बदलाव से जुझता Tata Trusts, 157 सालों में पहली बार दो हिस्सों में बंटता दिखा, जानिए क्या है मामला ?

By Ankit Jaiswal | Oct 07, 2025

नई दिल्ली। देश की एक ऐसा नाम जिसे देश और दुनिया में भरोसे और नैतिक ईमानदारी की मिसाल माना जाता है। इन दिनों अपने भीतर एक असाधारण मतभेद का सामना कर रहा है। बात टाटा समूह, की है जिसके शीर्ष स्तर पर चल रही यह खींचतान अब इतनी गंभीर हो गई है कि केंद्र सरकार को सुलह कराने के लिए आगे आना पड़ा है। बताया जा रहा है कि दो केंद्रीय मंत्री आने वाले दिनों में टाटा समूह के सीनियर नेताओं से मुलाकात करेंगे, ताकि स्थिति को शांत किया जा सके और समूह में बैलेंस बना रहे।

मामले की जड़ टाटा संस की बोर्ड नियुक्तियों, सूचनाओं की पारदर्शिता, और कंपनी की लंबे समय से लंबित लिस्टिंग योजना से जुड़ी बताई जा रही है। ट्रस्टियों के बीच इस मुद्दे को लेकर दो खेमे बन गए हैं। एक समूह, जिसका नेतृत्व नोएल टाटा कर रहे हैं, मौजूदा हालात को रखने के पक्ष में है और कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले निरंतरता और प्रक्रिया की बात कर रहा है। दूसरा समूह, जिसमें मेहली मिस्त्री, प्रमित झावेरी, जहाँगीर और डेरियस खंबाटा जैसे नाम शामिल हैं, सुधारों की मांग कर रहा है और पुराने ढांचे को बदलने की बात कर रहा है।

तनाव तब बढ़ा जब दूसरे गुट ने ट्रस्टी विजय सिंह की दोबारा नियुक्ति का विरोध किया और नए नामित निदेशकों की नियुक्ति पर आपत्ति जताई। इसके बाद ट्रस्ट के भीतर शक्ति संतुलन तीन बनाम चार के अनुपात में बंट गया, जिससे मतभेद खुलकर सामने आ गए।

विवाद का एक और बड़ा पहलू टाटा संस की आरबीआई के नियमन के तहत "अपर लेयर एनबीएफसी" के रूप में लिस्टिंग से जुड़ा है। कंपनी पर लिस्टिंग की समयसीमा पूरी करने का दबाव है, लेकिन समूह ने एनबीएफसी पंजीकरण रद्द करने के लिए भी आवेदन किया है ताकि सार्वजनिक लिस्टिंग से बचा जा सके। इस कदम से शापूरजी पलोनजी समूह, जो टाटा संस में लगभग 18.37% हिस्सेदारी रखता है, नाराज है क्योंकि वह लिक्विडिटी बढ़ाने और मूल्यांकन सुधारने के लिए लिस्टिंग को जरूरी मानता है।

सरकार की चिंता यह है कि देश के सबसे विश्वसनीय और व्यवस्थित व्यापारिक घरानों में से एक में यदि आंतरिक कलह बढ़ती है, तो उसका असर न केवल बाजार के भरोसे पर पड़ेगा बल्कि भारतीय कॉरपोरेट गवर्नेंस मॉडल पर भी सवाल उठेंगे।

उधर, एन. चंद्रशेखरन फिलहाल निष्पक्ष रुख अपनाए हुए हैं। उन्हें ट्रस्टियों का भरोसा हासिल है और हाल ही में उनका कार्यकाल पांच साल के लिए बढ़ाया गया है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में वे बेहद सतर्क होकर कदम बढ़ा रहे हैं ताकि समूह की छवि पर कोई आंच न आए।

टाटा समूह का यह विवाद केवल एक आंतरिक शक्ति संघर्ष नहीं है। यह उस संगठनात्मक संरचना और पारदर्शिता पर भी सवाल उठाता है जिसने पिछले सौ सालों में टाटा ब्रांड को भारत की नैतिक व्यावसायिक विरासत का प्रतीक बनाया है। जानकारों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह संघर्ष तय करेगा कि टाटा समूह भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ेगा, परंपरा की राह पर या बदलाव के नए रास्ते पर।

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