China Enters India Backyard | नेपाल-बांग्लादेश में चीन की सीक्रेट एंट्री:चिकन नेक पर कितना बड़ा खतरा? | Teh Tak Part 3

By अभिनय आकाश | Sep 15, 2026

अक्टूबर 2019 की बात है महीने की 27 तारीख को दीवाली थी। लेकिन नेपाल की राजधानी काठमांडू में करीब एक पखवाड़े पहले ही दिवाली का माहौल बन गया था। रंग रोगन का काम चल रहा था, गड्ढे भरे जा रहे थे। कुल मिलाकर बोलचाल की भाषा में कहें तो एकदम चकाचक बनाने की तैयारी हो रही थी। यह सारी तैयारी पड़ोसी देश से आ रहे खास मेहमान के लिए थी। खास मेहमान थे शी जिनपिंग, चीन के राष्ट्रपति। उनसे पहले 1996 में आए थे जियांग जेमिन दोनों राष्ट्रपतियों के नेपाल आने के बीच 23 साल का फासला रहा। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह थी नेपाल और भारत की दोस्ती। कुछ सालों में यह समीकरण बदलने लगा और दोनों देशों के बीच रिश्तों में ठंडापन आ रहा है। नेपाल की गर्मजोशी उसकी उत्तर की दिशा यानी चीन के तरफ शिफ्ट होती जा रही है। चीन के दबाव में अपने फैसले लेने लगा है नेपाल। कुछ ऐसा ही हाल भारत के एक और पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश के साथ भी देखने को मिला। नेपाल और बांग्लादेश में चीन की सक्रियता पारंपरिक आर्थिक मदद से रणनीतिक तौर पर अपनी पहुँच बढ़ाने की सोची-समझी कोशिश को दिखाती है। वहाँ की घरेलू राजनीतिक गुटबाजी, बुनियादी ढाँचे की कमी और भारत के दबदबे को संतुलित करने की इन देशों की पुरानी इच्छा का फ़ायदा उठाकर, चीन ने खुद को क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और फ़ैसले लेने के ढांचे में शामिल कर लिया है।

तिब्बत के रेलवे नेटवर्क को ऊबड़-खाबड़ हिमालयी इलाकों से होते हुए सीधे काठमांडू तक बढ़ाना। तकनीकी और पर्यावरणीय रूप से जोखिम भरा होने और इसमें भारी लागत आने के बावजूद, यह लाइन बीजिंग के भू-राजनीतिक मकसद को पूरा करती है। नेपाल को उत्तर की ओर से सप्लाई का एक वैकल्पिक रास्ता देना, ट्रांज़िट पर भारत के एकाधिकार को कम करना, और भारत-गंगा के मैदानी इलाकों तक चीन की तेज़ी से नागरिक-सैन्य लॉजिस्टिक्स पहुँचाना। तातोपानी–कोदारी (अरनिको हाईवे) और रासुवागढ़ी–केरुंग बॉर्डर पॉइंट्स को अपग्रेड करने से चीन का ट्रांज़िट इंफ्रास्ट्रक्चर व्यवस्थित रूप से बढ़ा है।

एयरपोर्ट फाइनेंसिंग और व्हाइट एलिफेंट का जाल

चीन के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से लगभग 216 मिलियन डॉलर के रियायती लोन से बना यह एयरपोर्ट एक ऐसा हाई-प्रोफाइल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है जिसकी कमर्शियल व्यवहार्यता (मुनाफ़ा कमाने की क्षमता) पर सवालिया निशान हैं। भारत ने ऐसी बिजली खरीदने या नए एयर ट्रांज़िट रूट देने से इनकार कर दिया है जो सीधे तौर पर चीन द्वारा बनाए गए सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देते हों। इस वजह से पोखरा एयरपोर्ट का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है और काठमांडू पर कर्ज़ चुकाने का बोझ बढ़ गया है। जब प्रोजेक्ट्स से पर्याप्त ऑपरेशनल रेवेन्यू (कामकाज से होने वाली कमाई) नहीं मिल पाता, तो बीजिंग को शर्तों पर दोबारा बातचीत करने, इक्विटी स्वैप (हिस्सेदारी की अदला-बदली) के लिए दबाव डालने या खास द्विपक्षीय रेगुलेटरी छूट हासिल करने का मौका मिल जाता है।

बांग्लादेश: रणनीतिक घेराबंदी और चोकपॉइंट पर दबाव

बांग्लादेश बंगाल की खाड़ी में एक अहम जगह पर है; इसकी सीमा भारत के आठ पूर्वोत्तर राज्यों से लगती है और यह बहुत ज़रूरी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के ठीक दक्षिण में स्थित है। इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर और बंदरगाहों पर पकड़: पद्मा ब्रिज रेल लिंक - इस प्रोजेक्ट को ज़्यादातर चीनी इंजीनियरिंग कंपनियों ने फंड किया और बनाया। इसने दक्षिण-पश्चिमी बांग्लादेश में कनेक्टिविटी को बदल दिया और दिखाया कि चीन बड़े और मुश्किल राष्ट्रीय गौरव वाले प्रोजेक्ट्स को पूरा कर सकता है। समुद्री पहुँच (मोंगला और पायरा): चीन ने मोंगला बंदरगाह और उसके आस-पास के इंडस्ट्रियल इकोनॉमिक ज़ोन में गहरे समुद्र में आधुनिकीकरण के लिए पैसा लगाया है। बंगाल की खाड़ी के बंदरगाहों पर नियंत्रण या गहरी तकनीकी मौजूदगी से पूरे उत्तरी हिंद महासागर में समुद्री लॉजिस्टिक्स और नौसेना की गतिविधियों पर लंबे समय तक नज़र रखी जा सकती है। तीस्ता नदी का व्यापक प्रबंधन और बहाली प्रोजेक्ट (1 अरब डॉलर से ज़्यादा का प्रस्ताव) में ड्रेजिंग, तटबंध बनाना और नदी के किनारे इंडस्ट्रियल टाउनशिप बनाना शामिल है। भू-राजनीतिक दरार: तीस्ता नदी सिक्किम से निकलती है और उत्तरी बांग्लादेश में प्रवेश करती है। भारत में राज्य-स्तर पर घरेलू विरोध के कारण भारत और बांग्लादेश तीस्ता जल-बंटवारे के आधिकारिक समझौते को हल नहीं कर पाए, इसलिए चीन ने इस खाली जगह का फ़ायदा उठाया। तीस्ता के किनारे काम कर रहे चीनी इंजीनियर बीजिंग को सिलीगुड़ी कॉरिडोर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर लाते हैं, जिससे भारत की मुख्य रणनीतिक कमज़ोरी के पास उनकी सक्रिय मौजूदगी बन जाती है।

भारत के रणनीतिक जवाबी उपाय 

क्षेत्रीय व्यापार को भारत की मुख्य भूमि से जोड़ने के लिए रेलवे लिंक (जैसे, नेपाल में जोगबनी-बिरटनगर, बांग्लादेश के साथ अखौरा-अगरतला) और इनलैंड वॉटरवे (आंतरिक जलमार्ग) के लिए फंड देना। ऊर्जा व्यापार से जुड़ी शर्तें: भारत ऐसी नीतियां लागू करता है जो चीनी इक्विटी या ठेकेदारों द्वारा बनाए गए प्रोजेक्ट से पैदा हुई बिजली की खरीद या ट्रांज़िट को रोकती हैं, जिससे नेपाल के हाइड्रोपावर सेक्टर में चीनी निवेश पर सीधा असर पड़ता है। किसी एक पार्टनर पर निर्भरता कम करने और संस्थागत मजबूती बनाने के लिए BIMSTEC और BBIN (बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल) मोटर वाहन और ट्रांज़िट फ्रेमवर्क को फिर से सक्रिय करना।

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