Vanakkam Poorvottar: Thalapathy Vijay ने DMK से सीधी भिड़ंत का किया ऐलान, CM Stalin की चुनौतियाँ बढ़ीं

By नीरज कुमार दुबे | Nov 06, 2025

तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से सिनेमा और सत्ता के संगम का अखाड़ा रही है। अन्नाद्रमुक और द्रमुक जैसे दिग्गज दलों के बीच दशकों से चले आ रहे वैचारिक संघर्ष के बीच अब एक नया किरदार उभरा है— थलपति विजय। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्त्रि कझगम (TVK) ने अपने सामान्य परिषद अधिवेशन में यह स्पष्ट कर दिया है कि 2026 के विधानसभा चुनावों में उनका एकमात्र चेहरा और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार विजय ही होंगे। साथ ही, पार्टी ने उन्हें संभावित गठबंधनों पर पूर्ण अधिकार भी सौंपा है।


यह निर्णय उस समय आया है जब एआईएडीएमके (AIADMK) की ओर से गठबंधन के संकेत मिल रहे थे और राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनने की चर्चाएँ तेज थीं। पर विजय ने साफ कर दिया कि लड़ाई किसी तीसरे मोर्चे की नहीं, बल्कि “द्रमुक बनाम टीवीके” की होगी। यह बयान जितना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, उतना ही यह जनता के बीच “साफ-सुथरे विकल्प” की छवि गढ़ने की कोशिश भी है।


करूर में हुई भयावह भगदड़ जिसमें 41 लोग मारे गये थे, उसके बाद यह टीवीके की पहली बड़ी बैठक थी जिसमें विजय का संबोधन हुआ। विजय ने सभा में भावुक होकर कहा कि उनकी पार्टी ने इस त्रासदी के बाद “कर्तव्य और शोक” के चलते मौन साधा, लेकिन उसी दौरान राजनीतिक प्रचार और “झूठी कहानियों” का सामना करना पड़ा। उन्होंने मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन पर निशाना साधते हुए कहा कि विधानसभा में दिया गया उनका बयान “राजनीतिक द्वेष से भरा हुआ” था। हम आपको याद दिला दें कि स्टालिन ने त्रासदी के लिए “भीड़ प्रबंधन की कमी” को जिम्मेदार ठहराया था। इस पर पलटवार करते हुए विजय ने कहा कि सरकार ने उनके आयोजनों को जानबूझकर तंग जगहों पर आयोजित करवाया, ताकि भीड़भाड़ बढ़े और असुविधा पैदा हो। यह आरोप केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि नीतिगत विश्वासघात का संकेत था— जहाँ विपक्षी दल को समान अवसर तक न मिले।

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हम आपको याद दिला दें कि करूर कांड की जांच के लिए राज्य सरकार ने अरुणा जगदीशन आयोग गठित किया था, जिसे विजय ने “जल्दबाजी में लिया गया निर्णय” बताया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले को सीबीआई को सौंपने और आयोग को निलंबित करने के बाद विजय को यह अवसर मिल गया कि वह इसे “राज्य सरकार की असफलता” के रूप में पेश करें। यह रणनीतिक रूप से सटीक चाल है— जनभावना के स्तर पर यह दिखाने के लिए कि न्याय केवल केंद्र से मिलेगा, राज्य से नहीं। विजय ने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंसें जांच को प्रभावित करने के उद्देश्य से आयोजित की गईं। उनका यह कथन न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठाता है बल्कि तमिल राजनीति के उस पुराने पैटर्न को भी सामने लाता है जहाँ सत्ता पक्ष हर संकट को “विपक्ष की साजिश” और विपक्ष हर कार्रवाई को “राजनीतिक बदले” की संज्ञा देता है।


देखा जाये तो विजय का यह भाषण केवल बचाव भर नहीं था; यह 2026 के चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत थी। उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को सीधे-सीधे चुनौती दी— यह कहते हुए कि “तमिलनाडु की जनता अब द्रमुक की राजनीति से ऊब चुकी है और 2026 में उसे जवाब देगी।” इस बयान में करुणानिधि युग से चले आ रहे द्रमुक के राजनीतिक एकाधिकार को तोड़ने की आकांक्षा झलकती है।


लेकिन विजय की सबसे बड़ी ताकत उनका जन-संवेदना से जुड़ाव और “गैर-राजनीतिक छवि” है। करूर त्रासदी के बाद उन्होंने राजनीतिक रैलियों से दूरी बनाई, पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और खुद को “संवेदनशील और जिम्मेदार नेता” के रूप में पेश किया। तमिल राजनीति में जहाँ अतीत में एम.जी.आर. और जयललिता जैसे फिल्मी सितारों ने सत्ता के समीकरण बदले, विजय उसी परंपरा के नए अध्याय की तैयारी करते दिखाई देते हैं।


हालाँकि तमिल राजनीति में द्रमुक और अन्नाद्रमुक की पकड़ अब भी मजबूत है, पर जन असंतोष और युवा मतदाताओं का झुकाव विजय को अवसर दे सकता है। उनकी पार्टी टीवीके अपेक्षाकृत नई है, संगठनात्मक ढाँचा सीमित है, पर लोकप्रियता अपार है। यदि वह अपनी छवि को “भ्रष्टाचार और परिवारवाद विरोधी” विकल्प के रूप में बनाए रख पाते हैं, तो 2026 के चुनावों में वे निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं—चाहे सत्ता में आएँ या किसी गठबंधन का रुख तय करें।


लेकिन यह भी सच है कि विजय के सामने चुनौतियाँ कम नहीं है। राजनीति केवल भावनाओं की नहीं, संगठन और रणनीति की भी होती है। अभी तक टीवीके का कैडर स्तर पर कोई ठोस ढाँचा नहीं दिखता। दूसरी ओर, द्रमुक के पास गहरी जड़ें हैं, अनुभवी नेतृत्व है और प्रशासनिक तंत्र का अनुभव भी।


बहरहाल, तमिल राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर में है। द्रमुक की सत्ता और भाजपा-अन्नाद्रमुक की संभावित एकता के बीच विजय का उभार एक नई राजनीतिक भाषा की शुरुआत है— जहाँ फिल्मी करिश्मा और जनवेदना का मेल सत्ता की कुंजी बन सकता है। विजय का संदेश स्पष्ट है- वह खुद को न सिर्फ एक अभिनेता, बल्कि जनता की आवाज़ के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। करूर जैसी त्रासदी के बाद भी यदि वह जनसमर्थन बनाए रखते हैं, तो यह संकेत है कि तमिलनाडु की जनता अब “राजनीतिक वंशवाद” से परे एक नए नेतृत्व की तलाश में है।


2026 के चुनावों में यह संघर्ष केवल दो दलों के बीच नहीं होगा— यह “भावना बनाम अनुभव”, “जनता बनाम व्यवस्था” और “विश्वसनीयता बनाम परंपरा” की लड़ाई होगी। विजय ने पहला कदम बढ़ा दिया है; अब देखना यह है कि क्या तमिल राजनीति इस नई पटकथा को स्वीकार करती है या फिर पुराने कलाकार ही मंच संभाले रहते हैं।

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