By अभिनय आकाश | Oct 01, 2026
दिल्ली की एक अदालत ने 1.15 करोड़ रुपये के कथित साइबर फ्रॉड मामले में गिरफ्तार दो आरोपियों को रेगुलर ज़मानत दे दी है। अदालत ने कहा कि उन्हें हिरासत में रखने का कोई फ़ायदा नहीं है और यह भी देखा कि उनकी गिरफ़्तारी की वजह उन्हें उस भाषा में नहीं बताई गई थी जिसे वे समझते और जानते हैं। एडिशनल सेशंस जज सौरभ प्रताप सिंह लालर ने योगेशभाई और अमित गोहिल की ज़मानत अर्ज़ी मंज़ूर कर ली। इन दोनों को 2 सितंबर को गुजरात के भावनगर में गिरफ़्तार किया गया था। यह गिरफ़्तारी नई दिल्ली के स्पेशल सेल पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR के सिलसिले में हुई थी, जिसमें भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 308, 318(4), 319 और 340 के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया था। आरोपियों की ओर से वकील सैयद कामरान अली और यूसुफ़ खान पेश हुए। अदालत ने आदेश दिया कि दोनों आवेदकों को 50,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की एक ज़मानत (श्योरिटी) भरने पर रेगुलर ज़मानत पर रिहा किया जाए, साथ ही कुछ शर्तें भी लगाई गईं।
कोर्ट ने गिरफ्तारी वाले दिन ही 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस के मामले पर भी विचार किया। कोर्ट ने 'अमनदीप सिंह जौहर बनाम दिल्ली राज्य' मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए कहा कि इस प्रावधान में नोटिस मिलने और गिरफ्तारी के बीच कोई तय न्यूनतम समय-सीमा नहीं बताई गई है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी माना कि साइबर और डिजिटल धोखाधड़ी की जांच में मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में मौजूद सबूत शामिल हो सकते हैं, जिन्हें डिलीट या दूर से ही मिटाया (रिमोटली वाइप) जा सकता है। इसलिए, उचित मामलों में कस्टडी में पूछताछ ज़रूरी हो सकती है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को यह देखना होगा कि क्या मामले के तथ्यों के आधार पर ऐसी कस्टडी वास्तव में ज़रूरी है।