महिला वोटरों पर निर्भर है जीत-हार का फैक्टर

By डॉ. रमेश ठाकुर | Nov 01, 2025

बीते कुछ दशकों से बिहार की आधी आबादी पुरुष मतदाताओं के मुकाबले सर्वाधिक मतदान कर रही हैं। अपने बूते जिसे चाहें उसे सत्ता सौंपने का मादा रखती हैं। हालिया, कुछ चुनावी सर्वेक्षण रिपोर्टस् संकेत इस बार भी ऐसे ही दिखा रही हैं। सर्वे बताते हैं कि बिहार चुनाव में महिलाएं लैंगिक सियासत की बदलती गतिशीलता की नई तस्वीर पेश करेंगी। हिंदी पट्टी वाले राज्यों में चुनावी समर में पुरूषों के मुकाबले महिला ज्यादा बढ़चढ कर हिस्सा लेती हैं जिनमें बिहार सबसे अव्वल है। चुनाव चाहे सांसदी के हों या विधानसभा के या फिर पंचायत के, सभी में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत सर्वाधिक रहा है। पूर्व के इन आंकड़ों को देखते हुए जारी बिहार चुनाव में तकरीबन सभी सियासी दल महिला वोटरों पर ही ज्यादा दांव लगा रहे हैं।

  

इतना तय है कि महिलाएं इस बार चुनावी गच्चा खाने के मूड में हैं नहीं? झूठे वादों में नहीं फंसेगी। पिछले चुनाव में एनडीए के खाते में 40 फीसदी वोट पड़ने वाला समूह शांत दिखाई पड़ता है। चुनावी वायदों को महिलाएं अपने नजरिए से परख रही हैं। बिहार के चुनावी उत्सव में चाहे महिला वोटर हों या विधायक? एकाध दशकों में इनकी भागेदारी सरकारों में भी रही हैं। विधानसभा-2020 में महिला उम्मीदवारों ने रामनगर, धमदाहा, प्राणपुर, कोढ़ा, गौराबौराम, गोपालगंज, राजापाकर, महनार, कटोरिया, मोकामा, मसौढ़ी, संदेश, नोखा, नरकटियागंज, बेतिया, केसरिया, परिहार, बाबूबरही, फुलपरास, त्रिवेणीगंज, शेरघाटी, बाराट्टी, हिसुआ, बारसलीगंज और जमुई में विजयी पताका लहराया था।

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महिलाओं के लिए मौजूदा विधानसभा-2025 चुनाव यह निर्धारित करेगा कि जनकल्याण के माध्यम से सशक्तीकरण वास्तिव स्वायत्ता में तब्दील होता है या सिर्फ चुनावी सुविधा ही बनकर रह जाएगा। पिछले आंकड़ों को देखकर भाजपा का पूरा फोकस महिलाओं पर है। तभी, तो उन्होंने चुनाव तारीखों की घोषणा से पूर्व ही ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार’ स्कीम के तहत लगभग 75 लाख महिलाओं के बैंक खातों में दस-दस हजार रूपए की नगद धनराशि पहले ही भेज दी हैं। पैसा पाकर महिलाएं खुश जरूर हैं, लेकिन इस बात की गारंटी नहीं की वह ‘नोट के बदले वोट’ देंगी या नहीं? इस स्कीम पर महिलाओं को संशय इसलिए है कि ये घोषणा नीतीश कुमार ने नहीं, बल्कि दिल्ली से प्रधानमंत्री द्वारा हुई। क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी एक घोषणा उन्हीं के द्वारा की गई थी, जो अभी तक लागू नहीं हुई है। इन सभी तथ्यों की समीक्षाएं महिलाएं इस बार कर रही हैं। महिला वोटरों को रिझाने में कोई भी सियासी दल पीछे नहीं हैं? सभी अपनी-अपनी हैसियत अनुसार वादा कर रहे हैं? जबकि, बिहार में दूसरा सबसे मजबूत दल आरजेडी ने तो प्रत्येक परिवार के एक-एक सदस्य को नौकरी देने की भी घोषणा की है। कुल मिलाकर, बिहार का मौजूदा चुनावी गणित आधी आबादी के ईद-गिर्द ही घूम रहा है।

  

चुनाव आयोग के मुताबिक बिहार में 100 में 48 फीसदी वोटर आंकड़ा महिलाओं का है। पिछले चुनाव में रिकॉर्ड 40 फीसदी मतदान महिलाओं ने एनडीए के पक्ष में किया था। इतनी वोटिंग इस बार भी जिस दल के पक्ष में होगी, वही बाजी मारेगा। हालांकि पिछले विधानसभा-2020 के चुनाव में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी का ऐलान किया था। तो उस ऐलान को महिलाओं ने हाथों-हाथ लिया था। वोटरों के अलावा उम्मीदवार के तौर भी दर्जनों महिला इस बार भी मैदान में हैं। 11 विधानसभाओं में 10 पुरुष वोटरों की तुलना में 9 महिला मतदाता हैं। 11 विधानसभा क्षेत्रों से ही लिंगानुपात ठीक होने पर महिला विधायक निर्वाचित हुई जिनमें त्रिवेणीगंज, धमदाहा, कोढ़ा, राजापाकर, कटोरिया, संदेश, शेरघाटी, बाराचट्टी, हिसुआ, वारसलिगंज और जमुई विधानसभा शामिल हैं।

  

विधानसभा चुनाव-2020 में एनडीए के लिए शराबबंदी का वादा तुरुप का पत्ता साबित हुआ था। महिलाओं ने खुलकर जेडीयू का समर्थन किया था। हालांकि वह वादा धरातल पर उतना कारगर साबित नहीं हुआ, जितने की उम्मीद महिलाएं लगाकर बैठी थीं। क्योंकि लोग शराब अब पी रहे हैं। ऐसा भी नहीं हुआ कि शराबबंदी के बाद बिहार में शराब का कहीं कोई टोटा दिखा हो। जितनी चाहो उतनी शराब तस्कर शराब मुहैया करवा देते हैं। चोरी छिपे धड़ल्ले से शराब की तस्करी जोरों पर है। शराबबंदी में शराब माफिया चांदी काट रहे हैं। प्रशासनिक मिलीभगत से अवैध शराब का धंदा खूब फलफूल रहा है। इसलिए इस बार महिलाओं का रुझान नीतीश के पक्ष में एकतरफा नहीं दिखाई देता। किधर मूव करेगा, ये भी कहना जल्दबाजी होगा। युवा आबादी तेजस्वी की ओर आर्कर्षित है, ऐसी तस्वीर उनकी रैलियों में भारी मात्रा में उमड़ती भीड़ बताती है।

  

महिलाएं निर्णायक भूमिका में होंगी, ये बात नीतीश से लेकर प्रधानमंत्री, तेजस्वी यादव भी जानते हैं। गुजरे 20 वर्षों से कुर्सी पर बैठे नीतीश कुमार को बदलकर नया चेहरा लाने को भी महिलाएं आतूर दिखती हैं। नीतीश के पीछे सत्ता विरोधी मुद्दे भी कई हावी हैं। वहीं, महाराष्टृ की तरह इस चुनाव से भाजपा अपना स्वयं का प्रभुत्व स्थापित करना चाहती है। इस दिशा में उन्होंने जेडीयू और अपने लिए बराबर-बराबर सीट बांटकर पहला कदम बढ़ा भी दिया है। इसलिए ये चुनाव नीतीश के 20 वर्ष का सुशासन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय प्रदाता छवि से अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिस्पर्धा भी कह सकते हैं। पिछले विधानसभा में भाजपा ने 74 सीटें जीती थी। जबकि, जेडीयू मात्र 43 पर सिमट गई थी, बावजूद इसके अनुकूल परिस्थितियों को भांपकर भाजपा ने दूसरे नंबर पर रहने का समझौता किया था। लेकिन इस बार की स्थिति पहले से जुदा है। दोनों दल 101-101 सीटों पर लड़ रहे हैं। चुनाव परिणाम में अगर भाजपा की एक भी सीट इस दफे ज्यादा आई, तो उनका मुख्यमंत्री किसी भी सूरत में बनेगा। अगर ऐसा हुआ, तो नीतीश कुमार फिर से पलटने में देर नहीं करेंगे।  

- डॉ. रमेश ठाकुर

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