By नीरज कुमार दुबे | Sep 29, 2026
अमेरिका और चीन के बीच रिश्तों में सुधार के तमाम दावों के बीच वॉशिंगटन से निकले विरोधाभासी बयानों ने एक बार फिर अमेरिकी नीति की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, अमेरिकी राजदूत डेविड पर्ड्यू ने दावा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से पूछा था कि क्या चीन अमेरिकी हथियार खरीदना चाहेगा? यह बयान सामने आते ही ताइवान आश्चर्यचकित रह गया और खुद अमेरिका में इस पर सवाल उठने लगे। विवाद बढ़ता देख ट्रंप खुद सामने आये और अपने राजदूत के दावे को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं की। अमेरिकी विदेश विभाग ने भी साफ कर दिया कि चीन को अमेरिकी हथियार बेचने का न तो कोई प्रस्ताव है और न ही कोई योजना, क्योंकि अमेरिकी कानून ऐसी बिक्री पर रोक लगाता है।
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देखा जाये तो चीन को अमेरिकी हथियार बेचने की बात सामान्य व्यापारिक प्रस्ताव नहीं हो सकती। अमेरिका और चीन दशकों से रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं और ताइवान इस प्रतिद्वंद्विता का सबसे विवादित केंद्र है। ऐसे में यदि वॉशिंगटन वास्तव में बीजिंग को हथियार बेचने की पेशकश करे, तो यह अमेरिका की दशकों पुरानी रणनीतिक व्यवस्था में भारी बदलाव होगा। हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने फिलहाल ऐसी किसी नीति से साफ दूरी बना ली है। यहां सवाल यह भी है कि क्या ट्रंप और शी की मुलाकात के बाद अमेरिका-चीन संबंध वास्तव में सुधरे हैं? देखा जाये तो इस प्रश्न का जवाब सीधा नहीं है।
दोनों नेताओं के बीच बातचीत और उच्चस्तरीय संपर्क जरूर बढ़े हैं, लेकिन ताइवान, सैन्य शक्ति, प्रौद्योगिकी, व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मूलभूत विवाद जस के तस हैं। ट्रंप-शी मुलाकात से तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश दिखाई देती है, पर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा खत्म होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। चीन ने लगातार अमेरिका से ताइवान को हथियारों की बिक्री रोकने की मांग की है, जबकि वॉशिंगटन की आधिकारिक नीति अभी भी ताइवान की आत्मरक्षा क्षमता बनाए रखने की है।
यही वजह है कि ताइवान की चिंता भी खत्म नहीं हुई। ताइवान के रक्षा मंत्री वेलिंगटन कू ने आज कहा कि ट्रंप-शी बैठक के बाद ताइवान को अमेरिका की ओर से बार-बार आश्वासन मिला है कि ताइवान के प्रति अमेरिकी नीति में बदलाव नहीं हुआ है। उन्होंने यह भी बताया कि हथियारों की बिक्री को लेकर अमेरिका के साथ लगातार बातचीत जारी है और फिलहाल नीति में बदलाव की कोई सूचना ताइवान को नहीं मिली है।
देखा जाये तो यहां अमेरिका की रणनीतिक मजबूरी साफ दिखाई देती है। एक तरफ वह बीजिंग के साथ संबंधों को स्थिर रखना चाहता है, दूसरी तरफ ताइवान को सैन्य रूप से कमजोर छोड़ना उसके लिए रणनीतिक जोखिम है। 1979 के ताइवान संबंध अधिनियम के तहत अमेरिका ताइवान को अपनी आत्मरक्षा की क्षमता बनाए रखने के लिए रक्षा सामग्री और सेवाएं उपलब्ध कराने की नीति पर कायम है।
सबसे बड़ा उदाहरण ताइवान के 66 F-16V लड़ाकू विमानों का है। वर्ष 2019 में दिया गया यह ऑर्डर अभी तक पूरी तरह पूरा नहीं हुआ है। ताइवान के अनुसार उत्पादन अब उस चरण तक पहुंच चुका है जहां विमानों की आपूर्ति संभव है और शुरुआती दो विमान हवाई में बताए जा रहे हैं। देरी के कारण क्षतिपूर्ति संबंधी व्यवस्थाओं पर भी बातचीत चल रही है।
सामरिक दृष्टि से F-16V केवल विमान नहीं हैं। इनका उद्देश्य ताइवान की वायु-रक्षा क्षमता को मजबूत करना और चीनी वायुसेना की बढ़ती शक्ति का मुकाबला करना है। खासकर चीन के जे-20 जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों के सामने ताइवान के लिए आधुनिक सेंसर, रडार और हथियार प्रणालियों का महत्व बढ़ जाता है।
दूसरी तरफ चीन ताइवान को अपनी संप्रभुता से जुड़ा मूल मुद्दा मानता है और अमेरिकी हथियारों की बिक्री को सीधे अपने सुरक्षा हितों के खिलाफ देखता है। ट्रंप-शी बैठक से पहले भी बीजिंग ने संकेत दिया था कि ताइवान को हथियारों की नई बिक्री संबंधों पर गंभीर असर डाल सकती है।
यहीं से ट्रंप की 'सौदेबाजी वाली कूटनीति' की सीमा भी सामने आती है। मई में ट्रंप ने ताइवान के लिए करीब 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को रोककर रखने की बात कही थी और हथियारों को चीन के साथ बातचीत में एक 'बातचीत का साधन' बताया था। इसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने ताइवान को आश्वस्त किया था कि दीर्घकालीन अमेरिकी नीति नहीं बदली है।
यानी वॉशिंगटन का संदेश एकरूप नहीं है। राजदूत कहते हैं कुछ और, राष्ट्रपति कुछ और संकेत देते हैं और विदेश विभाग बाद में स्थिति संभालने के लिए स्पष्टीकरण देता है। यही वह जगह है जहां ट्रंप के लगातार बदलते या परस्पर विरोधी सार्वजनिक बयानों पर विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठते हैं।
हालांकि एक बात स्पष्ट है कि ट्रंप और शी की मुलाकात ने अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा को समाप्त नहीं किया है। उसने संवाद की गुंजाइश बढ़ाई है, लेकिन ताइवान का प्रश्न अभी भी दोनों शक्तियों के बीच सबसे बड़ा रणनीतिक विवाद है। अमेरिका के लिए चुनौती यह है कि वह चीन से टकराव को नियंत्रित रखते हुए ताइवान की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को कैसे कायम रखता है। चीन के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिकी सैन्य समर्थन को रोकने की कोशिश करते हुए ताइवान पर दबाव बनाए रखे, लेकिन सीधे सैन्य टकराव की स्थिति से बचे।
इसलिए फिलहाल इसे अमेरिका-चीन संबंधों में स्थायी सुधार कहना जल्दबाजी होगी। व्यापार और कूटनीति में बातचीत हो सकती है, लेकिन ताइवान के मोर्चे पर रणनीतिक मुकाबला अभी भी पूरी ताकत से जारी है। और अमेरिकी नेतृत्व के परस्पर विरोधी बयान इस मुकाबले को कम करने की बजाय वॉशिंगटन की नीति को लेकर नए सवाल जरूर पैदा कर रहे हैं।