Gyan Ganga: माता सीता ने जो संदेश हनुमान जी को दिया वह बहुत मार्मिक था

By सुखी भारती | Jun 14, 2022

श्रीहनुमान जी ने लंका दहन कर दी। स्वर्ण नगरी में ऐसा कोई कोना न रहा, जहाँ लंका विध्वंस के चिन्न न हों। और लंका दहन के साक्षयों में हर एक कण, रावण के असफल जीवन रथ यात्रा की कहानी समेटे बैठा था। हर दिशा जो कभी रावण की दासता के पाश में बंधी थी, वह रावण को चिढ़ा रही है। और उपहास व शौर कर-कर यह कह रही है, कि वाह रावण! क्या तेरा भय, बल व सामर्थय बस इतना सा ही था, कि उसे एक साधारण सा दिखने वाला वानर ही राख में मिला कर चला गया। हमने तो सुना था, कि तूने काल को भी वश में कर रखा है। लेकिन भस्म हुई लंका नगरी की गाथा तो यही संकेत कर रही है, कि मानों काल ही तुम्हारे पीछे हाथ धो कर पड़ा था। खैर! श्रीहनुमान जी अपना सेवा कार्य संपन्न करके अब, अपने अगले उद्देश्य हेतु तत्पर होने को थे। श्रीहनुमान जी ने लंका दहन का कार्य पूर्ण करते ही सागर में छलाँग लगा दी। अपनी पूँछ को ठंड़ा किया और तनिक विश्राम किया। और अब उन्होंने अपने विशाल रुप को नन्हें से रुप में ढाल लिया। और दोनों हाथ जोड़ कर श्रीसीता जी के समक्ष जाकर जा खड़े हुए- 

जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।’

वाह! कितना सुंदर संदेश दिया है श्रीहनुमान जी ने। जब तक वे लंका को दहन कर रहे थे, तब तक उन्होंने अपने रुप को विशाल बनाये रखा। लेकिन जैसे ही वे माता सीता जी के समक्ष पहुँचे, उन्होंने अपने रुप को लघु बना लिया। कहने का तात्पर्य कि जब आपको पाप का अंत करना हो, तो आप बडे़ से भी बड़े बन जाओ। लेकिन जब आप भक्ति देवी के समक्ष जाओ, तो जितना अधिक हो सके, लघु होने का ही प्रयास करें। पाप को बड़ा होकर समाप्त किया जा सकता है, और प्रभु को छोटा होकर जीता जा सकता है। श्रीहनुमान जी ने ठीक यही किया। अब जब श्रीहनुमान जी, माता सीता जी से आज्ञा लेने लगे, तो माता से निवेदन करते हैं, कि हे माता, जिस प्रकार से प्रभु श्रीराम जी ने आपके लिए, अपनी मुद्रिका प्रदान की थी। ठीक उसी प्रकार से आप भी, प्रभु श्रीराम जी के लिए अपना कोई पहचान चिन्न अवश्य दीजिए। तो श्रीसीता जी ने अपनी चूड़ामणि उतार कर दी, और श्रीहनुमान जी ने उसे हर्षपूर्वक ले लिया-

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‘मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।

जैसें रघुनायक मोहि  दीन्हा।।

चूड़ामनि उतारि तब दयऊ।

हरष समेत पवनसुत लयऊर्।।’

माता सीता जी ने जब चूड़ामणि, श्रीहनुमान जी को दी। तो ठीक श्रीराम चन्द्र जी की ही भाँति, उन्होंने भी एक विशेष संदेश श्रीराम जी के लिए दिया। वे श्रीहनुमान जी को कहती हैं, कि हे पवनपुत्र! आप तो बहुत बड़े कथा व्यास हो। वो कौन है, जिसे आप ने कथा न सुनाई हो। रावण जैसे दुष्ट जीव को भी आप कथा सुना सकते हो। तो और की तो कह ही क्या सकते हैं। मुझे भी आपने श्रीराम कथा सुनाई। लेकिन बात तो तब बने, जब आप श्रीराम जी को, स्वयं उनकी ही कथा सुनाओ। तो श्रीहनुमान जी ने मौन भाषा में ही प्रश्न किया, कि हे माता! कथा तो मैं श्रीराम जी को भी सुनादुं। लेकिन प्रसंग कौन सा लेना है, कृप्या मुझे यह तो बता दीजिए। तो माता सीता जी ने कहा, हे तात! आप श्रीराम जी को इंद्रपुत्र जयंत की कथा सुनाना। और प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझाना। और मैं यह स्पष्ट रुप से कहे देती हूँ, कि अगर श्रीराम एक महीने के भीतर-भीतर, हमें लेने नहीं पहुँचे, तो फिर यह ब्रह्म सत्य है, कि वे मुझे जीवित नहीं पायेंगे-

‘तात सक्रसुत कथा सनाएहु।

बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।

मास दिवस महुँ नाथु न आवा।

तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।’

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माता सीता जी ने, श्रीहनुमान जी को जो संदेश दिया, वह बड़ा मार्मिक है। माता सीता जी कहती हैं, कि हे तात, आप श्रीराम जी को इंद्रपुत्र जयंत जी की कथा सुनाना। सज्जनों विचार कीजिए! माता सीता जी ने यह क्यों कहा, कि प्रभु श्रीराम जी को जयंत की कथा सुनाना। इस कथा के माध्यम से माता सीता जी कया कहना चाहती हैं। अगर आप जयंत की कथा को सुनेंगे, तो पायेंगे, कि जयंत ने एक बार कौवा का रुप धारण करके, माता सीता जी के पावन श्रीचरण के एक अंगूठे को, अपनी चोंच के प्रहार से घायल कर दिया था। यह देख भगवान श्रीराम जी ने क्रोधित दृष्टि से जयंत को घूरा। जयंत ने देखा, कि श्रीराम जी अब उसे अवश्य ही दण्डित करेंगे। भयग्रसित होकर जयंत भाग खड़ा हुआ। पर उसे क्या पता था, कि प्रभु श्रीराम जी से बचकर भला वह कहाँ जा पायेगा। कारण कि सृष्टि के कण-कण में तो प्रभु श्रीराम जी का वास है। फिर वह कौन से स्थान पर जाकर छुपेगा? प्रभु श्रीराम जी ने भी एक तिनके का संधान कर, जयंत के पीछे छोड़ दिया। वह तिनका कोई तिनका न होकर, मानों ब्रह्मास्त्र था। जिसके प्रकोप से बचना संभव ही नहीं था। जयंत तीनों लोकों में भागता रहा। लेकिन वह घास का तिनका उसके पीछे लगा ही रहा। ब्रह्मा, विषणु और महेश भी उसकी रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध हुए। तब वह श्रीराम जी की ही शरण में जाकर गिरा। और मृत्यु से बच पाया। माता सीता मानों श्रीराम जी को उलाहना दे रही हैं, कि हे प्रभु आप द्वारा आदेशित किए गए, एक क्षुद्र से तिनके में भी जब इतनी शक्ति है, कि उसे तीनों लोकों के स्वामी भी रोकने में असमर्थ थे। तो सोचिए, कि जब आप अपने बाण को संधान करके छोडेंगे, तो उस राम-बाण में कितनी शक्ति होगी। मेरे कहने का तात्पर्य आप समझ ही गए होंगे। इसलिए या तो एक मास के भीतर-भीतर आप अथवा आपका बाण ही हमारे पास चले आयें। अन्यथा एक मास के पश्चात आप मेरा मरा मुख देखेंगे। श्रीहनुमान जी तो माता सीता जी की मनःस्थिति समझ ही रहे थे। उन्होंने श्रीसीता जी को बहुत प्रकार से समझाया, उन्हें धीरज धराया। और माता सीता जी को प्रणाम कर, श्रीहनुमान जी, प्रभु श्रीराम जी के चरणों में पुनः लौट पड़े।

प्रभु के श्रीचरणों में आकर श्रीहनुमान जी की प्रभु से क्या-क्या वार्ता होती है, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

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