तेल की तलवार और कूटनीति की ढाल: पश्चिम एशिया संकट में भारत की अग्निपरीक्षा

By योगेश कुमार गोयल | Apr 07, 2026

दशकों पहले युद्ध केवल सीमाओं पर जमीन के टुकड़ों के लिए लड़े जाते थे लेकिन 2026 का यह दौर गवाह है कि आधुनिक युद्ध ‘संप्रभुता’ से ज्यादा ‘संसाधनों’ का है। युद्ध की गोलियां, मिसाइलें अब ऊर्जा की पाइपलाइनों और तेल के टैंकरों पर चलती है। पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़ा यह त्रिकोणीय संघर्ष भी महज जमीन का विवाद नहीं है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा ‘ऊर्जा आपूर्ति’ पर नियंत्रण की जंग है। भारत के लिए यह संकट केवल पैट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक ऐसी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती है, जिसने देश के सामने एक अदृश्य ‘ऊर्जा लॉकडाउन’ का खतरा पैदा कर दिया है। जब संसद में प्रधानमंत्री ने इस संकट की तुलना ‘कोरोना काल’ की विभीषिका से की तो उनका आशय घर में बंद होने से नहीं बल्कि उस वैश्विक अनिश्चितता से था, जो किसी भी क्षण भारत की विकास दर के पहियों को जाम कर सकती है। यदि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर ताला लगता है तो भारत की रगों में दौड़ने वाला 60 प्रतिशत तेल और एलएनजी का प्रवाह थम जाएगा, जो देश को एक भयावह ‘ऊर्जा लॉकडाउन’ की ओर धकेल सकता है।

इसे भी पढ़ें: US-Israel ने कर दिया Kharg Island पर हमला, राष्ट्रपति Pezeshkian बोले- हर ईरानी जान देने को तैयार, तुर्की में Israeli Consulate के बाहर फायरिंग

सामरिक पैट्रोलियम भंडार: क्या पर्याप्त है चंद दिनों की सुरक्षा?

ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सीमित सामरिक पैट्रोलियम भंडार है। दुनिया के विकसित देश जैसे अमेरिका, जापान और चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए 90 दिनों का ‘स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ रखते हैं, वहीं भारत की स्थिति चिंताजनक है। वर्तमान में हमारे पास विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पाडुर में कुल 53.3 लाख टन का भंडार है, जो मुश्किल से 9 दिन की आपूर्ति कर सकता है। हालांकि दूसरे चरण में चंडीखोल और बीकानेर जैसे स्थानों पर भंडार क्षमता बढ़ाकर इसे 60-65 दिनों तक ले जाने की योजना है लेकिन इसकी गति ‘युद्धस्तर’ पर नहीं है। हमारे मौजूदा भंडार का करीब 36 प्रतिशत हिस्सा खाली पड़ा है। एक तरफ हम तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का स्वप्न देख रहे हैं और दूसरी तरफ हमारी ऊर्जा की ‘लाइफलाइन’ केवल कुछ दिनों के स्टॉक पर टिकी है। यदि आज हमारे पास 90 दिनों का सुरक्षित भंडार होता तो भारत को अपनी विदेश नीति में तटस्थता का नाटक नहीं करना पड़ता बल्कि वह एक सशक्त वैश्विक खिलाड़ी की तरह अपना पक्ष रख सकता था। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य 30 दिनों के लिए बंद हो जाता है और भारत के लिए आपूर्ति बाधित होती है तो भारत की अर्थव्यवस्था ‘वेंटिलेटर’ पर आ जाएगी। इसलिए चंडीखोल और बीकानेर में प्रस्तावित दूसरे चरण के भंडारों का निर्माण युद्धस्तर पर होना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।

कूटनीतिक विवशता और स्वतंत्र विदेश नीति का संकट

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता आज तेल की निर्भरता के कारण परीक्षा की घड़ी में है। तेल की निर्भरता केवल आर्थिक बोझ नहीं बल्कि कूटनीतिक बेड़ियां भी है। भारत को अपने पुराने और रणनीतिक मित्र ईरान का साथ छोड़कर इजरायल और अमेरिकी समर्थित खाड़ी देशों के पाले में खड़े होने पर मजबूर होना पड़ा है। यह बदलाव केवल नीतिगत नहीं बल्कि विवशतापूर्ण है। खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाला ‘रेमिटेंस’ भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसलिए खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख भारतीय प्रवासियों के हितों और तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ही भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से समझौता करना पड़ रहा है। जब तक हम ऊर्जा के लिए आयात पर 85 प्रतिशत निर्भर रहेंगे, तब तक हमारी विदेश नीति की चाबी विदेशी राजधानियों के हाथों में रहेगी और वाशिंगटन या तेहरान में होने वाली हर हलचल नई दिल्ली के माथे पर चिंता की लकीरें खींचती रहेगी। यह युद्ध हमें सिखाता है कि सच्ची संप्रभुता केवल सीमाओं की रक्षा में नहीं बल्कि ऊर्जा की आत्मनिर्भरता में निहित है।

अफवाहों का बाजार और सरकारी डैमेज कंट्रोल

युद्ध के बीच भारत में लॉकडाउन की अफवाहों ने पैनिक पैदा किया है। हालांकि, तीन मंत्रियों निर्मला सीतारमण, किरेन रिजिजू और हरदीप पुरी ने स्पष्ट किया कि देश सुरक्षित है। सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि भारत के पास तेल और गैस की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए विविधीकृत स्रोत हैं और  पैनिक की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन सतर्कता और ऊर्जा संरक्षण हमारा सामूहिक धर्म है। सरकार का यह स्पष्टीकरण अल्पकालिक राहत तो देता है लेकिन एक दीर्घकालिक प्रश्न भी छोड़ता है कि क्या हम हर संकट के समय केवल डैमेज कंट्रोल ही करते रहेंगे या भविष्य की नींव रखेंगे?

विकल्प नहीं, अनिवार्यता है वैकल्पिक ऊर्जा

वैश्विक ऊर्जा संकट और बढ़ती आयात निर्भरता के इस दौर में वैकल्पिक ऊर्जा अब केवल एक विकल्प नहीं बल्कि राष्ट्रीय अनिवार्यता बन चुकी है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही सच्ची स्वतंत्रता का आधार है और भारत को इस दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे। प्रधानमंत्री की मुफ्त बिजली योजनाएं और रूफटॉप सोलर मिशन केवल नीतिगत पहल नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत के सशक्त आधारस्तंभ हैं। भारत में 33 करोड़ एलपीजी उपभोक्ता हैं, जो बड़े पैमाने पर आयातित ईंधन पर निर्भर हैं। यदि रसोई को इंडक्शन कुकिंग और एथनॉल आधारित विकल्पों की ओर मोड़ा जाए तो न केवल खर्च कम होगा बल्कि ऊर्जा आयात का बोझ भी घटेगा। लगभग 8 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली पर खाना बनाना एलपीजी की तुलना में किफायती है, वहीं कृषि अवशेषों से बनने वाला एथनॉल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। इससे ‘अन्नदाता’ ही ‘ऊर्जादाता’ बन सकता है। परिवहन क्षेत्र में विद्युतीकरण भी उतना ही आवश्यक है। वर्तमान में तेल की सबसे अधिक खपत इसी क्षेत्र में होती है जबकि बिजली की हिस्सेदारी नगण्य है। यदि सार्वजनिक और वाणिज्यिक परिवहन को इलैक्ट्रिक किया जाए तो अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है। सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्प भारत को स्थायी, स्वच्छ और सुरक्षित ऊर्जा भविष्य की ओर ले जा सकते हैं। अब समय आ गया है कि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक परिवर्तन करे।

बिजली खपत का बदलता स्वरूप

भारतीय अर्थव्यवस्था में बिजली का 42 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों में और 17 प्रतिशत कृषि में उपयोग होता है। जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, कार्यालयों और दुकानों (वाणिज्यिक क्षेत्र) में बिजली की मांग बढ़ेगी। हमें कोयला आधारित बिजली (जो अभी भी हमारी रीढ़ है) से हटकर परमाणु, सौर और पवन ऊर्जा की ओर तीव्र गति से मुड़ना होगा। सालाना 143 अरब डॉलर (2025 के आंकड़े) का तेल आयात एक ऐसा घाव है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। सूर्य और पवन के रूप में भारत के पास असीमित प्राकृतिक संसाधन हैं लेकिन उन्हें ‘ऊर्जा’ में बदलने की इच्छाशक्ति और निवेश की गति अभी भी मंथर है।

भविष्य का रोडमैप: ऊर्जा सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा

ईरान-इजरायल युद्ध ने भारत के लिए एक कठोर चेतावनी प्रस्तुत की है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होता है तो यह केवल क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ‘आर्थिक प्रलय’ का कारण बन सकता है। उर्वरक, ईंधन, सेमीकंडक्टर, हर आपूर्ति शृंखला पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में भारत को त्वरित, ठोस और दूरदर्शी कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, रणनीतिक भंडार का सुदृढ़ीकरण अनिवार्य है। अगले 24 महीनों में कम से कम 90 दिनों का तेल और गैस रिजर्व तैयार करना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि किसी भी वैश्विक व्यवधान के समय देश की ऊर्जा आवश्यकताएं प्रभावित न हों। दूसरा, ऊर्जा विविधीकरण पर आक्रामक रणनीति अपनानी होगी। रूस, मध्य एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते, पाइपलाइन परियोजनाएं और वैकल्पिक व्यापार मार्ग विकसित करना समय की मांग है। तीसरा, परमाणु ऊर्जा, सौर शक्ति और ग्रीन हाइड्रोजन में निवेश को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा। ये केवल स्वच्छ ऊर्जा के स्रोत नहीं बल्कि स्थायी ऊर्जा सुरक्षा के स्तंभ हैं। अंततः, यह स्पष्ट है कि वैश्विक शांति हमारे नियंत्रण में नहीं परंतु अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना पूरी तरह हमारे हाथ में है। आत्मनिर्भरता अब केवल नारा नहीं बल्कि अस्तित्व की शर्त बन चुकी है। यदि हम आज निर्णायक कदम नहीं उठाते तो भविष्य का अंधकार हमारी ही निष्क्रियता का परिणाम होगा।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)

प्रमुख खबरें

Tronglaobi Blast के बाद Manipur में बड़ा एक्शन, जांच NIA के हाथ, चॉपर से सर्च ऑपरेशन जारी

आज रात एक पूरी सभ्यता का हो जाएगा अंत, ट्रंप अब ईरान में वही करेंगे जिसका पूरी दुनिया को था डर?

Assam में सरकार बनते ही पहली Cabinet में UCC, Amit Shah बोले- चार शादी अब नहीं चलेगी

Mumbai vs Rajasthan: गुवाहाटी में हाई-वोल्टेज टक्कर, Points Table में टॉप पर पहुंचने की जंग।