By Ankit Jaiswal | Sep 24, 2026
टाटा संस के रेगुलेटरी दर्जे को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक के साथ चली लंबी प्रक्रिया अब टाटा समूह के भीतर एक अलग सवाल खड़ा कर रही है। टाटा ट्रस्ट्स के बीच यह चिंता सामने आई है कि रिजर्व बैंक के साथ कई वर्षों तक हुई बातचीत, जमा किए गए जवाब और अलग-अलग विकल्पों पर हुई चर्चा की जानकारी कंपनी के सबसे बड़े हिस्सेदार ट्रस्ट्स को पूरी तरह दी गई थी या नहीं।
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स ने इस संबंध में भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया है। यह पूरा मामला टाटा संस के उस प्रयास से जुड़ा है, जिसके तहत कंपनी ने अपनी मुख्य निवेश कंपनी के रूप में पंजीकरण खत्म करने की मांग की थी। ऐसा होने पर कंपनी को शेयर बाजार में लिस्टेड होने की जरूरत से राहत मिल सकती थी।
बता दें कि रिजर्व बैंक ने सितंबर 2022 में टाटा संस को ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी की श्रेणी में रखा था। इस श्रेणी में आने वाली कंपनियों के लिए तय नियमों के तहत शेयर बाजार में लिस्टेड होना जरूरी है। टाटा संस ने बाद में मुख्य निवेश कंपनी के रूप में अपना पंजीकरण खत्म कराने का रास्ता अपनाया, ताकि कंपनी निजी बनी रह सके।
हालांकि, 11 सितंबर 2026 को रिजर्व बैंक ने टाटा संस के इस आवेदन को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कंपनी को लागू नियमों का पूरी तरह पालन करने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा। इससे टाटा संस के शेयर बाजार में आने का रास्ता फिर खुल गया।
इसके बाद 17 सितंबर को टाटा संस के निदेशक मंडल ने शेयर बाजार में लिस्टेड होने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया। उसी बैठक में एन. चंद्रशेखरन को कंपनी के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पांच साल का एक और कार्यकाल देने का भी फैसला हुआ। दोनों फैसलों पर टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा की आपत्ति सामने आई।
टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि उसने टाटा संस के लिस्टेड होने पर सहमति नहीं दी थी और रिजर्व बैंक के फैसले के बाद सभी उपलब्ध विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए था। ट्रस्ट्स ने कंपनी की पुरानी संचालन व्यवस्था को बनाए रखने की बात भी कही है।
यहीं से निदेशक मंडल में मतभेद भी खुलकर सामने आए। नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल बढ़ाने के फैसले का विरोध किया, जबकि टाटा ट्रस्ट्स की ओर से निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने इसका समर्थन किया। लिस्टेड होने के मुद्दे पर भी वेणु श्रीनिवासन के रुख को लेकर सवाल उठाए गए हैं। ट्रस्ट्स से जुड़े पक्ष का कहना है कि कंपनी के नियमों के अनुसार ऐसे बड़े फैसलों में ट्रस्ट्स द्वारा नामित दोनों निदेशकों की सहमति की भूमिका महत्वपूर्ण है और केवल निर्णायक मत से इसकी भरपाई नहीं की जा सकती।
गौरतलब है कि टाटा ट्रस्ट्स ने पहले भी टाटा संस के शेयर बाजार में आने का विरोध किया था और कंपनी से दूसरे कानूनी और रेगुलेटरी रास्तों की तलाश करने को कहा था। इनमें कंपनी की संपत्तियों या हिस्सेदारी की संरचना में बदलाव जैसे विकल्पों पर भी चर्चा हुई है।
अब विवाद केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि रिजर्व बैंक ने पंजीकरण खत्म करने की मांग क्यों ठुकराई। बड़ा सवाल यह है कि रिजर्व बैंक के साथ पांच-छह साल तक चली प्रक्रिया में कौन-कौन से विकल्प तलाशे गए, कंपनी की ओर से क्या जवाब दिए गए और टाटा ट्रस्ट्स को इन सबकी जानकारी कब और कितनी दी गई।
आने वाले समय में टाटा संस को एक तरफ रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार लिस्टेड होने की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी, वहीं दूसरी तरफ टाटा ट्रस्ट्स के साथ मतभेद भी सुलझाने होंगे। ऐसे में कंपनी के स्वामित्व, संचालन और भविष्य की संरचना को लेकर आने वाले फैसले टाटा समूह के लिए काफी अहम माने जा रहे हैं।