TMC स्थापना दिवस पर ममता बनर्जी के संदेश में दिखी निराशा ने उनकी 'कमजोर स्थिति' उजागर की

By नीरज कुमार दुबे | Jan 01, 2026

तृणमूल कांग्रेस के स्थापना दिवस पर इस बार पार्टी का रुख आत्मविश्वास से भरा दिखने की बजाय आत्मरक्षा करता हुआ ज्यादा नजर आया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए दुष्ट ताकतों के आगे नहीं झुकने का संकल्प तो दोहराया, लेकिन उनके शब्दों की तीव्रता के पीछे छिपी चिंता साफ महसूस की जा सकती थी। मां माटी मानुष के नारे के साथ शुरू हुई यात्रा को ऐतिहासिक बताते हुए ममता ने जनता के प्रेम और आशीर्वाद की बात कही, पर जमीन पर बदलते राजनीतिक हालात ने उनकी पार्टी के हर्षोल्लास की चमक को फीका कर दिया।

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इसी बीच भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में पूरी ताकत झोंक दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का तीन दिवसीय दौरा चुनावी अभियान का शंखनाद था। शाह ने घुसपैठ और भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाकर तृणमूल सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने न केवल आरोप लगाए, बल्कि 2026 के चुनाव के लिए संगठन को स्पष्ट लक्ष्य और कार्ययोजना भी सौंपी।

शाह की यात्रा का सबसे अहम संकेत यह रहा कि भाजपा ने अब बंगाल में संगठनात्मक ढांचे को कसना शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ समन्वय, जमीनी कार्यकर्ताओं से संवाद, बंद कमरे की बैठकों में स्पष्ट निर्देश और पुराने नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका देना दर्शाता है कि भाजपा इस बार राज्य में अपनी सरकार बनाने के लिए कमर कस चुकी है। साथ ही दिलीप घोष को दोबारा आगे लाना पार्टी के भीतर एकजुटता का संदेश है।

हम आपको बता दें कि अमित शाह ने ममता सरकार पर राज्य की जनसांख्यिकी बदलने, सिंडिकेट राज चलाने और उद्योगों को भगाने के आरोप लगाए। उन्होंने यह दावा भी किया कि बंगाल अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है और अब बदलाव अपरिहार्य है। भाजपा ने दो तिहाई बहुमत का दावा कर राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सप्ताह में चार दिन क्षेत्र में रहने और रोज नुक्कड़ सभाएं करने का निर्देश इस बात का प्रमाण है कि भाजपा चुनाव को लेकर बेहद गंभीर है। बंगाल में साफ दिख रहा है कि एक ओर जहां तृणमूल कांग्रेस सोशल मीडिया पर अपने संकल्प दोहरा रही है, वहीं भाजपा सड़क पर उतरकर रणनीति को अमल में लाने में जुट गई है। यही अंतर बंगाल की राजनीति की दिशा तय करता नजर आ रहा है।

देखा जाये तो पश्चिम बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। तृणमूल कांग्रेस आज सत्ता की थकान और आत्मसंतोष की शिकार दिख रही है। स्थापना दिवस के भाषणों में संघर्ष की बातें जरूर हैं, लेकिन उन शब्दों में वह धार नहीं दिखती जो कभी ममता बनर्जी की पहचान हुआ करती थी। दुष्ट ताकतों का जिक्र दरअसल अपनी कमजोरियों से ध्यान हटाने का प्रयास अधिक लगता है।

लंबे समय तक सत्ता में रहने का बोझ अब तृणमूल पर साफ दिखने लगा है। भ्रष्टाचार के मामलों, संगठनात्मक ढीलापन, जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष और जनता के रोजमर्रा के सवालों से कटाव ने पार्टी को रक्षात्मक बना दिया है। मां माटी मानुष का नारा आज भी दोहराया जा रहा है, लेकिन मानुष के मन में उठ रहे सवालों के ठोस जवाब तृणमूल के पास नहीं दिखते।

इसके विपरीत भाजपा आक्रामक आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतर चुकी है। अमित शाह की यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी घुसपैठ, सुरक्षा, भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दों को एक साथ जोड़कर तृणमूल कांग्रेस को घेरने की पूरी तैयारी कर चुकी है। साथ ही संगठन को मजबूत करने पर जोर और अनुशासनात्मक निर्देश यह बताते हैं कि भाजपा ने पिछली गलतियों से सीख ली है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा ने बंगाल में वैचारिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर लड़ाई की तैयारी कर ली है। संघ के साथ तालमेल और पुराने चेहरों की वापसी यह संकेत देती है कि पार्टी अंदरूनी मतभेदों को पीछे छोड़कर एकजुट मोर्चा बनाना चाहती है। यह एक ऐसी रणनीति है जो तृणमूल के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

देखा जाये तो राजनीति में भावनात्मक भाषण तभी असर करते हैं जब उनके साथ ठोस काम और भरोसेमंद नेतृत्व हो। फिलहाल तृणमूल कांग्रेस शब्दों के सहारे आत्मबल बढ़ाने की कोशिश में दिख रही है, जबकि भाजपा जमीन पर संगठन और मुद्दों के सहारे बढ़त बनाती नजर आ रही है। आने वाले महीनों में यदि तृणमूल ने आत्ममंथन नहीं किया और केवल विरोधियों को दोष देने की राजनीति जारी रखी, तो सत्ता की जमीन उसके पैरों से खिसक सकती है।

बहराहल, पश्चिम बंगाल की लड़ाई अब केवल नारों की नहीं, बल्कि संगठन, विश्वसनीयता और भविष्य की दृष्टि की लड़ाई बन चुकी है। इस लड़ाई में फिलहाल पलड़ा भाजपा की ओर झुका हुआ दिख रहा है और तृणमूल को इस सच्चाई का सामना करना ही होगा।

-नीरज कुमार दुबे

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