भाजपा को परखने के औजार बदलने होंगे

By राकेश सैन | May 09, 2026

भारतीय जनता पार्टी की बंगाल जीत ने केवल राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों का भी ध्यान आकर्षित किया है। सभी अपने-अपने मापदण्डों पर इस चुनाव परिणाम को परख रहे हैं परन्तु पुराने ढर्रों पर चलते हुए फिर से गलती पर गलती दोहराते लगते हैं। यहां के विपक्ष की मानें तो यह एसआईआर के प्रयोग से निकला विजयमार्ग है तो विदेशी विश्लेषक फिर से जिंगल बैल जिंदल बैल की तरज पर साम्प्रदायिकता का गीत गाने लगे हैं। इन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम बताते हैं कि भाजपा ने कहीं पहली बार पांव जमाए हैं, कहीं वह फिर से सत्ता में आई है तो कहीं उसने अपना जनाधार बढ़ाया है। अगर केरल जैसे राज्य में वामपंथी दलों को भाजपा के प्रभाव के डर से अयप्पा के दर्शन करने पड़ें, भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से बंजर कहे जाने वाले बंगाल में कमल की फसल लहलाने लगे, द्रविड़ राजनीति के केंद्र तमिलनाडू में उसकी आहट सुनने लगे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि विरोधी इस दल को गलत औजारों से परख रहे हैं। विरोधी भूलते हैं कि देश का मतदाता मदिहीन नहीं है, वह सुशासन व विकास को अपनी पसंद बनाता जा रहा है। अगर कोई दल संविधान के अनुरूप काम करते हुए जनता की पसंद बन रहा है तो विरोधियों को भी अपनी सोच बदलनी होगी।

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राष्ट्रवाद को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लेकर अनेक विचारक स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत का राष्ट्रवाद संकीर्ण पश्चिमी राष्ट्रवाद से सर्वदा विपरीत है। पश्चिमी मीडिया भारत को अक्सर यूरोपीय राजनीतिक अनुभवों के चश्मे से देखने की कोशिश करता है। वहां राष्ट्रवाद का अर्थ सत्ता विस्तार व नस्लीय वर्चस्व रहा है। जबकि भारत में राष्ट्रवाद सांस्कृतिक, सभ्यतागत पहचान और ऐतिहासिक आत्मबोध से जुड़ा है। इसे विदेशी मीडिया समझ नहीं पाता। इसीलिए वो हमारे सांस्कृतिक पुनर्जागरण को सीधे अल्पसंख्यक-बहुसंख्यकवाद से जोड़ देता है। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा की जीत को पश्चिम के विश्लेषकों ने लोकतांत्रिक परिवर्तन के बजाय हिंदू राष्ट्रवादी कब्जे की तरह प्रस्तुत किया गया। एसआईआर पर अर्धसत्य दिखाते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने परिणामों के बाद वोट चोरी का आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को भाजपा का आयोग बताया। विदेशी मीडिया ने इन आरोपों को लगभग बिना तथ्य जांचे ही अपने विमर्श का आधार बना लिया। विशेष रूप से एसआईआर को मुस्लिम मतदाताओं को हटाने की साजिश के रूप में पेश किया गया, जबकि हटाए गए 91 लाख नामों में 63 प्रतिशत हिंदू मतदाता थे। बड़ी संख्या में नाम मृत, डुप्लिकेट, स्थायी रूप से स्थानांतरित या फर्जी पाए गए थे। इसके बावजूद विदेशी मीडिया के बड़े हिस्से ने केवल मुस्लिम वोट हटाए गए वाली जिद को प्रमुखता दी। देसी-विदेशी विश्लेषक यह भूल गए कि जिन 20 सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोट काटे गए थे, उनमें से ज्यादातर पर टीएमसी ने ही कब्जा जमाया है। इन सीटों में समशेरगंज, लालगोला, भगवानगोला, रघुनाथगंज, मटियाबुर्ज, सूती, मोथाबाड़ी, गोलपोखर, मालतीपुर, चोपड़ा, सुजापुर, राजारहाट न्यू टाउन और बशीरहाट उत्तर शामिल हैं। इन सभी 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी को जीत मिली है। अन्य सीटों की बात करें तो फरक्का सीट पर सबसे ज्यादा 38,222 वोट काटे गए थे, लेकिन वहाँ से कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की। वहीं भाजपा को जंगीपुर, रतुआ, करनदिघी, केतुग्राम, मानिकचक और मोंतेश्वर जैसी 6 सीटों पर जीत मिली। यह अकेला आँकड़ा ही उस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल देता है जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि वोटर लिस्ट में सुधार से सिर्फ टीएमसी को नुकसान हुआ और भाजपा को फायदा पहुँचा।

अगर बड़े पैमाने पर देखें, तो जिन 187 सीटों पर 5,000 से ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, वहां भाजपा ने 119 और टीएमसी ने 65 सीटों पर जीत दर्ज की। इन 187 सीटों में से 47 सीटें ऐसी थीं, जहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। भाजपा ने जो 119 सीटें जीतीं, उनमें से 28 सीटों पर जीत का अंतर कटे हुए वोटों से कम था। इन आँकड़ों से साफ है कि कई सीटों पर कांटे की टक्कर थी और वहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के मार्जिन से ज्यादा रही। लेकिन हार का पूरा ठीकरा सिर्फ वोटर लिस्ट सुधार की प्रक्रिया पर फोड़ देना और इसे ही हार की एकमात्र वजह बताना पूरी तरह से भ्रामक और गलत है।

सच्चाई यह है कि देसी-विदेशी विश्लेषकों को नरेंद्र मोदी और भाजपा का बढ़ता राजनीतिक विस्तार विदेशी वैचारिक प्रतिष्ठानों की सबसे बड़ी बेचैनी बन चुका है। खास कर उन क्षेत्रों में यह जलन ज्यादा है जो 2024 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली थोड़ी राजनीतिक राहत को लेकर उत्साहित चला आरहा था। आज भाजपा अधिकांश राज्यों में प्रत्यक्ष या गठबंधन के जरिए सत्ता में है। ऐसे में भारत को हिन्दू राष्ट्रवादी  लोकतंत्र और एकदलीय प्रभुत्व के खांचे में फिट करने की कोशिशें और तेज होती दिख रही हैं। परंतु बंगाल का फैसला यह भी साबित करता है कि भारत का मतदाता अपनी प्राथमिकताएं जमीन, अनुभव और आकांक्षाओं के आधार पर तय कर रहा है, न कि न्यूयॉर्क, लंदन या दोहा में बैठे नैरेटिव निर्माताओं की वैचारिक दृष्टि के अनुसार।

विदेशी विश्लेषणों में बंगाल के चुनावी परिणाम को हिन्दुत्व के उभार के रंग में रंग दिया। लेकिन वहां की जनता की नाराजगी, आर्थिक बदहाली, भ्रष्टाचार, महिला उत्पीडऩ, सत्ताधारियों की हिंसा, उद्योगों का पलायन जैसे कारणों की अनदेखी कर गया। आज बंगाल पर कर्ज 7.7 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। हजारों कंपनियां राज्य छोड़ चुकी हैं। युवाओं का बड़ा वर्ग रोजगार के लिए पलायन कर रहा है। महानगरों में घरों में काम करने वाली अधिकतर महिलाएं बंगाली ही निकलती हैं। कट मनी, भर्ती घोटाले और सिंडिकेट संस्कृति जैसे मुद्दे वर्षों से जनता में असंतोष पैदा कर रहे थे। लेकिन देसी-विदेशी विश्लेषक उलझे हैं एसआईआर और  बहुसंख्यकवाद के उभार में। इसी दकियानूसी सोच के आधार पर यह तत्व जनता में अप्रासंगिक हो रहे हंै और भाजपा का ग्राफ निरंतर बढ़ रहा है।

- राकेश सैन

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