समाजवाद से दूरी ने कहीं का नहीं छोड़ा

By उमेश चतुर्वेदी | Nov 18, 2025

बिहार में एनडीए की जीत को अपने-अपने नजरिए से देखा और विश्लेषित किया जा रहा है। बिहार में एनडीए की जीत के पीछे किसी को चुनाव आयोग की मिलीभगत दिख रही है तो किसी को सत्ता का दुरूपयोग तो कोई इसे भीतरघात के रूप में देख रहा है। लेकिन किसी ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि बिहार के पूरे प्रचार अभियान में सत्ता के दावेदार विपक्षी गठबंधन ने कितनी बार कर्पूरी ठाकुर का नाम लिया, लोहिया की सप्त क्रांति की बात छोड़िए, कितनी बार जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की चर्चा हुई? यह सवाल इसलिए जरूरी और वाजिब लगता है, क्योंकि महागठबंधन की अगुआई जो राष्ट्रीय जनता दल कर रहा है या कर रहा था, घोषित तौर पर लालू प्रसाद यादव उसके प्रमुख हैं। जो नहीं जानते हैं, उनके लिए यह बताना जरूरी है कि लालू यादव जिस आंदोलन की उपज माने जाते हैं, उस जेपी आंदोलन के अगुआ जयप्रकाश नारायण रहे हैं। जयप्रकाश नारायण कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से थे और लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल घोषित तौर पर समाजवादी विचारधारा वाला दल है।

इसे भी पढ़ें: बिहार जीत से उभरी नई उम्मीदें और गहरी चुनौतियों

जनता दल से अलग राष्ट्रीय जनता दल गठित करते वक्त ही तय हो गया था कि समाजवादी दर्शन की खोल में राष्ट्रीय जनता दल परिवारवाद का परचम लहराने की कोशिश करेगा। उसने लहराया भी, लेकिन उसने गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के नाम का मुखौटा धारण किए रखा। 2025 का विधानसभा चुनाव पहला ऐसा चुनाव रहा, जिसमें ना तो टीवी और अखबारी चर्चाओं में इस दल ने लोहिया, जयप्रकाश या कर्पूरी ठाकुर का नाम लिया, ना ही मैदानी चुनावी सभाओं में इस पर फोकस किया गया। राष्ट्रीय जनता दल का टेलीविजन चैनलो पर पक्ष रखने के लिए तीन महिलाएं आगे कर दी गईं। प्रियंका भारती, कंचना यादव और सारिका पासवान को सौम्य और मृदु मृत्युंजय तिवारी और पढ़ाकू बौद्धिक मनोज झा के मुकाबले तवज्जो दी गई। तीनों महिलाएं बहस कम, बदतमीजी ज्यादा करती दिखीं। उन्हें लगा कि दबंग आवाज में अपनी बात रखेंगे तो वह दूर तक सुनी जाएगी। इन्होंने अपने विपक्षी नेताओं को खुलेआम अपशब्द कहे, उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की। आधुनिक टेलीविजन विमर्श के बड़े और गंभीर चेहरे सुधांशु त्रिवेदी से प्रियंका ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कंचना ने तो शुभ्रास्था के साथ सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल किया। प्रियंका और कंचना भारतीय शिक्षा व्यवस्था में लालगढ़ के रूप में विख्यात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्राएं हैं। यह ठीक है कि जेएनयू पढ़ाई का संस्कार तो देता है, लेकिन उसका संकट यह है कि वह भारतीय समाज को वामपंथी चश्मे से देखने और समझने का जबर्दस्ती संस्कार थोप देता है। इसलिए यहां की वामपंथी राजनीति में पगा-डूबा छात्र समाज की हर समस्या के मूल को रामास्वामी पेरियार और महात्मा फुले के वैचारिक दर्शन के ही सहारे ढूंढ़ता है और उनके ही सुझाए अतिवादी विचारों के जरिए उन्हें सुलझाने की समझ विकसित करता है। प्रियंका और कंचना जेएनयू की उसी परंपरा में पगी-डूबी छात्रा हैं, इसलिए वे बिहार के समाज को भी उसी अंदाज में समझ रही थीं और अपने हिसाब से राष्ट्रीय जनता दल को उसी नजरिए से आगे बढ़ा रही थीं। इसका असर यह हुआ कि जिस बिहार की धरती से भारतीय समाजवाद ने राजनीतिक गलियारों तक की सफल यात्रा की थी, जिसके उत्तराधिकारी खुद लालू यादव भी रहे हैं, उस समाजवाद का सार्वजनिक विमर्श में भूले-भटके भी इस्तेमाल नहीं हुआ। जिस कर्पूरी ठाकुर की राजनीति के उत्तराधिकारी लालू रहे, उनका भी नाम नहीं लिया गया। जेपी और लोहिया की तो बात ही और है।

सवाल यह है कि लालू की पार्टी का जो कट्टर समर्थक यादव समुदाय है, क्या वह सचमुच पेरियारवादी है, वह फुले के वैचारिक दर्शन को मानता है। पेरियार और फुले जिस ब्राह्मणवाद की कटु आलोचना करते हैं, राजनीति को छोड़ दें तो यादव समाज भी वास्तविक जीवन में उतना ही ब्राह्मणवादी है। वह भी हिंदू है और कई बार तो कथित सवर्ण समाज से भी कहीं ज्यादा हिंदू है। वह भी उसी तरह पूजा-पाठ करता है, उसी तरह धार्मिक है, उसी तरह पारिवारिक संस्कार करता है, जैसा बाकी कथित ब्राह्मणवादी व्यवस्था वाले लोग करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या राम मंदिर की आलोचना करना, छठ पूजा पर सवाल उठाना क्या आम यादव समुदाय को स्वीकार्य हो पाया होगा? वैसे राबड़ी देवी ने छठ पूजा छोड़ दी है। लेकिन उनकी छठ पूजा भी कभी बिहार के मीडिया माध्यमों के लिए बड़ी खबर बनी रहती थी। तेजप्रताप को राजद के इस विचलन का पता था, शायद यही वजह है कि उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में अपील कर दी थी कि अब तेजस्वी जी की पत्नी को छठ पूजा का व्रत शुरू कर देना चाहिए। क्योंकि बिहार में सास से बहू छठ पूजा का उत्तराधिकार हासिल करती है। बहरहाल चुनाव नतीजों ने तो बता दिया कि बिहार में विपक्षी गठबंधन जिसे ब्राह्मणवादी व्यवस्था से दूर करने की कोशिश कर रहा था या दूर मान रहा था, वह भी दरअसल उसकी सोच के दूसरे बिंदु पर खड़ा है। 

सवाल यह है कि आखिर राष्ट्रीय जनता दल से समाजवाद की विदाई क्यों हुई? इस सवाल का जवाब तलाशना कोई राकेट साइंस नहीं है। वामपंथी वैचारिकी के करीब होने के साथ ही तेजस्वी उस राहुल गांधी के भी करीब हैं, जिन्हें हर समस्या का समाधान वामपंथी सोच में ही नजर आती है। हिंदुत्व का विरोध उनका प्रमुख राजनीतिक दर्शन है। तेजस्वी भी यही कर रहे थे। इसे बढ़ावा देने में उनके सलाहकारों संजय यादव और रमीज ने भरपूर मदद दी है। प्रियंका, कंचना और सारिका जैसी बदमिजाज प्रवक्ताओं को प्रश्रय संजय यादव और रमीज की ही शह पर दिया गया। हर घर में सरकारी नौकरी देने का तेजस्वी के वायदे के पीछे वामपंथी अतिवादी वैचारिकी का ही हाथ रहा, नतीजा सामने है। बिहार की सत्ता छींका की तरह तेजस्वी और राष्ट्रीय जनता दल से दूर हो गई है। पेरियार और फुले की वैचारिकी पर आधारित राष्ट्रीय जनता दल अगर आने वाले दिनों में बिखराव की ओर चल पड़े तो हैरत नहीं होनी चाहिए। पारिवारिक बिखराव तो खैर शुरू हो ही चुका है। 

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

प्रमुख खबरें

Vivo T5 Pro 5G हुआ India में Launch, जानें दमदार Camera और प्रोसेसर वाले फोन का Price.

Snapchat को डबल झटका: 20% कर्मचारियों की छंटनी, Perplexity AI संग Mega Deal भी हुई कैंसिल।

महंगाई का डबल Attack! Wholesale Inflation 3 साल के शिखर पर, Crude Oil ने बढ़ाई टेंशन

US-Iran टेंशन में कमी के संकेत, Global Cues से भारतीय बाजार में बहार, Sensex 1200 अंक उछला।