By अनन्या मिश्रा | Jul 21, 2025
सूतजी बोले, मैं मंगल त्रयोदशी प्रदोष व्रत का विधान कह रहा हूं। भौम प्रदोष का व्रत व्याधियों का नाशक है और इस व्रत में जातक को गेहूं और गुड़ का भोजन एक समय करना चाहिए। इस व्रत करने से जातक के सभी पाप और रोग दूर होते हैं। प्राचीन समय में एक बुढ़िया ने इस व्रत को किया था और उसको मोक्ष प्राप्त हुई थी। एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी, उसके बेटे का नाम मंगलिया था। उस बुढ़िया को हनुमान जी पर अटूट श्रद्धा थी। वह हर मंगलवार को हनुमान जी का व्रत करती और उनका भोग लगाती थी। वहीं वह वृद्धा न तो मंगलवार को घर लीपती थी और न मिट्टी खोदती थी।
इस बार साधु ने कहा कि यदि तू लीप और मिट्टी खोद नहीं सकती है, तो अपने बेटे को बुला मैं उसको औंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलाकर अपने लिए भोजन बनाउंगा। यह सुनकर वृद्धा के पैरों तले जमीन खिसक गई, लेकिन वह साधु से वचन हार चुकी थी। ऐसे में उसने अपने बेटे मंगलिया को बुलाकर साधु महाराज के हवाले कर दिया। साधु ने वृद्धा के हाथों उसके बेटे को ओंधा लिटाकर उसकी पीठ पर आग जलवाई।
बेटे की पीठ पर आग जलाकर वृद्धा दुखी मन से अपने घर में चली गई। फिर साधु महाराज ने उसको बुलाया और कहा कि अपने बेटे मंगलिया को पुकारे, जिससे कि वह भी भोग लगा सके। तब वृद्धा ने आंखों में आंसू भरकर और हाथ जोड़कर साधु से कहा कि पुत्र का नाम लेकर अब उसके हृदय को और दुख न दें। लेकिन साधु महाराज नहीं माने, जिससे वृद्धा को हार मानकर अपने पुत्र मंगलिया को बुलाना पड़ा। वृद्धा के बुलाते ही मंगलिया हंसता हुआ घर में दौड़ आया। बेटे को जीता-जागता देखकर वृद्धा को सुखद आश्चर्य हुआ और वह साधु महाराज के चरणों में गिर पड़ी। जिसके बाद साधु महाराज ने अपनी असली रूप में दर्शन दिए। अपने आंगन में हनुमान जी को देखकर वृद्धा का जीवन सफल हुआ और वह मोक्ष को प्राप्त हुई।