वैश्विक संकट के दौर में दूरगामी सोच का परिणाम है प्रधानमंत्री की अपील

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | May 12, 2026

ऐसा नहीं है कि भारत विदेशी मुद्रा के मामलें में संकट में हो बल्कि वास्तविकता तो यह है कि 10 अप्रेल, 2026 के आंकड़ों की ही बात करें तो भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार आज उच्चतम स्तर पर है। 700 बिलियन अमेरिकी डालर से अधिक का विदेशी मुद्रा भण्डार भारत के पास है। एक मोटे अनमुन के अनुसार आगामी 11 माह से अधिक समय तक आयात मांग की पूर्ति इस राशि से आसानी से हो सकती है। विदेशी मुद्रा भण्डार से एफसीए यानी कि विदेशी मुद्रा संपत्ति, स्वर्ण भण्डार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में आरक्षित राशि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। पर इसके सबके बावजूद भविष्य के संभावित संकट के हालातों से निपटने की आवश्यक तैयारियां समय रहते पूरी की जाती है तो यही दूरदृष्टि कहलाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भविष्य के वैश्विक हालात साफ दिखाई दे रहे हैं। हालातों में सुधार की संभावना निकट भविष्य में दिखाई भी नहीं दे रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केवल एक वर्ष के लिए अनावश्यक खर्चों में कटौती का आग्रह देशवासियों से किया है। इसमें ईंधन बचाना, सोना नहीं खरीदने, विदेशी यात्राओं व विदेशों में शादी नहीं करने, खाने के तेल के उपयोग में 10 प्रतिशत तक की कटौती व खेती में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 50 प्रतिशत तक की कटौती करने का सुझाव प्रमुख है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देशवासियों से आग्रह को लेकर आलोचक भले ही मृद्दा बनाने का प्रयास करें पर वैश्विक हालात आज सबके सामने हैं। देशवासियों को मालूम है कि पेट्रोलियम उत्पादों इनमें कच्चे तेल से लेकर गैस आदि आदि शामिल है आदि के लिए आयात पर निर्भरता अधिक है। देश में 979 अरब अमेरिकी डॉलर का सालाना आयात होता है जिसमें से करीब 38 प्रतिशत आयात केवल और केवल पेट्रोलियम पदार्थों पर ही हो रहा है। सोना-चांदी और इलेक्ट्रोनिक्स के साथ ही फर्टिलाइजरों के मामलें में भी विदेशों पर निर्भरता अधिक है। करीब 10 प्रतिशत राशि सोने के आयात पर खर्च होती है। यदि समग्र रुप से देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तेलंगाना के सिकन्दराबाद से देशवासियों से जो आग्रह किया है वह ऐसा नहीं है जो किसी भी तरह से देशवासियों के लिए दुबिधाजनक हो।

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आज सबको मालूम है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते रास्ता अवरुद्ध होने के कारण कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का आयात प्रभावित हो रहा है। हार्मुज का रास्ता अवरुद्ध है। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि ईरान को प्रतिदिन 2800 करोड़ रुपए के कच्चे तेल को समुद्र में बहाना पड़ रहा है। तेल उत्पादक अन्य देश भी संकट के दौर से गुजर रहे हैं। ऐसे में जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी लाने, सार्वजनिक परिवहन वाहनों के उपयोग और वाहन पूलिंग का एक साल का सुझाव या आग्रह दूरदृष्टिपूर्ण व देशहित में ही माना जाना चाहिए। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग का बढ़ावा देना भविष्य के पर्यावरण संकट से बचाव और हरित उर्जा को बढ़ावा देने में ही सहायक हो सकेगा। इसी तरह से हमारे देश मेंं सोने के खरीद के प्रति खास मोह रहता आया है पर हालातों को देखते हुए व्यापक राष्ट्रहित में एक साल के लिए सोना नहीं खरीदे तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। इसी तरह से केवल शानों शोकत के लिए विदेशी यात्राएं करने से बचने की सलाह और विदेशों में शादी करने के स्थान पर स्थानीय पर्यटन और देश में ही एक से एक बेहतरीन वेडिंग डेस्टिनेशंस पर शादी करने से जहां खर्च कम होगा, देश के डेस्टिनेशनों की वैश्विक पहचान के साथ ही विदेशी पूंजी भी बचेगी। इसी तरह से रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से खेती और खेतों की उर्वरा शक्ति प्रभावित होने से आज देश दो चार हो रहा है। जैविक खाद और जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को सीमित करने का आग्रह निश्चित रुप से सकारात्मक ही है। जहां तक मीटिंग्स का प्रश्न है कोविड़ के बाद से सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर अधिकांष मीटिंग्स अब हाईब्रीड मोड पर ही होने लगी है। वर्कफ्राम होम को अवश्य प्रोत्साहित किया जा सकता है।

लब्बो-लबाब यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो देशवासियों से आग्रह किया है उनमें से एक भी ऐसा आग्रह नहीं है जिससे हमारे दैनिक जीवन चर्या प्रभावित हो रही हो। एक भी ऐसा बिन्दु नहीं है जिससे आमजन प्रभावित हो रहा हो। सीधे सीधे एक साल के लिए अपनी आदत व आवश्यकताओं में जरुरी बदलाव के लिए कहा जा रहा है ताकि वैश्विक संकट का असर देश की अर्थव्यवस्था व देश के आमलोगों को प्रभावित ही ना कर सकें। एक साल सोना नहीं खरीदने या ईवी वाहन या सार्वजनिक वाहन का उपयोग या विदेशों में शादी आदि कार्यक्रम आयोजित ना करने या विदेश घूमने नहीं जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला हैं। इसलिए इन सबसे बचने से देश वैश्विक हालातों का अधिक कुशलता से मुकाबला कर सकेगा और सबसे बड़ी बात की स्वदेशी को बढ़ावा मिलेगा। इसलिए आलोचना प्रत्यालोचना से ऊपर उठना होगा। यह देश नेता की एक आवाज पर आगे आना वाला देश है कोविड का समय और स्व. लालबहादुर शास्त्री के एक दिन के उपवास का आग्रह इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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