By अशोक भाटिया | Sep 24, 2026
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जहां जन-कल्याण को शासन का मूलमंत्र माना जाता है, वहां स्वास्थ्य का क्षेत्र एक गंभीर संक्रमण काल से गुजर रहा है। बीमारियां जिस रफ्तार से बढ़ रही हैं, उससे कहीं अधिक तेजी से चिकित्सा के नाम पर इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ का एक भयावह और अनैतिक तंत्र विकसित हो चुका है। हाल ही में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में मुनाफे की हवस और मरीजों के साथ हो रही धोखाधड़ी की गूंज देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनाई दी है। न्याय के सर्वोच्च मंदिर ने दवा निर्माताओं, अस्पतालों और सरकारी नियामक संस्थाओं के रवैये पर जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, उसने हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रयुक्त यह वाक्य—"यह तो सीधे तौर पर दिन-दहाड़े डकैती है"—महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस लाचार भारतीय नागरिक की सामूहिक चीख का प्रतिनिधित्व करता है, जो बीमारी से पहले इलाज के खर्च और उसमें होने वाली जालसाजी से मर जाता है।
न्यायालय के समक्ष जो तथ्य उभरकर सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील समाज को स्तब्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। खासकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों के घावों पर जिस तरह मुनाफाखोरी का नमक छिड़का जा रहा है, वह अमानवीयता की पराकाष्ठा है। अदालत के संज्ञान में लाया गया कि कैंसर की एक आवश्यक जीवन रक्षक दवा, जिसकी कीमत निर्माता कंपनी द्वारा रिटेलर के लिए महज ₹2,700 तय की जाती है, उस पर अधिकतम खुदरा मूल्य पूरे ₹27,000 छाप दिया जाता है। यानी कि लागत और थोक मूल्य से ठीक दस गुना अधिक दाम पर उस दवा को बेचे जाने की खुली छूट दे दी गई। एक पीड़ित परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अकल्पनीय मूल्य अंतर पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने सीधे शब्दों में सवाल पूछा कि मरीजों को इस तरह बेदर्दी से लूटने की इजाजत व्यवस्था कैसे दे सकती है? निर्माता कंपनियां और बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट फार्मेसियां मिलकर मरीजों की जेब पर जो डाका डाल रही हैं, उस पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसी नियामक इकाइयां आंखें मूंदकर क्यों बैठी हैं?