आंकड़ों के हलवे का जलवा (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Mar 06, 2024

आंकड़ों का हलवा फैशन के खूबसूरत जलवे की तरह होता है। अभिभावक अपने बड़े होते लेकिन छोटे बच्चे से पूछते हैं कि वह किससे ज़्यादा प्यार करता है मम्मी से या पापा से। बच्चा कुछ क्षण चुप रहकर कहता है, दोनों से। उसकी चुप्पी कूटनीतिक माहौल में पलने के कारण होती है जिसमें वह बचपन से सीख लेता है कि उसे कोई ऐसी बात नहीं करनी चाहिए जो किसी को बुरी लगे और उसके सभी काम होते रहें।  कभी जब वह दिल से कहना चाहता है तो कह भी देता है कि वह मम्मी से ज्यादा प्यार करता है। संजीदा व्यवहारिक रूप से कहें तो वह प्यार के अनुमानित आंकड़ों का हलवा परोसना जानता है।

  

स्कूल एक ऐसी इमारत है जहां पकाए गए परिणाम के आंकड़ों का हलवा हर विद्यार्थी को चखना पड़ता है, जो कभी अच्छा लगता है कभी बुरा। अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों पर, पूरा साल बहुत अच्छे लगने वाले आंकड़े जिन्हें अंक भी कहते हैं प्राप्त करने के लिए दबाव बनाए रखते हैं। हांलाकि ज़िंदगी में मेहनत और लगन ही ज्यादा काम आती है लेकिन आंकड़ों का वर्चस्व कम नहीं होता तभी बचपन से ही अभ्यास करना होता है। यह नियमित रूप से होता भी रहता है जो सभी के बहुत काम आता है। भविष्य में सभी को बड़ी बड़ी सामाजिक धारणाओं और राष्ट्रीय समस्याओं के सन्दर्भ में आंकड़ों का अस्वादिष्ट हलवा मिलना ही होता है।

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सरकारी कार्यालयों में आंकड़ों का हलवा नियमित रूप से पकाया और परोसा जाता है। छोटी सरकारें ऐसा करते हुए बड़ी सरकार का पेट भरती हैं और बड़ी सरकार पूरे देश का पेट भर देती है। अमीर और गरीब की आय के आंकड़ों का हलवा मिक्स कर नए स्वाद का हलवा बनाकर परोसती रहती हैं। यह हलवा जलवे की तरह बिलकुल झूठ, नकली, अस्वादिष्ट होता है लेकिन आम जनता कुछ कर नहीं सकती। उसे वह हलवा निगलना ही पड़ता है। जिससे बड़ी सरकार और छोटी सरकार को लगने लगता है कि इस नए प्रकार के हलवे के खाए जाने के कारण गरीब कम होते जा रहे हैं। जिस समाज से गरीब कम होते जा रहे हों वह समाज तरक्की की राह पर निरंतर अग्रसर होता है। 


यह भी गज़ब इत्तफाक है कि हमारे देश में बजट पकाने की शुरुआत भी हलवा पकाने, बांटने और खाने से होती है। जिसमें जान बूझकर कितने आकार, प्रकार, रंग और स्वाद के आंकड़े मिला दिए जाते हैं जिनका आने वाले कई सालों तक पता नहीं चलता। बस आंकड़ों का हलवा याद रहता है।


- संतोष उत्सुक

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