Taslima Nasreen ने Bangladesh में अवामी लीग पर प्रतिबंध को बताया लोकतंत्र के खिलाफ

By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Aug 03, 2026

कोलकाता, दो अगस्त निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने बांग्लादेश की अवामी लीग पर प्रतिबंध का विरोध करते हुए रविवार को इस फैसले को “लोकतंत्र के खिलाफ कदम” बताया और कहा कि राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। यहां संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, तसलीमा ने बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की देश वापसी को लेकर भी अनिश्चितता जताई। हसीना (78) अगस्त 2024 में सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर हुए विरोध-प्रदर्शनों के बाद अपनी सरकार गिरने पर ढाका से भारत आ गई थीं।

अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं था। यह लोकतंत्र के खिलाफ उठाया गया कदम था। मैं चाहती हूं कि इस प्रतिबंध को जल्द से जल्द हटाया जाए।” बांग्लादेश की तत्कालीन अंतरिम सरकार ने 2025 में आतंकवाद-रोधी कानून के तहत अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया था।

तसलीमा ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश से हसीना के जाने के बाद अवामी लीग के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया था। तसलीमा ने कहा, “अवामी लीग के कई कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया गया और उनकी हत्या कर दी गई। शेख हसीना वापस लौटना चाहती हैं, लेकिन मुझे नहीं पता कि यह संभव होगा या नहीं।

लेकिन कोई यह नहीं चाहता कि मैं वापस जाऊं।” लेखिका ने 1994 में उनकी रचनाओं और धर्म पर उनके विचारों के कारण कट्टरपंथी समूहों से मिली जान से मारने की धमकियों के चलते बांग्लादेश छोड़ दिया था। निर्वासन में रह रहीं लेखिका ने कहा कि उन्हें अपने देश लौटने की बहुत कम उम्मीद है, लेकिन उनका अपने देश से भावनात्मक जुड़ाव अब भी बना हुआ है। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि मैं बांग्लादेश लौट पाऊंगी।

लेकिन अपने देश के लिए मेरा प्यार और चिंता खत्म नहीं हुई है। बांग्लादेश हमेशा मेरे मन में रहता है।” चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए तसलीमा ने कहा कि यह मामला बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे कथित अत्याचार को दिखाता है। उन्होंने दास की रिहाई की मांग की।

उन्होंने कहा, “चाहे मोहम्मद यूनुस का शासन हो या आज का तारिक रहमान का दौर, बांग्लादेश अंधेरे से बाहर नहीं निकल पाया है। धार्मिक कट्टरपंथी लगातार मजबूत हो रहे हैं। महिलाओं को अपने पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार नहीं है।” तसलीमा ने आरोप लगाया कि पड़ोसी देश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर अब भी अत्याचार हो रहे हैं और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल रही।

उन्होंने कहा, “भारत और दुनियाभर में रहने वाले प्रगतिशील बांग्लादेशियों की ओर से मैं हिंदू संत चिन्मय कृष्ण दास की रिहाई की मांग करती हूं। उनके साथ अन्याय हुआ है।” लेखिका ने बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति की भी आलोचना की और आरोप लगाया कि धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, “अब हमारे यहां जमात-ए-इस्लामी विपक्षी पार्टी है।

यह महिलाओं की समानता के खिलाफ है और शरीयत कानून लागू करना चाहती है। अगर ऐसा हुआ तो कोई भी अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं रहेगा। बांग्लादेश अंधेरे की ओर बढ़ रहा है।

कोई भी देश को सभ्य बनाने की कोशिश नहीं कर रहा। सरकार सिर्फ सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रही है।” देश में राजनीतिक अनिश्चितता के दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुओं समेत अल्पसंख्यक समुदाय बार-बार अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताते रहे हैं। इसी वर्ष फरवरी में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के अध्यक्ष तारिक रहमान ने संसदीय चुनाव में बड़ी जीत हासिल की थी और प्रधानमंत्री बने थे।

साल 2024 के छात्र आंदोलन पर सवाल उठाते हुए तसलीमा ने कहा कि आंदोलन करने वाले छात्र एकजुट नहीं रह सके। उन्होंने कहा, “बांग्लादेश के छात्र आंदोलन ने हमें धोखा दिया। हमें लगा था कि छात्र कोटा व्यवस्था खत्म करना चाहते हैं।

शेख हसीना ने उनकी मांग भी मान ली थी, लेकिन आखिर में सरकार गिर गई। बाद में हमें पता चला कि उस आंदोलन के पीछे जिहादी थे। इसका नतीजा बांग्लादेश के लिए अच्छा नहीं रहा।

वहां जिहादियों ने सत्ता पर कब्जा कर लिया।” तसलीमा ने कहा कि मदरसों का अस्तित्व नहीं होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मदरसे “जिहादी तैयार कर रहे हैं और वहां बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के मामले भी सामने आते हैं।

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