तालीबान के कब्जे के बाद मोदी सरकार के सामने हैं ये अहम मुद्दे

By टीम प्रभासाक्षी | Aug 17, 2021

तालिबान द्वारा काबुल में प्रेसिडेंशियल पैलेस पर कब्जा करने और राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश से भाग जाने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी सरकार ने अभी तक अफगानिस्तान की घटनाओं पर कोई टिप्पणी नहीं की है। शीर्ष सुरक्षा, कैबिनेट, विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय के अधिकारियों के सामने अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति और भविष्य को लेकर भारत के सामने भी कुछ सवाल है...

 रविवार को एयर इंडिया की एक उड़ान काबुल से 129 यात्रियों को लेकर दिल्ली के लिए उड़ान भरने में सक्षम थी, लेकिन तभी काबुल के हामिद करजई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अराजकता का माहौल बन गया, जिससे उड़ानें चलने में असमर्थ हो गईं। काबुल हवाई क्षेत्र को बंद कर दिया गया है। सूत्रों के अनुसार, भारत अपने सैन्य सी-17 का उपयोग राजनयिकों, सुरक्षा कर्मियों और शेष भारतीय नागरिकों को काबुल से वापस लाने के लिए करना चाहता है, लेकिन सड़क से हवाई अड्डे तक पहुंच असुरक्षित है। हालांकि, अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो बलों द्वारा वहां सुरक्षा बढाया जा रहा है और उड़ानों को उतारने की अनुमति दी जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक यह सरकार की पहली प्राथमिकता है।

2. अफगानों की मदद नहीं करना चाहते

सैकड़ों अफगान नागरिक, जिनमें से कई पिछली गनी सरकार से संबंधित थे। देश छोड़ने की मांग कर रहे हैं और उन्होंने काबुल में भारतीय दूतावास से वीजा के लिए आवेदन किया है। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिनका भारत से संबंध है, जिन्होंने यहां अध्ययन किया है या प्रशिक्षण प्राप्त किया है, या भारत में परिवारों के साथ हैं, या वे लोग हैं, जिन्हें तालिबान मिलिशिया के प्रतिशोध के हमलों का सामना करना पड़ सकता है। विदेश मंत्रालय ने अफगानिस्तान में हिंदू और सिख अल्पसंख्यक सदस्यों की सुविधा के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इस पर कोई नीति घोषित नहीं की गई है। सरकार अगर अफगानों का स्वागत करेगी तो हजारों शरणार्थियों की व्यवस्था करनी पडेगी।

3. तालिबान शासन को मान्यता

पिछले हफ्ते दोहा में तालिबान के साथ भारत, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधियों और अफगान प्रतिनिधियों सहित 12 देशों की बातचीत के बाद जारी किए गए नौ सूत्री बयान में यह स्पष्ट कर दिया कि वे अफगानिस्तान में किसी भी ऐसी सरकार को मान्यता नहीं देंगे जो सैन्य बल द्वारा थोपी गई है।

 अफगान राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा बलों ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और तालिबान लड़ाके काबुल चले गए, बिना किसी रक्तपात के राष्ट्रपति भवन पर नियंत्रण कर लिया। सवाल यह है कि क्या ये देश, जिनमें भारत भी शामिल है, अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, पाकिस्तान, तुर्की, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, जर्मनी, नॉर्वे और कतर तालिबान शासन को मान्यता देने पर विचार करेंगे। यह निर्णय भारत के लिए विशेष रूप से कठिन है, जो अफगान सरकार के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था। तालिबान शासन को मान्यता देना भारत के लिए एक कठिन कदम होगा।  

4. तालिबान शासन से निपटना

चाहे भारत तालिबान को अफगानिस्तान में वैध शासक के रूप में मान्यता देता हो या नहीं, सरकार को तालिबान से संचार के चैनल खोलने होंगे। पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा अधिकारियों और राजनयिकों ने दोहा में तालिबान के साथ प्रारंभिक गुप्त संपर्क किया है और विदेश मंत्रालय ने कहा कि अफगानिस्तान में विभिन्न हितधारकों को शामिल कर रहा है। शुरुआत में काबुल में भारतीय दूतावास की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन संपर्कों को विस्तृत करना होगा, लेकिन भविष्य में अफगान हवाई क्षेत्र, पारगमन व्यापार, मानवीय सहायता आदि का उपयोग करने के लिए भी उपाय खोजना होगा।

5. अफगानिस्तान के साथ रणनीतिक विकल्प

सरकार के सामने बड़ा सवाल हैं कि अफगानिस्तान में उसके रणनीतिक विकल्प कैसे बदलेंगे, क्योंकि तालिबान की पाकिस्तान से निकटता है और भारत विरोधी आतंकवादी समूह अफगानिस्तान में आतंक को अंजाम देने के लिए जगह ले सकते हैं। नई सरकार के साथ भारत के रिश्तें में खराब होने की संभावना है, क्योंकि तालिबान पर पाकिस्तान का प्रभाव मजबूत बना हुआ है। भविष्य की कनेक्टिविटी से जुड़े अन्य रणनीतिक मुद्दे, जिन्हें भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह के माध्यम से करने की मांग की थी, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।

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