By डॉ. मुकेश 'असीमित' | Jul 12, 2024
चीख-पुकार की कर्कश आवाज को एम्बुलेंस और पुलिस की गाड़ियां अपनी सायरन की आवाज से दबा रही हैं। अखबार और टीवी न्यूज़ वाले खबरियों का टिड्डी दल पहुंच चुका है, कोने-कोने से तस्वीरें ली जा रही हैं, आखिरकार पृष्ठभूमि को आकर्षक बनाने के लिए उस कोने को आखिरी में चुना गया है जहाँ लाशों के ढेर के साथ उनके रोते बिलखते परिजन भी फोटो फ्रेम में आ जाएं। कुछ शव बेतरतीब से पड़े थे, अब डिसिप्लिन नाम की भी कोई चीज होती है, जिन्दे थे तब लदे पड़े बेढंगे से बाबा की गाडी के नीचे कुचलने को लाइन तोड़ रहे थे, अब मर कर भी लाइन में नहीं लगे हुए, उन्हें किसी अनुशासन पसंद वरिष्ठ पुलिसिया द्वारा लाइन में सजा दिया गया है। उन पर सफेद कपड़े का कफ़न ओढ़ा दिया गया है, बिल्कुल कोरा कफ़न, सरकारी खर्चे का कफ़न। जीते जी तो नहीं, लेकिन मरने के बाद ही सही, लाशों को पूरा कपड़ा तो नसीब हो रहा है। लो जी, मंत्री की गाड़ियों का काफिला भी आ चुका है, इलाके की घेराबंदी कर दी गई है। भीड़ रोना धोना छोड़कर मंत्री जी के दर्शन को उमड़ पडी, बाबा के दर्शन तो अभी कुछ दिन के लिए दुर्लभ हो ही जायेंगे! बाबा एक बार भीड़ मर्दन कर के अपनी थकान मिटने अंतर्ध्यान हो गए हैं!
मुआवजे की भी घोषणा हो गई है। घोषणा होते ही कुछ परिजन उँगलियों में राशि की रकम में कितनी जीरो हैं उसका आकलन कर रहे है। घायलों की और मरने वालों की संख्या पूछी जा रही है। तभी डीएम साहब बोल पड़े, "साहब, अभी घायलों में कुछ और मर सकते हैं, उनका क्या करें?" मंत्रीजी बोले, "ठीक है, इंतजार कर लेते हैं। चार दिन बाद मुआवजा बांट देना।" मंत्रीजी ने घड़ी देखी, हड़बड़ाते हुए अपनी मंशा जाहिर की कि अभी घायलों के समाचार और पूछने हैं, कितने घायल भर्ती हुए हैं। मौके पर मौजूद डॉक्टर इंचार्ज को बुला लिया गया। मंत्रीजी ने दो-चार गरम सी फटकार लगा कर इंचार्ज को हड़का दिया है– “इलाज में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए। अभी जो मरेंगे वह सब हॉस्पिटल की लापरवाही से मरेंगे, ध्यान रखना उसका क्म्पन्सेसन सरकार नहीं देगी, तुम्हारी जेब से लेंगे।" मंत्रीजी मौके से पलायन कर चुके हैं। इसी बीच, सरकारी प्रवक्ता अपनी जेब से एक कागज का पुच्छल्ला निकाल कर प्रेस मीडिया के सामने बोलता है, "हालात काबू में है।"
- डॉ. मुकेश 'असीमित'
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