European Union History Part 1 | 1945 के बाद बर्बाद यूरोप कैसे बना दुनिया का इकोनॉमिक पावरहाउस|Teh Tak

By अभिनय आकाश | Apr 29, 2026

साल 1945 पिछले 6 साल से चल रहा वर्ल्ड वॉर खत्म होता है। लेकिन अपने पीछे छोड़ जाता है तबाही का मंजर। यूरोप का ज्यादातर हिस्सा खंडहर बन चुका था। हां कुछ देशों की जीत जरूर हुई थी लेकिन उनकी भी इंडस्ट्रीज इंफ्रास्ट्रक्चर और इकॉनमी कमजोर हालत में थे। इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन से अमीर हुए इंग्लैंड जैसे देश के भी ज्यादातर ट्रेजरीज वॉर लड़ने में खाली हो चुकी थी। यूरोप के सामने फूड शॉर्टेज और हजारों डिस्प्लेस रिफ्यूजीस का संकट था। इसके अलावा बहुत से देशों ने वॉर टाइम एफर्ट्स को जारी रखने के लिए पैसा उधार लिया हुआ था, खासकर यूनाइटेड स्टेट्स अमेरिका से और अब जब उनकी इकॉनमी एकदम खस्ता हालत में थी तब इस स्थिति से निकलना असंभव सा लग रहा था। लेकिन इतिहास गवाह है कि यूरोप एक बार फिर उठ खड़ा हुआ और दुनिया का इकोनॉमिक सेंटर बनकर उभरा पर इतनी खराब सिचुएशन में आखिर यूरोप कैसे खुद को रिबिल्ड करता है।

यूरोप को रिबिल्ड करना मकसद

यूएसए को डर था कि वर्ल्ड वॉर ट के बाद पॉवर्टी अनइंप्लॉयमेंट और डिसलोकेशन जैसी प्रॉब्लम्स वेस्टर्न यूरोप के वोटर्स को कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी की तरफ आकर्षित कर सकती हैं। इसलिए 5 जून 1947 को अपनी स्पीच में यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जॉर्ज मार्शल यूरोपियन रिकवरी प्रोग्राम की अनाउंसमेंट करते हैं, जिसे पॉपुलर मार्शल प्लान के नाम से जाना जाता है इस प्लान का मकसद यूरोप को रिबिल्ड करना था। इसके तहत करीब 13.3 बिलियन डॉलर्स की असिस्टेंसिया नेशंस को दी जाती है और यह 1947 से लेकर 1951 तक चलता है यानी कि 4 साल के लिए इनिशियली मार्शल प्लान सभी यूरोपियन नेशंस के लिए ओपन था। यहां तक कि यूएसएसआर के लिए भी। मार्शल प्लान के कंप्लीट होने के समय यूरोप का एग्रीकल्चरल और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन दोनों ही पहले से काफी बढ़ चुका था। बैलेंस ऑफ ट्रेड में इंप्रूवमेंट आया था साथ ही ट्रेड लिबरलाइजेशन और इकोनॉमिक इंटीग्रेशन की दिशा में कदम उठाए जा चुके थे।

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सोवियत का मोलोटोव  प्लान

ईस्टर्न ब्लॉक की इकोनॉमिक यूनिटी की तरफ यूएसएसआर कुछ कदम उठाता है। इस दिशा में पहला स्टेप मलोटो प्लान के रूप में आता है। इसे अमेरिका के मार्शल प्लान के जवाब में रूसी फॉरेन मिनिस्टर मलोटो ने प्रपोज किया था। यह  यूएसएसआर और ईस्टर्न यूरोप के देशों के बीच ट्रेड एग्रीमेंट की तरह था। इसे 1947 में नेगोशिएट किया जाता है जिसका एम ईस्टर्न यूरोप में ट्रेड को बूस्ट करना था। मोलोटोव  प्लान के बाद यूएसएसआर 1949 में कॉमकॉन यानी कि काउंसिल फॉर म्यूचुअल इकोनॉमिक असिस्टेंसिया जाता है और एग्रीकल्चर का कलेक्टिवाइजेशन होता है यानी कि उसे बड़े और स्टेट द्वारा ओन फार्म्स में बदल दिया जाता है एक तरह से ईस्टर्न यूरोप में सोवियत इकोनॉमिक प्रिंसिपल्स को अप्लाई कर दिया जाता है इन सभी एफर्ट्स की वजह से ईस्टन यूरोप इकोनॉमिकली कुछ सक्सेस जरूर हासिल करता है उसकी प्रोडक्शन स्टेटली इंक्रीज करती है हालांकि इनकी एवरेज जीडीपी और जनरल एफिशिएंसी यूरोपियन कम्युनिटी यानी ईसी से काफी कम रहती है। ईस्टर्न यूरोप का एक देश अल्बेनिया तो पूरे यूरोप का सबसे बैकवर्ड देश कहलाता है। इसके बाद 1980 में ईस्टर्न स्टेट्स के इकॉनमी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यहां जरूरी चीजों की शॉर्टेजेस होने लगती हैं। इंफ्लेशन बढ़ता ही जाता है और लोगों का लिविंग स्टैंडर्ड बहुत नीचे गिरने लगता है। इसका इफेक्ट 1990 में देखने को मिलता है जब ईस्टर्न यूरोप के देश एक-एक करके यूएसएसआर से अलग होना शुरू कर देते हैं। 1991 में बर्लिन वॉल के फॉल के साथ यूरोप का आयन कर्टन भी गिर जाता है और यूरोप का दो ब्लॉक्स में डिवीजन खत्म हो जाता है।

सोवियत का विघटन

ईस्टर्न यूरोप के देश वेस्टर्न यूरोप की तुल में काफी पीछे रह गए जिसका इफेक्ट हमें आज तक देखने को मिलता है और यह फर्क सिर्फ मार्शल प्लान और सोवियत प्लांस की वजह से नहीं आया था बल्कि वेस्टर्न यूरोप के नेशंस द्वारा अपने स्तर पर भी कुछ एफर्ट्स किए गए थे जो रिकवरी को और स्ट्रांग बनाते हैं आइए इन एफर्ट्स की भी चर्चा करते हैं यूरोपियन एफर्ट्स फॉर द रिकवरी यूरोपियन नेशंस समझ चुके थे कि जल्द ही अगर उन्होंने खुद को रिबिल्ड नहीं किया तो यूरोप हमेशा के लिए पावरलेस हो जाएगा। यूएस और यूएसएसआर दुनिया की सुपर पावर्स बन चुके थे। ऐसे में बैलेंस ऑफ पावर को बनाए रखने के लिए यूरोप का पावरफुल होना बहुत जरूरी था नहीं तो वह सिर्फ सुपर पावर नेशंस के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाता।

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