घटनाओं का भी विस्तार से जिक्र किया है।

कुल मिलाकर कुरैशी की पुस्तक ने एक साथ कई पुराने राजनीतिक घाव फिर से खोल दिए हैं। कहीं मनमोहन सिंह की संवेदनशील छवि सामने आती है, कहीं कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच टकराव की कहानी दिखाई देती है, तो कहीं भारतीय जनता पार्टी इन खुलासों के सहारे कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करती नजर आती है। चुनाव आयोग, सत्ता, विपक्ष और संवैधानिक संस्थाओं के इर्द गिर्द घूमती यह कहानी आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का नया केंद्र बनने वाली है।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

Maha Navami पर मां सिद्धिदात्री को लगाएं सफेद तिल का भोग, मंत्र जाप के साथ करें हवन अनुष्ठान

Tiger Shroff पर जानलेवा हमले के बाद मुश्किल घड़ी में दोस्त का साथ, देर रात अभिनेता के घर मिलने पहुंचीं Disha Patani

Meghalaya में GIS और सैटेलाइट से 3.4 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य बंजर जमीन की हुई पहचान

Shardiya Navratri की महाष्टमी पर Maa Mahagauri की पूजा और Kanya Pujan का विशेष विधान