कैशलैस होती जिंदगी में बढ़ रही हैं कुछ नई तरह की मुश्किलें भीं

By संतोष उत्सुक | Jan 03, 2019

बाज़ार में सरकारी बैंक का एटीएम है जिसे बैंक ने आउटसोर्स कर रखा है। जिसमें से कभी सिर्फ दो सौ के नोट निकलते हैं तो कभी सिर्फ दो हज़ार के। रिज़र्व बैंक जैसा न चाहे बैंक वाले वैसे ही नोट इसमें डालते हैं। एटीएम न चले तो इस बारे में कोई फोन घुमाकर राज़ी नहीं। राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान के अंतर्गत यहां सफाई हो या न हो। परेशान दरवाजा चुचू करते घिसटते घोषणा करता है, परसों गिर जाऊंगा। गिरता तो शायद उसकी ठीक ठाक मुरम्म्त हो जाती। सुबह की सैर के समय एटीएम कार्ड साथ ले गया सोचा सुबह रश नहीं होता, पैसे निकाल लेता हूं मगर एटीएम में कैश नहीं था। मुझे लगा एटीएम में कैश डालने वाले समझते हैं कि देश और देशवासी डिजिटल होने में व्यस्त होते जा रहे हैं, तो एटीएम में कैश न डालकर ज़्यादा डिजिटल होने में सहयोग करना चाहिए। अब तो एक केले की कीमत का भी डिजिटल भुगतान कर सकते हैं। सब कुछ डिजिटल हो रहा है प्यार, मुहब्बत, भावनाएं और हां रिश्ते भी।

  

दुनिया की अर्थ व्यवस्था ने सिक्सर मार दिया है, हमारी प्रगति का लोहा, पीतल, कांस्य, चांदी और सोना सब माना जा रहा है। कर्जमाफ़ी और आय दोगुनी करने की लुभावनी घोषणाओं के बहाने आधारभूत  समस्याओं को समझने का प्रयास राजनीतिक डिजिटल ईमानदारी से हो रहा है। हम सब साक्षर हो चुके हैं इस पुष्टि के बावजूद लोग खोज में लगे हैं कि वास्तव में कितने मानुष निरक्षर हैं और डिजिटल ज़िंदगी के तकनीकी पहलुओं से अनजान हैं। कुछ समय पहले देशद्रोही झूठ बोल रहे थे कि नवासी करोड़ हिन्दुस्तानी इंडियंस के पास इंटरनेट नहीं है। गर्व की बात है कि देश इंटरनेट प्रयोग के हिसाब से दुनिया में दूसरे नंबर पर है अगर मगर गुणवत्ता व स्पीड के मामले में थोड़ा टांय टांय फिस्स हो भी गया तो क्या फर्क पड़ गया। अब हाथी खड़ा होकर हिलने लगे छोटे मोटे वृक्ष नष्ट हो जाएं तो बुरा नहीं मानना चाहिए।

ज़िंदगी की मूल सुविधाओं की ओर ध्यान दिया जा रहा है उदाहरण के लिए डिजिटली पुष्टि हो चुकी है कि खुले में शौच से सबको मुक्ति मिल गई, पर वस्तुतः कितने रह गए यह जानने की सबको क्या ज़रूरत है।  देशवासी कैश लैस व ज़िंदगी डिजिटल हो रही है यह हमारी असली उपलब्धि है। सुनने में आया है कि डिजिटल लेनदेन में अपराध भी बढ़ रहे हैं। कुछ गलत लोग कह रहे हैं कि हमारे देश में विशाल आधारभूत नेटवर्क नहीं है जिससे डिजिटल अपराधों को पकड़ने में मदद मिल सके। स्वीडन कैशलैस लेनदेन में आगे रहा है और इसी देश ने बोफ़ोर्स जैसा शानदार घोटाला किया तभी तो हम डिजिटल हो रहे हैं। अपराध में लिप्त लोग कैश लैस के विकल्प जैसे सोना, हुंडी व हवाला वगैरा ढूंढने में लगे रहते हैं। अमेरिका वहां नकद डॉलर रखने का प्रचलन कम नहीं कर पाया है।

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पत्नी से उधार लिए पैसे लौटाने थे इसलिए कुछ देर बाद पैसे निकालने बैंक ही जाना पड़ा। वापसी में एक दुकानदार से कह बैठा स्वाइप मशीन नहीं लगवाई। बोला, क्या करनी है, हमें तो मोबाइल का सिस्टम भी ज़्यादा नहीं आता। ठेला लगाने व हम जैसे छोटे फुटकर व्यापारी अपना सामान बेचेंगे या मोबाइल से उलझते रहेंगे किस किस को समझाते रहेंगे और समझते रहेंगे। भगवान न करे हमारी स्वाइप मशीन खराब हो गई तो ग्राहक तो वहीं दौड़ेगा जहां मशीन ठीक चल रही होगी। इसमें बिजली का रोल भी होगा, यहां शहर में लाइट का बुरा हाल है गांव में तो महा बुरा हाल है, लाइट जाती है तो लौट कर कब आएगी बताती नहीं।  गांव से सामान बेचने आए किसान की मशीन जब चलेगी नहीं तो बेचारा खाली बैठा रहेगा या उदास वापिस घर को लौटेगा। तकनीकी खराबी हो गई तो और पंगा। छुट्टे के अभाव में लोग वहां जाएंगे जहां भुगतान की सुविधा होगी और इस बार भी वह कमाई करेंगे जिनकी मशीन चल रही होगी। बंद मशीन वाले मायूस बैठे रहेंगे और दूसरे मनमाना कमाएंगे। समझ में आ गया कि ‘कैश लैस’ नहीं ‘कैश से लैस’ होना भी ज़रूरी है। मैंने उनकी बात को ज़्यादा संजीदगी से नहीं लिया हमारी ज़िंदगी को डिजिटल होना है तो छोटी बातें अनदेखी करनी पड़ेंगी।

-संतोष उत्सुक

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