नेता की मूँछ और सोच (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा | May 28, 2025

हर साल 26 जनवरी आती है और जाती है। झंडा ऊपर जाता है, नेता नीचे बैठते हैं, और जनता वहीँ खड़ी रहती है—जहाँ पिछले साल खड़ी थी। सरकारी स्कूल का बच्चा ठिठुरता हुआ कविता पढ़ता है—“जन-गण-मन अधिनायक जय हे...” और पीछे से मास्टर साहब उसकी ऊँची आवाज पर गौरवान्वित होकर मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं—“हाँ जी, हमने झंडा फहरवा दिया।” मोहल्ले का छुटभैया नेता बड़बड़ाता है—“फोटो में मैं कम दिखा, वो ज़्यादा... अगली बार झंडे की डोरी मैं पकड़ूंगा।” झंडे की डोरी पकड़ना, जैसे देश की सत्ता पकड़ना हो। और जो झंडे को झुकाता है, वो खुद झुकने का आदी होता है।

इसे भी पढ़ें: सरकार, विपक्ष और जनता (व्यंग्य)

सरकारी अस्पताल में डॉक्टर साहब की कुर्सी खाली है, पर उनकी कुर्सी पर प्लास्टिक का फूल गुलदस्ते में सजा है। मरीज कराहता है—“डॉक्टर को बुलाओ।” नर्स कहती है—“वो दिल्ली गए हैं—रैली में, जनसेवा के लिए।” मरीज की हँसी छूट जाती है—“मुझे मार दो बहनजी, मगर ये मत कहो कि वो सेवा कर रहे हैं।” पास में बैठा मरीज कहता है—“सेवा अब स्लोगन है, इलाज तो अब ईश्वर भरोसे ही चलता है।” अस्पताल के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा है—“जनकल्याण योजना के तहत मुफ्त इलाज।” अंदर मरीज की जेब में दवाई की पर्ची और जेब में सिर्फ खामोशी होती है।

एक गाँव में पुलिया टूटी है। बच्चे पानी में कूदकर स्कूल जाते हैं, और अफसर साहब कहते हैं—“जल यात्रा से बच्चों में तैराक बनने का हुनर पैदा होगा।” गाँव वाले तालियाँ बजाते हैं, क्योंकि ये टेंडर पास करवाने की कला का सजीव प्रदर्शन है। प्रधानजी कहते हैं—“हमने प्रस्ताव भेजा है...पिछली बार भी भेजा था, पर रद्दी में चला गया।” एक पत्रकार सवाल करता है—“आप जनता की सेवा कब शुरू करेंगे?” प्रधान जी मुस्कराते हैं—“जनता के वोटों की सेवा तो हमने चुनाव में ही कर दी थी।”

किसान आत्महत्या करता है। उसकी जेब से सुसाइड नोट नहीं, बैंक नोट का फार्म निकलता है। सरकार कहती है—“हम दुखी हैं।” फिर अगली सुबह अखबार में विज्ञापन छपता है—“हम किसानों के साथ हैं।” किसान का बेटा कहता है—“बापू नहीं रहे, पर बैंक का लोन अब भी साथ है।” खेत में फसल सूखती है, और सरकार में मंत्री का बयान आता है—“इस साल फसल अच्छी रही है, हमने रिपोर्ट भेज दी है।” शायद रिपोर्ट में गेंहूं की जगह फाइलें उगती हों।

राशन की दुकान पर 5 किलो चावल की पर्ची हाथ में लेकर खड़ा बुज़ुर्ग कांपते हुए कहता है—“बेटा, ये ‘अन्न योजना’ है या ‘अन्य योजना’, हमें तो अब भूख पर भरोसा करना पड़ता है।” दुकानदार जवाब देता है—“साहब, सिस्टम डाउन है।” सिस्टम, अब एक बहाना है, और गरीब उसका स्थायी ग्राहक। बच्चे कहते हैं—“हमको चॉकलेट चाहिए।” माँ कहती है—“बेटा, पहले गैस सिलेंडर आ जाए, फिर देखेंगे।”

मेरे मोहल्ले में एक दिन फेरी वाला चिल्लाया—“जन-जन के लिए पॉलिसी, नेता जी की डिब्बा सेवा।” डिब्बा में क्या था, सबको पता था—पुराने वादे, अधूरी योजनाएं, और एक ताज़ा बायोडेटा। जनता पूछती है—“इस बार क्या दोगे?” नेता मुस्कराता है—“जो तुमने पहले लिया था, वही दोबारा, नए रैपर में।” जनता फिर से खुश हो जाती है, क्योंकि उसे भी आदत हो गई है बैरंग चिट्ठियों की।

और अंत में, चुनाव के दिन एक बूढ़ा वोट डालने जाता है। बूथ पर अफसर पूछता है—“किसे वोट दोगे?” बूढ़ा चुप रहता है, और धीरे से कहता है—“जो पिछले पचास सालों से दे रहा हूँ—उम्मीद को।” अफसर कहता है—“फिर से वही?” बूढ़ा मुस्कराता है—“हाँ, क्योंकि हमारे पास उम्मीद के सिवा कुछ भी तो नहीं बचा।”

(आहिस्ता बोलो... कहीं जनतंत्र सुन न ले। वो बहुत बीमार है इन दिनों।)

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

प्रमुख खबरें

PM Modi के बयान पर CJP का तीखा हमला, कहा देश के युवाओं को आपस में बांटने का हो रहा प्रयास

PM Modi का नया इंस्टाग्राम वीडियो वायरल, जानवरों के साथ उनके खास लगाव की लोग कर रहे तारीफ

Delhi में MCD Worker की चाकू मारकर हत्या, परिजनों को एक्सीडेंट की खबर देकर बुलाया

Sonam Bajwa Birthday: एक्टिंग का जुनून ले आया फिल्म इंडस्ट्री, Punjabi Cinema के बाद Bollywood में मचाया धमाल