Vishwakhabram: Canada का विज्ञापन देकर भड़के Trump का रुख देखकर तमाम देशों की सरकारें सहम गयी हैं

By नीरज कुमार दुबे | Oct 25, 2025

अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक तनावों का एक नया अध्याय उस समय खुल गया जब कनाडा के ओंटारियो प्रांत की सरकार ने अमेरिका में एक एंटी-टैरिफ विज्ञापन अभियान चलाया और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए तत्काल व्यापार वार्ताएँ समाप्त करने की घोषणा कर दी। यह विवाद केवल एक विज्ञापन से जुड़ा नहीं, बल्कि उत्तर अमेरिकी व्यापार संबंधों और वैश्विक आर्थिक राजनीति में उभरते असंतुलन की झलक है।


हम आपको बता दें कि कनाडा द्वारा चलाए गए इस 60-सेकंड के विज्ञापन में 1987 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के एक रेडियो संबोधन के अंशों का प्रयोग किया गया था। रीगन ने उस भाषण में मुक्त एवं निष्पक्ष व्यापार की वकालत करते हुए चेताया था कि “टैरिफ़ से श्रमिकों और व्यवसायों को नुकसान होता है और यह व्यापार युद्धों को जन्म देते हैं।” ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड ने बताया कि यह अभियान अमेरिका के नागरिकों को यह याद दिलाने के लिए था कि व्यापारिक प्रतिबंध अंततः दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को हानि पहुँचाते हैं। उनका कहना था, “हमारा उद्देश्य बातचीत शुरू करना था— यह दिखाने के लिए कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था किस दिशा में बढ़नी चाहिए।”

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लेकिन यह संदेश ट्रंप प्रशासन को नागवार गुज़रा। ट्रंप ने इसे “भ्रामक और फर्जी” बताया, और कहा कि कनाडा ने रीगन के शब्दों का “दुरुपयोग” किया है। इसके तुरंत बाद उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में घोषणा की— “कनाडा के इस गंभीर व्यवहार के बाद सभी व्यापार वार्ताएँ समाप्त की जाती हैं।” ट्रंप ने न केवल विज्ञापन को “डर्टी प्ले” कहा, बल्कि सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि वह “और भी सख़्ती से खेल सकते हैं।” व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने इसे “करदाताओं के पैसे से चलाया गया राजनीतिक प्रोपेगेंडा” बताते हुए कहा कि कनाडाई अधिकारी “सार्थक वार्ताओं की जगह खेल खेल रहे हैं।”


रीगन फाउंडेशन ने भी इस विज्ञापन की निंदा की और कहा कि ओंटारियो सरकार ने न तो अनुमति ली और न ही यह सुनिश्चित किया कि रीगन के विचारों का सही प्रतिनिधित्व हो। संस्था ने कानूनी कार्रवाई पर विचार करने की बात कही।


हालाँकि, ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड ने अपने रुख़ पर कायम रहते हुए कहा कि “हमने अमेरिकी जनता तक अपनी बात पहुँचाने का लक्ष्य हासिल कर लिया है और अब वार्ता को पुनः शुरू करने के लिए अभियान को अस्थायी रूप से रोक रहे हैं।” उन्होंने यह भी पुष्टि की कि विज्ञापन वर्ल्ड सीरीज़ के पहले दो मैचों के दौरान प्रसारित होते रहेंगे— जो दर्शाता है कि कनाडा अपने संदेश को अमेरिकी जनमानस तक पहुँचाने के लिए कितनी गंभीरता से प्रयासरत है।


उधर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि उनका देश अब अमेरिकी बाजार पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए तैयार है और गैर-अमेरिकी देशों को निर्यात दोगुना करने का लक्ष्य रखता है। उन्होंने स्वीकार किया कि “अमेरिका की व्यापार नीति 1980 के दशक की तुलना में पूरी तरह बदल चुकी है; हमें अब यह समझना होगा कि हम क्या नियंत्रित कर सकते हैं और क्या नहीं।” कार्नी के बयान का अर्थ स्पष्ट है कि कनाडा अब ट्रंप के “अमेरिका फर्स्ट” युग में अपने लिए वैकल्पिक आर्थिक रास्ते तलाशना चाहता है। एल्युमिनियम, स्टील, ऑटोमोबाइल और लकड़ी जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी टैरिफ़ के असर से कनाडाई उद्योग पहले से ही दबाव में हैं।


इस पूरे विवाद की दिलचस्प बात यह है कि इसमें दो अमेरिकी राष्ट्रपति— रीगन और ट्रंप की आर्थिक सोच का प्रतीकात्मक टकराव दिखता है। रीगन “फ्री ट्रेड” और “ग्लोबल ओपन मार्केट्स” के पक्षधर थे। उन्होंने 1980 के दशक में जापान के खिलाफ भी टैरिफ लगाने से परहेज़ किया था। दूसरी ओर, ट्रंप का आर्थिक राष्ट्रवाद संरक्षणवाद (Protectionism) पर आधारित है— यानी आयात पर ऊँचे शुल्क लगाकर घरेलू उद्योगों की रक्षा करना।


डग फोर्ड का यह कहना कि “रीगन रिपब्लिकन को ‘MAGA’ ग्रुप से जीतना चाहिए”, वास्तव में अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी के भीतर चल रहे वैचारिक विभाजन की ओर संकेत है। यह बहस अब केवल अमेरिका की नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी विश्व की आर्थिक दिशा को प्रभावित कर रही है।


भारत के संदर्भ में संकेत देखें तो इस घटना से कई सबक मिलते हैं। पहला, यह बताता है कि ट्रंप का संरक्षणवादी रुख किसी एक देश तक सीमित नहीं है; वह हर साझेदार से “टैरिफ संतुलन” की माँग करते हैं— जैसा कि भारत के साथ भी उन्होंने 2020 में किया था। दूसरा, यह विवाद यह भी दिखाता है कि व्यापार नीति अब महज़ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश का माध्यम बन चुकी है। कनाडा ने विज्ञापन के ज़रिए अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने की कोशिश की, और ट्रंप ने इसे “राष्ट्रवादी आघात” के रूप में लिया। आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति में इस तरह के “संचार आधारित आर्थिक संघर्ष” आम हो सकते हैं।


तीसरा, भारत को यह समझना होगा कि जब अमेरिका अपने सबसे करीबी सहयोगियों (जैसे कनाडा) पर भी टैरिफ़ लगाता है, तो वह किसी भी राष्ट्र के साथ अपने आर्थिक हितों पर समझौता करने को तैयार नहीं है। ऐसे में नई दिल्ली को अपने व्यापारिक गठबंधनों को विविध बनाना होगा— विशेषकर यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के साथ।


बहरहाल, कनाडा और अमेरिका के बीच यह विवाद भले ही किसी विज्ञापन से शुरू हुआ हो, लेकिन यह वैश्विक आर्थिक राजनीति में बढ़ते “भावनात्मक राष्ट्रवाद” की झलक है। अब व्यापार समझौतों का निर्धारण केवल संख्याओं से नहीं, बल्कि राजनीतिक भावनाओं और जनमत से होगा। ट्रंप का यह कहना कि “मैं उनसे ज़्यादा गंदा खेल सकता हूँ”, बताता है कि आने वाले महीनों में उत्तर अमेरिकी व्यापार वार्ताएँ और भी कठिन होंगी। कुल मिलाकर देखें तो यह विवाद सिर्फ़ दो देशों के बीच का आर्थिक टकराव नहीं, बल्कि उस व्यापक युग का प्रतीक है जिसमें व्यापार, प्रचार और राजनीति— तीनों एक-दूसरे से गुँथ चुके हैं। और यही वह परिदृश्य है, जिसमें भारत जैसे देशों को अपनी आर्थिक नीति को लचीला, व्यावहारिक और संतुलित बनाकर चलना होगा।


-नीरज कुमार दुबे

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