जाति की गंध (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | May 01, 2024

इस बात की सच्चाई है कि हर इंसान अपनी जाति और सामाजिक स्थिति के साथ पैदा होता है। और जैसे ही वह इंसान बनता है, उसके साथ उसकी जाति और समाज की गंध भी आती है। यह गंध उसके चारों ओर अपने प्रभाव को बिखेरने लगती है। लोग उसे अपना बनाने की कोशिश करते हैं, उसे अपने नेता बनाने का प्रयास करते हैं। राजनीतिक धुरंधरों ने इस गंध का लाभ उठाया और लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए इस्तेमाल किया। वे अपनी जाति की गंध को फैलाते हुए, लोगों को बहका देते हैं, ताकि उन्हें अपने वश में कर सकें। राजनीतिक बाजार में, इस गंध की जगह अर्थशास्त्रियों की जगह गंधविद्या का काम करता है। लेकिन यहाँ की सच्चाई यह है कि कुछ लोग अपनी जाति या समाज की गंध के बिना ही उसी तरह से बड़े और महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उनके पास कोई विशेष गंध नहीं होती, फिर भी वे लोगों को प्रभावित करने में सक्षम होते हैं। उनका मान लेना ही नहीं, बल्कि उन्हें अपना मानना शुरू हो जाता है।


राजनीतिक धुरंधरों के लिए यह सच्चाई स्वीकार करना मुश्किल है। वे चाहते हैं कि लोग उनके बिना गंध के भी उन्हें मानें, लेकिन इस बहुजातीय समाज में, उनके खुद की जाति या समाज के लोगों के लिए ही कुछ होना चाहिए। लेकिन वास्तविकता यह है कि जो लोग अपनी जाति या समाज की गंध को छोड़कर आगे बढ़ते हैं, वे ही अक्सर सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनकी गंध का कोई स्थान नहीं होता, लेकिन वे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम होते हैं। जातीय गंध में इतनी आकर्षण शक्ति होती है कि उससे कुछ भी हो सकता है। लोग अपनी जाति के लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए उस गंध का इस्तेमाल करते हैं। और जैसे ही वे उन्हें अपने बनाते हैं, उनका सीना गर्व से फूल जाता है। यह गंध इतनी शक्तिशाली होती है कि लोगों को अपने पड़ोस में रहने वाले भी उस गंध की दुर्गंध महसूस होती है।

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देश में जातिवाद का अभिशाप इतना है कि यहां लोगों की पहचान उनकी जाति के आधार पर होती है। यही कारण है कि जातिवादी लोगों की आवाज़ और गुणों को बढ़ावा मिलता है, जबकि वहां दूसरे क्षेत्रों के लोगों को अनदेखा कर दिया जाता है। जातिवाद का फैलाव इतना गहरा है कि लोग अपनी जाति की गर्व से बातें करते हैं, और दूसरों को अपने गर्व की गंध से चिढ़ाते हैं। यह ऐसे लोगों के लिए एक प्रकार की आभासी ताकत बन चुका है, जो अपनी जाति के लोगों को अपने वश में करने का प्रयास करते हैं। जातिवाद के बादल इतने गहरे हैं कि वे अब देश के अन्य क्षेत्रों में भी छाये हुए हैं। लोगों को लगता है कि अगर वे अपनी जाति की गंध को नहीं फैलाएंगे, तो वे खुद को प्रमुख नहीं मानेंगे। यह सोचना गलत है, लेकिन यह वास्तविकता है।


जातिवादी लोग चाहते हैं कि उनकी जाति की गंध हर जगह हो, ताकि वे अपने विरोधियों को भी अपने वश में कर सकें। यह गंध इतनी प्रभावी है कि लोग उसे छोड़कर अपने विचारों को नहीं देखते, और उनकी जाति के आधार पर ही उनका मूल्यांकन करते हैं। इस तरह की जातिवादी सोच लोगों को अपने आत्मविश्वास से वंचित कर देती है, और उन्हें अपनी जाति के गर्व की गंध में डूबने के लिए मजबूर कर देती है। यह समाज के लिए एक खतरा है, क्योंकि यह विभाजन और संघर्ष का कारण बनता है।


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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