Jan Gan Man: मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक के प्रस्ताव को लेकर देश में छिड़ी बहस, VHP और Arshad Madani आमने सामने

By नीरज कुमार दुबे | Feb 11, 2026

उत्तराखंड में बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति ने हाल में एक अहम घोषणा करते हुए कुछ चुने हुए हिंदू धर्म स्थलों पर गैर हिंदू लोगों के प्रवेश पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा है। समिति का कहना है कि यह कदम धार्मिक परंपरा, आस्था और पवित्रता की रक्षा के लिए उठाया जा रहा है। समिति के अनुसार, कई प्राचीन मंदिर विशेष धार्मिक मर्यादा के साथ स्थापित हुए थे और उनका मुख्य उद्देश्य हिंदू श्रद्धालुओं को पूजा, साधना और धार्मिक अनुष्ठान का स्थान देना है। इसलिए वहां प्रवेश को उसी दायरे में रखना उचित है। समिति ने कहा कि यह किसी के प्रति वैर का कदम नहीं बल्कि धार्मिक व्यवस्था का पालन है।

इसे भी पढ़ें: Barabanki में Yogi Adityanath का बड़ा बयान, कहा- कयामत तक बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण नहीं होगा

हम आपको बता दें कि हिंदुओं के पवित्र स्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश के मुद्दे को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच कानूनी पहलू भी इस चर्चा के केंद्र में है। संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देते हैं। कई अदालती निर्णयों में यह माना गया है कि किसी धर्म के आवश्यक आचार और पूजा पद्धति में अदालत दखल नहीं कर सकती। मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक पुराने निर्णय में कहा था कि मंदिर मूल रूप से हिंदू समाज के धार्मिक लाभ के लिए हैं और उनकी पवित्रता बनाए रखना धार्मिक आस्था का हिस्सा है।

इसके अलावा, दुनिया के कई धर्मों में पूजा स्थलों के लिए विशेष नियम हैं। मक्का और मदीना में गैर मुस्लिम प्रवेश पर रोक है। कुछ पारसी अग्नि मंदिरों में भी केवल पारसी समुदाय को ही गर्भगृह तक जाने की अनुमति होती है। कई गिरजाघरों में भी कुछ हिस्से केवल उपासना के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं। ऐसे उदाहरणों को देखते हुए मंदिर समिति का कहना है कि उनका प्रस्ताव असामान्य नहीं है।

देखा जाये तो यह विषय संवेदनशील है, पर शांत मन से विचार जरूरी है। भारत एक बहु धर्म देश है जहां हर धर्म को अपने आचार और परंपरा बचाने का अधिकार है। यदि किसी मंदिर की स्थापना ही विशेष पूजा पद्धति और पवित्रता के नियमों पर हुई है, तो उन नियमों का पालन करना गलत नहीं कहा जा सकता। धर्म स्थल केवल भवन नहीं होते, वे आस्था के केंद्र होते हैं। वहां जाने वाला व्यक्ति केवल दर्शक नहीं बल्कि श्रद्धालु माना जाता है। यदि कोई समुदाय अपने पवित्र स्थल की मर्यादा तय करता है, तो उसे तुरंत भेदभाव कहना सही नहीं।

वैसे यह जरूरी है कि ऐसे निर्णय सम्मानजनक भाषा और शांतिपूर्ण तरीके से लागू हों। किसी भी समुदाय के प्रति कटुता न हो और संवाद के दरवाजे खुले रहें। पर साथ ही यह भी मानना होगा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ अपने धर्म के नियमों को जीने की आजादी भी है। इसलिए, यदि मंदिर समिति परंपरा और कानून के दायरे में रहकर निर्णय लेती है, तो उसे समझने की जरूरत है। सह अस्तित्व का अर्थ यह नहीं कि हर सीमा मिटा दी जाए, बल्कि यह कि हर आस्था को उसके दायरे में सम्मान मिले।

प्रमुख खबरें

Instagram का नया Instants Feature: अब Photos होंगी Auto-Delete, कोई नहीं ले पाएगा Screenshot!

Google का Game-Changer अपडेट: 25 करोड़ कारों में Android Auto बदलेगा ड्राइविंग का पूरा एक्सपीरियंस

NEET Exam विवाद: China के Gaokao से क्यों सबक नहीं लेता भारत का Education System?

महंगे Jet Fuel और हवाई प्रतिबंधों का असर, Air India ने कई International Flights में की कटौती।