बहस हिजाब बनाम बिंदी-सिंदूर नहीं, रूढ़िवादी विचारों के खिलाफ हो

By अजय कुमार | Feb 19, 2022

हिजाब की तुलना बिंदी चूड़ी पगड़ी से करना कुतर्क के अलावा कुछ नहीं है। यदि तुलना करना ही है तो इस बात की कि जाए कि क्यों देश पर तीन सौ साल राज करने वाले मुगलों की संताने शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ती जा रही हैं। क्यों जब पूरी दुनिया में मुसलमान अन्य कौमों के साथ रूढ़िवादी रवायतों को छोड़कर आगे बढ़ रहे है तब हिन्दुस्तानी मुस्लिम महिलाएं हिजाब के लिए पढ़ाई-लिखाई छोड़ने तक की बात कर रही हैं। हिजाब की जगह मुस्लिम महिलाएं यदि हलाला, बहु-विवाह प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ आगे आकर आंदोलन चलाती तो यह मुस्लिम समाज और महिलाओं के लिए बेहतर भविष्य के लिए मील का पत्थर साबित होता। मुस्लिम समाज को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि क्यों पूरी दुनिया में आतंकवादी उन्हीं के बीच से निकलते हैं। गैर मुस्लिमों उसमें भी हिंदुओं में क्यों आतंकवादी, जिहादी देशद्रोही, संविधान विरोधी, दंगाई, गैर हिंदुओं को काफ़िर मानने वाले कहीं नहीं दिखाई देते हैं। क्यों हिंदू लोग अपने धर्म ग्रंथों की आड़ में देशद्रोही ताकतों के हाथ का खिलौना नहीं बनते हैं। विदेशों मे देश के खिलाफ प्रोपोगंडा नहीं करते हैं। हिन्दुस्तानी मुसलमानों के बीच से ही ऐसे लोग क्यों निकलते हैं जो अपने ही देश के खिलाफ मुसलमानों पर अत्याचार की कहानी गढ़ के संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) को चिट्ठी लिखते हैं, जबकि पाकिस्तान और बंगलादेश में हिन्दुओं के साथ कैसा सलूक होता है,इस पर देश के मुसलमान और उसमें भी मुस्लिम बुद्धिजीवी अपनी जुबान नहीं खोलते हैं। आश्चर्य तब होता है जब इंसटेंट तीन तलाक (एक बार में तीन तलाक) के खिलाफ मोदी सरकार कानून बनाती है तो उसके विरोध में भी मुस्लिम महिलाएं सड़कों पर बैठ जाती हैं।हलाला जैसी कुंरीतियों के पक्ष में खड़ी नजर आती हैं।

यह अफसोसजनक है कि जब ईरान जैसे कट्टर मुस्लिम देश में महिलाएं बुर्के के खिलाफ और शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही हैं। सऊदी अरब में महिलाएं आधुनिकता की ओर बढ़ रही हैं, वहीं भारतीय मुस्लिम लड़कियां हिसाब के लिए आपे से बाहर होती जा रही हैं। हिजाब का समर्थन वह बुद्धिजीवी भी कर रहे हैं जो अफगानिस्तान में बुर्का न पहनने वाली स्त्रियों के कोड़े मारने वाले तालिबानियों को कोसते-काटते हैं। जब से हिजाब चर्चा में आया है तब से हिजाब की बिक्री बढ़ गई है। अचानक ही सड़कों पर हिजाब पहन कर घूमने वाली लड़कियों औरतों की संख्या बढ़ गई है। अफसोसजनक है कि कुछ बड़े मुस्लिम चेहरे और धर्मगुरू ऐसे भी हैं जो अपनी बच्चियों को तो देश-विदेश में बिना हिजाब लगाए शिक्षा दिला रहे हैं, लेकिन आम मुसलमान की लड़कियों के बारे में कह रहे हैं कि पढ़ाई से जरूरी हिजाब हैं। ओवैसी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। कर्नाटक में कुछ छात्राएं हिजाब पहनकर पढ़ाई करने पर आमादा हुई तो इसकी तपिश उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिलने लगी है। गौरतलब हो, कर्नाटक के उडुपी जिले के एक सरकारी कालेज में इस विवाद ने तब तूल पकड़ा, जब इसी दिसंबर की शुरुआत में छह छात्राएं हिजाब पहनकर कक्षा में पहुंच गईं। इसके पहले वे कालेज परिसर में तो हिजाब पहनती थीं, लेकिन कक्षाओं में नहीं।

आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि वे अध्ययन कक्ष में हिजाब पहनकर जाने लगीं? इस सवाल की तह तक जाने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि एक तो यह विवाद देश के दूसरे हिस्सों को भी अपनी चपेट में लेता दिख रहा और दूसरे, इसके पीछे संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले कैंपस फ्रंट आफ इंडिया का हाथ दिख रहा है। यह पापुलर फ्रंट आफ इंडिया की छात्र शाखा है। यह फ्रंट किसान आंदोलन और सीएए के दौरान दिल्ली में हुए दंगे के समय भी काफी एक्टिव नजर आया था। सुनियोजित तरीके से दिल्ली दंगा तब कराया गया था,जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प भारत के दौरे पर थे। माना जाता है कि यह फ्रंट प्रतिबंधित किए जा चुके  मुस्लिम छात्र संगठन सिमी का नया अवतार है। हिजाब समर्थकों द्वारा सुनियोजित तरीके से इस तरह का दुष्प्रचार किया जा रहा है, मानों पूरे हिन्दुस्तान में मुस्लिम महिलाओं को हिजाब नहीं पहनने दिया जा रहा है। यह सब मोदी विरोधी के चलते भी हो रहा है क्योंकि जब से मोदी ने सत्ता संभाली है तब से उग्रवादी मुस्लिम संगठनों की दाल नहीं गल पा रही है। विदेश से आने वाली मुस्लिम फंडिंग पर भी मोदी सरकार ने शिकंजा कस रखा है। कश्मीर से धारा 370 खत्म किए जाने की वजह से भी मोदी देश-विदेश के कट्टर मुस्लिमों के निशाने पर हैं। इसी लिए मोदी सरकार को कमजोर करने के लिए समय-समय पर कोई न कोई मुद्दा मुस्लिम संगठनों द्वारा उठाया जाता रहता है।यह सिलसिला खत्म होने वाला नहीं है। मोदी सरकार को इन्हीं दुश्विारियों के बीच सरकार चलानी होगी।

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यह सच है कि किसी को भी अपनी पसंद के परिधान पहनने की पूरी आजादी है, लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं। हमारी आजादी तब खत्म हो जाती है, जब इस आजादी से दूसरे को परेशानी होने लगती है। फिर शैक्षिक संस्थाओं का तो ड्रेस कोड होता है, जो सबके लिए अनिवार्य होता है। स्कूल-कालेज में विद्यार्थी मनचाहे कपड़े पहनकर नहीं जा सकते। इसका एक बड़ा कारण छात्र-छात्राओं में समानता का बोध कराना भी होता है। ताकि जब यह समाज में आगे बढ़ें तो इन्हें कोई दिक्कत नहीं आए। दुर्भाग्यपूर्ण केवल यह नहीं कि जब दुनिया भर में लड़कियों-महिलाओं को पर्दे में रखने वाले परिधानों का करीब-करीब परित्याग किया जा चुका है और इसी क्रम में अपने देश में घूंघट का चलन खत्म होने को है, तब कर्नाटक में मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहनने की जिद कर रही हैं। यह न केवल कूप-मंडूकता और एक किस्म की धर्माधता है, बल्कि स्त्री स्वतंत्रता में बाधक उन कुरीतियों से खुद को जकड़े रखने की सनक भी, जिनका मकसद ही महिलाओं को दोयम दर्जे का साबित करना है। समय की मांग है कि जिस तरह से हिन्दू समाज सती प्रथा, विधवा विवाह, घुंघट प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ लामबंद हुए थे, वैसे ही मुस्लिम समाज भी अपने बीच की कुरीतियों से मुक्ति पाने के लिए आगे आए। 

कुल मिलाकर कभी सीएए के विरोध के नाम पर, कभी रोहनिया मुसलमानों को देश से बाहर निकालने के खिलाफ, कभी आतंकवादियों को फांसी देने के विरोध में, कभी पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक पर हंगामा खड़ा करने वालों, कोर्ट का आदेश ना मानने वालों, जिस पार्टी को हिंदू वोट करते हों उसे कभी वोट ना देने की कसम खाने वालों, और अब हिज़ाब के नाम पर बखेड़ा खड़े करने वालों, हिंदुस्तान में गजवा-ए-हिंद का सपना पालने वालों से कभी भी देश प्रेम या सौहार्द की उम्मीद नहीं की जा सकती है। भले ही ऐसी अराजक शक्तियां बहुत सीमित हों, लेकिन सबसे दुखद यह है कि इन शक्तियों का मुस्लिम बुद्धिजीवी और मुल्ला मौलाना मुखालफत करने से बचते रहते हैं।

- अजय कुमार

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