दिल्ली मेट्रो का यह फैसला- बढ़ जाएगी यात्रियों की परेशानी

By संतोष कुमार पाठक | Jul 02, 2026

दुनिया भर के विकसित देशों के विकास की कहानी को अगर आप पढ़ेंगे तो उसमें दो चीजें आपको कॉमन नजर आएंगी। बेहतर सड़क और शानदार सार्वजनिक परिवहन (बस, मेट्रो, ट्रेन आदि) व्यवस्था। कई मायनों में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर सरकार द्वारा किए गए खर्च को बड़ा निवेश ही माना जाता है क्योंकि दशकों तक इसका फायदा उस देश की अर्थव्यवस्था को मिलता रहता है।

भारत जैसे देश के लिए बेहतर, सुगम और तेज रफ्तार वाली सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था तो और भी जरूरी है क्योंकि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सबसे ज्यादा क्रूड ऑयल और गैस के आयात पर ही खर्च होता है। तमाम दावों के बीच कड़वी सच्चाई तो यही है कि भारत पेट्रोल-डीजल और गैस के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है और हमारी निर्भरता किस हद तक है, इसका अंदाजा ईरान बनाम अमेरिका की लड़ाई के असर के रूप में हम सबको दिख ही गया है।

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भारत के लगभग हर शहर में सड़कों का निर्माण तेजी से हो रहा है लेकिन सार्वजनिक परिवहन की लचर व्यवस्था के कारण लोग उससे भी ज्यादा तेजी से पर्सनल गाड़ियां खरीदते हैं और नतीजा हर तरफ ट्रैफिक जाम यानी पेट्रोल-डीजल और गैस की बर्बादी।

दिल्ली में भी मेट्रो का तेजी से विस्तार तो हो रहा है लेकिन यह दिल्ली की जरूरतों के लिहाज से अभी भी काफी पीछे है। एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को नकारते हुए दिल्ली मेट्रो में इसकी शुरुआत के समय ही यह फैसला किया गया था कि स्टूडेंट्स, बुजुर्ग और पत्रकार सहित किसी भी कैटेगरी में किसी को भी रियायती दरों पर कोई पास जारी नहीं किया जाएगा। थोड़े बहुत विरोध के बाद सबने इसे स्वीकार कर लिया जबकि दिल्ली की सरकारी परिवहन व्यवस्था यानी डीटीसी बसों में कई कैटेगरी के यात्रियों को रियायती दरों पर पास आज भी जारी किए जाते हैं।

लोगों ने रियायती दरों पर पास जारी नहीं करने और दिल्ली मेट्रो के महंगे किराए को भी इसलिए स्वीकार कर लिया क्योंकि उन्हें लगा कि अब देश की राजधानी में उन्हें विश्वस्तरीय परिवहन व्यवस्था मिलेगी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली मेट्रो एक के बाद एक ऐसा फैसला कर रहा है, जिससे यात्रियों की परेशानी बढ़ती जा रही है। 

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के अधिकारी शायद यह भूल गए हैं कि उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी उन यात्रियों के प्रति है जो उन्हें महंगा किराया देकर मेट्रो में सफर करते हैं। ये अधिकारी, यह भी भूल जाते हैं कि ये भारत है, जहां नैतिकता से जुड़े मुद्दों का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

दिल्ली मेट्रो ने अब यह फैसला किया है कि वो यात्रियों को अब विज्ञापन सिर्फ दिखाएगा ही नहीं बल्कि सुनाएगा भी। यानी जब आप मेट्रो के अंदर सफर करते समय, यह सुनने की प्रतीक्षा कर रहे होंगे कि अगला स्टेशन कौन सा आने वाला है ताकि आप अपने स्टेशन पर उतरने की तैयारी कर सकें तो इस बीच आपको दिल्ली मेट्रो अलग-अलग कंपनियों के विज्ञापन सुनने को मजबूर कर देगा। बताया जा रहा है कि दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन यानी DMRC ने अपने नॉन-ऑपरेशन रेवेन्यू को बढ़ाने के लिए ट्रेन के अंदर ऑडियो विज्ञापन शुरू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। हालांकि अधिकारियों ने यह दावा भी किया है कि कंपनियों के ऑडियो विज्ञापन से मेट्रो के अंदर होने वाली जरूरी घोषणाओं जैसे- 'अगला स्टेशन कौन सा है, दरवाजे बंद होने वाले हैं, दरवाजों से हटकर खड़े रहें, यह ट्रेन कहां तक जाएगी' पर असर नहीं पड़ेगा। लेकिन इस पर आप कितना भरोसा कर सकते हैं, आप खुद ही सोचिए। 

आपको बता दें कि, वर्तमान में भी दिल्ली मेट्रो की कमाई का सबसे बड़ा जरिया मेट्रो ऑपरेशन यानी इसपर सफर करने वाले यात्रियों से ही आता है। जबकि अन्य कामों यानी गैर ऑपरेशनल गतिविधियों से कुल कमाई का सिर्फ 20 प्रतिशत हिस्सा ही आता है जिसमें हर तरह के विज्ञापन (स्टेशनों के नाम तक बेचना शामिल है) शामिल हैं। इसके अलावा मेट्रो स्टेशनों पर दुकानों, कियोस्क, एटीएम और पार्किंग से भी कमाई होती है।

जब यात्री खचाखच भरे मेट्रो में (अगला स्टेशन जानने के लिए) डिस्प्ले बोर्ड तक नहीं देख पाता है, तब मेट्रो हमें विज्ञापन सुनाना चाहता है। लेकिन यह शायद पहला मामला नहीं है जब दिल्ली मेट्रो के अधिकारियों ने ऐसा फैसला किया हो। यात्रियों की मुश्किलें बढ़ाने वाले फैसलों की तो एक लंबी लिस्ट बनाई जा सकती है।

यात्रियों की सुविधा के लिए एक सिंपल सा स्मार्ट कार्ड जारी किया गया था, जिसे यात्री बड़ी ही आसानी से किसी भी स्टेशन से बनवा सकता था और खराब होने पर लौटा भी सकता था। अब मेट्रो ने बैंक से जुड़े कार्ड को थोपने के लिए साधारण वाला स्मार्ट कार्ड छापना ही बंद कर दिया है। प्लास्टिक वाला पुराना टोकन बंद करके, कागज वाला देने लगे हैं जिससे हर स्टेशन के कस्टमर केयर पर आपको कागजों का ढ़ेर नजर आएगा। मेट्रो ने नहीं ले जाने वाले सामानों की लंबी-चौड़ी लिस्ट जारी कर रखी है लेकिन उन्हें स्टेशनों पर चलाए जा रहे रेस्टोरेंट में कोई खतरा नज़र नहीं आता। हद तो तब हो जाती है जब ये अपने स्टेशनों पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर कंडोम का भी विज्ञापन करते नज़र आते हैं। 

अब ये वक्त आ गया है कि दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के अधिकारियों को यह बताया जाए कि इसके गठन का मूल उद्देश्य पूरी दिल्ली को जोड़ना था एवं है( अब तो इसमें NCR का इलाका भी शामिल हो गया है) और यात्रियों को तेज और सुगम सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था देना है। अभी भी दिल्ली एनसीआर का काफी बड़ा इलाका मेट्रो की सुविधा से वंचित है। जिसमें से कई रूट तो दिल्ली मेट्रो के लिए काफी प्रॉफिटेबल भी हो सकते हैं। 

- संतोष कुमार पाठक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं

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