माता पार्वती जयंती व्रत है प्रेम, समर्पण एवं विश्वास का पर्व

By प्रज्ञा पांडेय | Jul 20, 2026

21 जुलाई को माता पार्वती जयंती व्रत है, सनातन धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। पार्वती जयंती के दिन देवों के देव महादेव की पत्नी माता पार्वती की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है तो आइए हम आपको माता पार्वती जयंती व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। 

इसे भी पढ़ें: Kark Sankranti 2026: सूर्य का कर्क राशि में प्रवेश, आज से शुरू होगा Dakshinayan का शुभ काल

माता पार्वती जयंती व्रत का शुभ मुहूर्त 

हिन्दू पंचांग के अनुसार, इस बार 21 जुलाई 2026 की सुबह 4 बजकर 2 मिनट से आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ हो रहा है, जो कि कल 22 जुलाई 2026 की सुबह 5 बजकर 16 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में 21 जुलाई 2026, वार मंगलवार को इस बार पार्वती जयंती मनाई जाएगी।

आषाढ़ शुक्ल अष्टमी तिथि का महत्व

आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि यानी पार्वती जयंती का दिन देवी पार्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो कि शक्ति, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य और मातृत्व (माता होने का भाव) का प्रतीक हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो लोग सच्चे मन से माता पार्वती की उपासना करते हैं, उन्हें जीवन की तमाम समस्याओं से लड़ने की शक्ति मिलती है। साथ ही पाप नष्ट होते हैं और वैवाहिक जीवन खुशियों से भरा रहता है।

माता पार्वती जयंती व्रत पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ 

पंडितों के अनुसार माता पार्वती जयंती व्रत बहुत खास होता है इसलिए पार्वती जयंती व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कार्य करने के पश्चात लाल या हरे रंग के शुद्ध कपड़े धारण करें। घर के मंदिर में शिव जी और मां पार्वती की साथ वाली मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। व्रत का संकल्प लेने के बाद घी का दीपक जलाएं। देवी-देवताओं को जल, वस्त्र, अक्षत, हल्दी, फल और फूल अर्पित करें। मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करने के बाद उन्हें समर्पित 'ॐ नमः शिवायै च शिवायै च नमो नमः' मंत्र का 11 बार जाप करें। इसके बाद अपनी इच्छा को व्यक्त करके पूजा का समापन करें। पार्वती जयंती का व्रत अगले दिन अष्टमी तिथि के समाप्त होने के बाद या मुख्य तिथि वाले संध्या पूजा के पश्चात खोला जा सकता है।

इसलिए मनाया जाता है माता पार्वती जयंती व्रत

पार्वती जयंती देवी पार्वती के अवतरण (प्रकट होने) की याद में मनाई जाती है। वे प्रेम, भक्ति, शक्ति, मातृत्व और दैवीय स्त्री शक्ति की प्रतीक हैं। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव की शाश्वत संगिनी और सृष्टि, पालन व परिवर्तन का स्रोत हैं। यह दिन वैवाहिक सुख, परिवार की भलाई, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रार्थना करने की दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है।

सिद्धि-विद्या देवी के रूप में भी प्रसिद्ध हैं माता पार्वती

शास्त्रों के अनुसार माता पार्वती को 'जगदंबा' यानी ब्रह्मांड की माता के रूप में व्यापक रूप से पूजा जाता है, लेकिन प्राचीन ग्रंथों में उन्हें बारह सिद्धि-विद्या देवियों में से एक भी माना गया है। तांत्रिक परंपराओं में, भक्त देवी के सिद्धि-विद्या स्वरूपों के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। पंडितों के अनुसार अनुशासित पूजा और ध्यान के माध्यम से की जाने वाली ये साधनाएं भक्तों को उनकी सच्ची इच्छाएं पूरी करने, बाधाओं को दूर करने और आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने में मदद करती हैं।

माता पार्वती जयंती व्रत का महत्व

पंडितों के अनुसार माता पार्वती को शक्ति, भक्ति, समर्पण और अखंड सौभाग्य की देवी माना जाता है। इस दिन का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। माता पार्वती प्रकृति और शक्ति का स्वरूप हैं। इनकी पूजा से जीवन में नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत रखने और माता पार्वती की पूजा करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है और वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। यह दिन सौभाग्य और वैवाहिक सुख देने वाला होता है। अविवाहित कन्याएं यदि सच्चे मन से यह व्रत रखती हैं, तो उन्हें योग्य और मनचाहा जीवनसाथी मिलता है या मनवांछित वर की प्राप्ति होती है।

माता पार्वती जयंती व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक 

पौराणिक कथा के अनुसार, माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हिमालयराज हिमवान और माता मैना के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। माता पार्वती बाल्यकाल से ही भगवान शिव को अपना पति मानती थीं। महर्षि नारद ने उन्हें बताया कि शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या करनी होगी। नारद जी के मार्गदर्शन पर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने जल, अन्न और यहां तक कि पत्ते यानी पर्ण खाना भी छोड़ दिया, जिसके कारण उन्हें 'अपर्णा' भी कहा गया।

 उनकी अटूट भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसके बाद शिव और पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। यही कारण है कि पार्वती जयंती को अटूट दांपत्य प्रेम और सौभाग्य का पर्व माना जाता है। पार्वती जयंती केवल देवी पार्वती के जन्मोत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रेम, तपस्या, समर्पण और अटूट विश्वास का संदेश भी देता है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से माता पार्वती तथा भगवान शिव की आराधना करने से दांपत्य जीवन में सुख, परिवार में समृद्धि और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने की मान्यता है। इसलिए इस पावन अवसर पर पूरे श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना कर माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करें।

माता पार्वती जयंती व्रत से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं 

पंडितों के अनुसार इस दिन सुहागिन महिलाएं मां पार्वती को सुहाग के सामान जिसमें लाल चूड़ी, लाल जोड़ा, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी और आलता अर्पित करने की विशेष मान्यता है। इसके बाद इस सामग्री को किसी ब्राह्माण स्त्री या जरूरतमंद महिला को दान दे दिया जाता है। इस पवित्र दिन गौरी-शंकर की संयुक्त पूजा की जाती है, इस प्रकार की पूजा से अच्छा फल मिलता है।

- प्रज्ञा पाण्डेय

प्रमुख खबरें

Love Horoscope 21 July 2026 | जानें आपकी लव लाइफ में आज घुलेंगे मिठास के रंग या बढ़ेगी थोड़ी दूरी?

US-Iran War | मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर! होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर पर हमला, अमेरिका की ओर से लगातार 10वें दिन बमबारी

सिंधु जल संधि अपने वर्तमान स्वरूप में अब नहीं करेगी काम, पाकिस्तान को आतंकवाद रोकना होगा: आधिकारिक सूत्र

बिहार विधानसभा: मॉनसून सत्र के पहले दिन 10 अहम विधेयक पेश, जुआ और ऑनलाइन सट्टेबाजी पर लगेगी रोक