किराये का दुख (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Mar 30, 2026

कंचनपुर गांव के चतुर सुजान 'घपलेराम' ने जब इस बार प्रधानी का चुनाव लड़ा, तो उन्होंने गांव की सबसे बड़ी और प्राकृतिक समस्या को अपना हथियार बनाया—'समय का अभाव'। घपलेराम का तर्क था कि आज का ग्रामीण इतना व्यस्त है कि उसके पास अपने रिश्तेदारों की मृत्यु पर रोने या बीमार पड़ोसी का हाल चाल पूछने तक का समय नहीं है। उन्होंने अपने घोषणापत्र में वादा किया कि जीतते ही वे गांव में 'इमोशनल आउटसोर्सिंग केंद्र' खोलेंगे। यदि आपके घर में कोई गमी हो जाए और आपको दफ्तर जाना हो, तो सरकार की ओर से 'प्रोफेशनल रोदली' भेजी जाएगी जो आपके हिस्से का विलाप ससुरारी धुन में करेगी। गांव के लोग, जो सामाजिक लोकलाज और काम के बोझ के बीच पिसे जा रहे थे, अचानक इस 'किराये की संवेदना' वाले विचार पर ऐसे रीझे कि उन्हें घपलेराम साक्षात कलयुग के श्रवण कुमार लगने लगे।

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जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और घपलेराम की प्रचंड जीत हुई, पूरा गांव अपने 'संवेदना कूपन' लेने उनके घर पहुँचा। लोग चाहते थे कि अगले हफ्ते होने वाली एक शादी और दो मुंडनों के लिए घपलेराम अपने 'प्रोफेशनल प्रतिनिधि' भेजें। घपलेराम अपनी नई सफारी गाड़ी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक पत्थर थमाते हुए बोले— "भाइयों, संवेदनाएं आउटसोर्स नहीं होतीं, सिर्फ बेची जाती हैं!" जनता हक्की-बक्की रह गई, "हुजूर, हमारे उन प्रोफेशनल रोने वालों का क्या हुआ?" घपलेराम ने चश्मा ठीक किया और ठहाका मारकर बोले, "मूर्खों! रोने वाले तो तुम खुद हो जो अगले पांच साल तक अपनी इस बेवकूफी पर मातम मनाओगे। मैंने तो तुम्हारी भावनाओं का सौदा करके शहर में अपना 'इवेंट मैनेजमेंट' का दफ्तर खोल लिया है। अब इन पत्थरों को अपने सीने पर रखो और खुद के भाग्य पर रोना शुरू करो।" जनता सन्न खड़ी उस सूखे वाटर कूलर को देख रही थी और घपलेराम 'इमोशनल बिजनेस' की धूल उड़ाते हुए शहर की ओर उड़नछू हो गए।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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