शशि थरूर ने परिवारवाद की मजबूत दीवारें हिला कर राजनीति की सबसे बड़ी समस्या दूर करने का प्रयास किया

By नीरज कुमार दुबे | Nov 04, 2025

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद डॉ. शशि थरूर ने हाल ही में एक लेख में भारत की राजनीति में जड़ जमाए हुए “परिवारवाद” (dynastic politics) पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब राजनीतिक दलों को वंशानुगत नेतृत्व से आगे बढ़कर “योग्यता आधारित लोकतंत्र” (meritocracy) की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। थरूर के इस वक्तव्य ने न केवल सत्तारुढ़ भाजपा बल्कि स्वयं कांग्रेस पार्टी के भीतर भी तीखी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न की हैं।

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इसी क्रम में कांग्रेस नेता रशीद अलवी ने भी थरूर का प्रतिवाद करते हुए कहा कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है— कोई यह नहीं कह सकता कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए चुनाव लड़ने से रोका जाए क्योंकि उसके पिता सांसद थे। एक अन्य कांग्रेस नेता उदित राज ने इस बहस को और व्यापक करते हुए कहा कि परिवारवाद केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। “डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनता है, व्यापारी का पुत्र व्यापारी बनता है, तो फिर राजनीतिज्ञ का पुत्र राजनीतिज्ञ क्यों नहीं बन सकता?” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारतीय राजनीति में टिकट वितरण प्रायः जातीय और पारिवारिक आधार पर होता है।

उधर, भाजपा ने इस विवाद का राजनीतिक लाभ उठाते हुए कहा कि थरूर का लेख “भारतीय राजनीति के परिवार-व्यवसाय में बदल जाने” पर एक सटीक टिप्पणी है। भाजपा प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने इसे “राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर अप्रत्यक्ष प्रहार” बताया।

हम आपको यह भी बता दें कि शशि थरूर का यह लेख ऐसे समय सामने आया है जब उनका कांग्रेस नेतृत्व के साथ संबंध बीते कुछ समय से तनावपूर्ण रहा है, विशेषकर उस समय से जब उन्होंने मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा था। उनके हालिया वक्तव्य पार्टी की नीतिगत असहजता को और उजागर करते हैं।

देखा जाये तो भारतीय राजनीति का एक स्थायी चरित्र यह बन चुका है कि नेतृत्व अक्सर योग्यता या जनसंवाद की बजाय वंशगत परंपरा से निर्धारित होता है। शशि थरूर की यह टिप्पणी कि “राजनीतिक शक्ति जब वंश के आधार पर तय होती है, तब शासन की गुणवत्ता गिर जाती है”, हमारे लोकतंत्र की एक गहरी समस्या को उजागर करती है। वैसे भारतीय राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से ही नेहरू-गांधी परिवार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का केंद्रबिंदु बना रहा। लेकिन आज यह प्रवृत्ति लगभग हर दल में दिखाई देती है— चाहे वह समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव का परिवार हो, एनसीपी में शरद पवार का, डीएमके में करुणानिधि का, या अकाली दल में बादल परिवार का। सत्ता की विरासत एक प्रकार से “राजनीतिक उत्तराधिकार” का रूप ले चुकी है।

परिवारवाद के समर्थक इसे “अनुभव की निरंतरता” या “जनप्रियता का उत्तराधिकार” मानते हैं। प्रमोद तिवारी और रशीद अलवी जैसे नेताओं का यह तर्क कि “जनता ही अंतिम निर्णायक है” लोकतांत्रिक रूप से सही प्रतीत होता है, लेकिन यह तर्क संरचनात्मक असमानता को छिपा देता है। जब किसी राजनीतिक परिवार के बच्चे बचपन से ही सत्ता, संसाधन और जनसंपर्क के दायरे में पलते हैं तो स्वाभाविक रूप से उन्हें राजनीतिक अवसर सामान्य कार्यकर्ताओं की तुलना में कहीं अधिक आसानी से मिल जाते हैं। यह लोकतंत्र में अवसर-समानता की अवधारणा को कमज़ोर करता है।

साथ ही उदित राज का यह तर्क कि “हर क्षेत्र में परिवारवाद है”, आंशिक रूप से सही होते हुए भी, राजनीति के संदर्भ में खतरनाक है। क्योंकि राजनीति केवल एक पेशा नहीं, बल्कि लोकसेवा और नीति-निर्माण का माध्यम है। जब इस क्षेत्र में वंशानुगत अधिकार हावी हो जाता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे गणतंत्र से कुलीनतंत्र की ओर बढ़ने लगता है।

शशि थरूर के लेख से निकले राजनीतिक संदेश को देखें तो यह प्रतीत होता है कि उनका लेख केवल एक सैद्धांतिक आलोचना नहीं है; यह कांग्रेस समेत भारतीय राजनीति की आत्मपरीक्षा का आग्रह है। वह यह मानते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार का ऐतिहासिक योगदान निर्विवाद है लेकिन अब उस "इतिहासजन्य वैधता" को लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व में बदलना आवश्यक है। उनका संदेश यह है कि कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी यदि वास्तव में पुनर्जीवित होना चाहती है, तो उसे वंशवादी ढांचे से बाहर निकलकर “योग्यता, कार्यक्षमता और जनसंपर्क पर आधारित नेतृत्व” को प्राथमिकता देनी होगी। देखा जाये तो शशि थरूर का यह रुख भाजपा या अन्य दलों के लिए भी एक अप्रत्यक्ष चुनौती है। क्योंकि परिवारवाद का दंश केवल कांग्रेस में नहीं, बल्कि हर राजनीतिक संगठन में है। भाजपा, जो अक्सर कांग्रेस को “परिवारवादी पार्टी” कहती है, स्वयं भी राज्य स्तर पर ऐसे नेताओं से भरी है जिनके बेटे और रिश्तेदार सत्ता में हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि परिवारवाद का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत— “हर नागरिक को समान अवसर”, को कमजोर करता है। यह उस वर्ग को हाशिए पर धकेल देता है जो बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के, केवल अपनी क्षमता और जनसेवा के बल पर आगे बढ़ना चाहता है। शशि थरूर का संदेश यह है कि भारतीय राजनीति को “वंशवाद की स्थायी परंपरा” से मुक्त कर, नव-राजनीतिक संस्कृति की ओर बढ़ना होगा, जहाँ नेतृत्व का निर्धारण जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से हो।

बहरहाल, परिवारवाद से उपजी समस्या केवल किसी एक पार्टी की नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ी हुई है। अगर इस प्रवृत्ति को चुनौती नहीं दी गई, तो भविष्य में हमारा लोकतंत्र “जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन” कम और “परिवार द्वारा, परिवार के लिए, परिवार का शासन” अधिक बन जाएगा। इसलिए शशि थरूर की यह आवाज़ भले ही कांग्रेस के भीतर असुविधा उत्पन्न करे, मगर भारतीय राजनीति के लिए यह एक आवश्यक आत्मसंवाद की शुरुआत है। उनकी यह अपील किसी एक नेता या परिवार के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस मानसिक संरचना के विरुद्ध है जो योग्यता को वंश के अधीन मानती है।

-नीरज कुमार दुबे

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