By नीरज कुमार दुबे | Nov 11, 2025
दिल्ली कार धमाका केवल सुरक्षा की विफलता नहीं बल्कि यह सामाजिक और वैचारिक विफलता भी है। सवाल उठता है कि हमारे इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर, जिन्हें राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए थी, वे आतंक की राह क्यों पकड़ रहे हैं? सवाल उठता है कि चीन में यह समस्या क्यों नहीं है? क्योंकि वहां राष्ट्र सर्वोपरि है— वहां कोई विचार, कोई धर्म, कोई संगठन देश के ऊपर नहीं रखा जा सकता। भारत लोकतांत्रिक है, पर लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि देशविरोध को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा जाए। वक्त आ गया है कि कानून के डर का पुनर्जागरण होना चाहिए। आतंकी सोच रखने वाले चाहे विश्वविद्यालयों में हों, धार्मिक संस्थानों में हों या सोशल मीडिया पर, उनके लिए केवल एक संदेश होना चाहिए कि भारत के खिलाफ़ सोचने की कीमत बहुत भारी पड़ेगी। हमें नारे नहीं, नीति चाहिए। धर्म के नाम पर देश को तोड़ने वालों के लिए ज़ीरो टॉलरेंस ही असली धर्म है।