Partition Horrors Remembrance Day I विभाजन विभीषिका: हिन्दू नरसंहार की मर्मांतक दास्तां

By कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल | Aug 14, 2026

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ लेकिन स्वाधीनता के साथ विभाजन की वीभत्स त्रासदी ने राष्ट्र को कभी न भर पाने वाले असह्य घाव दिए। उस समय हुए हिन्दुओं के नरसं'हार और उसकी पीड़ा से पूरा देश कांप गया। जिसकी मर्मांतक चीखें अब भी सुनाई देती हैं।अतीत को जानना आवश्यक हो जाता है।आइए इतिहास के पन्ने पलटते हैं।

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उस समय कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा भारत विभाजन की माउंटबैटन योजना को स्वीकार करने की तैयारियों का महात्मा गांधी ने भी विरोध किया था। लेकिन उनकी आगे नहीं चली और 3 जून 1947 को पंडित नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस ने अंग्रेजों के विभाजन प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन्होंने इस सन्दर्भ में मनु गांधी से 1 जून 1947 को चर्चा की थी। मनु को अपने दिल की बात कहते हुए महात्मा गांधी ने बताया— “आज मैं अपने को अकेला पाता हूँ। लोगों को लगता है कि मैं जो सोच रहा हूँ वह एक भूल है। भले ही मैं कांग्रेस का चवन्नी का सदस्य नहीं हूँ लेकिन वे सब लोग मुझे पूछते है, मेरी सलाह लेते है। आजादी के कदम उलटे पड़ रहे हैं, ऐसा मुझे लगता है। हो सकता है आज इसके परिणाम तत्काल दिखाई न दे, लेकिन हिन्दुस्तान का भविष्य मुझे अच्छा नहीं दिखाई देता। हिन्दुस्तान की भावी पीढ़ी की आह मुझे न लगे कि हिंदुस्तान के विभाजन में गांधी ने भी साथ दिया था।'' (गांधी सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 88, पृष्ठ 43-44)

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