उद्धव ठाकरे ‘राम नगरी’ के रास्ते तलाश रहे 2024 की संभावनाओं के द्वार

By अभिनय आकाश | Jan 22, 2020

साल 1992 की बात है जब रथ यात्रा की राजनीति अपने उफान पर थी और कथाकथित बाबरी मस्जिद के विध्वंस की पटकथा लिखी गई थी। तब उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए परोक्ष रुप से कोई सामने नहीं आ रहा था। तभी बाल ठाकरे के एक बयान ने उन्हे हिंदुत्व का पुरोधा बनाकर खड़ा कर दिया। बाल ठाकरे ने कहा था कि अगर बाबरी गिराने वाले शिवसैनिक हैं, तो मुझे इसका अभिमान है। हिन्दुत्व की राजनीति में भाजपा को पछाड़ने की होड़ में लगी शिवसेना की राजनीति‍ में सटीक टाईमिंग का हमेशा से बड़ा हाथ रहा है। चाहे 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने पर बाल ठाकरे द्वारा उसकी जिम्‍मेदारी लेना हो, या फिर लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उद्धव ठाकरे का 'चलो अयोध्‍या' का नारा लगाना हो या विधानसभा चुनाव से पहले मंदिर बनाने की प्रतिबद्ध्ता जताना हो।

महाराष्ट्र की धरती से कभी-कभी यूपी की ओर अवतरित होने वाले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे बीते बरस 2 बार अयोध्या का दौरा कर चुके हैं। लोकसभा चुनाव से पहले मंदिर निर्माण के मुद्दे पर मोदी सरकार को जी भरकर कोसने और 'पहले मंदिर फिर सरकार' का नारा बुलंद करने वाले ठाकरे एक बार फिर राम लला के द्वार पहुंचे और मंदिर बनकर रहेगा की बात कह गए। महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने के बाद उद्धव ठाकरे ने एक बार फिर से 'चलो अयोध्या' का नारा दिया है। सरकार के 100 दिन पूरे होने पर सीएम उद्धव ठाकरे अयोध्या जाएंगे। बता दें कि मार्च के दूसरे हफ्ते में ठाकरे सरकार के 100 दिन पूरे हो रहें हैं। ऐसे में शिवसेना का कहना हैं कि 'अपने पिछले दौरे में उद्धव ठाकरे ने वादा किया था कि महाराष्ट्र में सरकार बनने के बाद दोबारा अयोध्या आएंगे लेकिन तब किसी को नहीं पता था कि वह सीएम बनकर आएंगे। वह अपना वादा पूरा करने के लिए अयोध्या आ रहें हैं।

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इन सब के बीच अयोध्या मुद्दा राजनीति में खासा असर डालता रहा है। उद्धव खुद को हिंदुत्व के आइकन के रुप में स्थापित करने की कोशिश में भी लगे हैं। भले उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार का मुख्यमंत्री बने 2 महीने भी न हुए हों, लेकिन राजनीति में उम्मीदें कब आगे बढ़ने लगे इसका अंदाजा लगाना बेहद ही कठिन है। एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाने के बाद उद्धव का उत्साह और जज्बा सातवें आसमान पर है। उद्धव ठाकरे को यह उम्मीद बंधती दिख रही है कि 2024 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का चेहरा हो सकते हैं। इसके पीछे उन्होंने अपनी ब्रैंडिंग पर खास ध्यान देना शुरू कर दिया है। इमेज बनाने वाली कुछ कंपनियों के साथ उनकी इस सिलसिले में बातचीत भी हुई है।

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मोदी के खिलाफ उद्धव ठाकरे की संभावना का आधार यह मान्यता है कि राहुल गांधी 2024 में भी मोदी का दमदार विकल्प नहीं माने जा सकेंगे। रही बात अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं की, तो उनमें ज्यादातर चेहरे ऐसे हैं जिनके ऊपर मुस्लिम पक्षधरता की छाप लगी हुई है और मोदी के खिलाफ किसी ऐसे चेहरे को उस मात्रा में स्वीकार्यता नहीं मिल सकती जो जरा भी मुस्लिम पक्षधर लगे। शिवसेना के उद्धव अभी तक हार्डकोर हिंदूवादी चेहरा माने जाते रहे हैं। ऐसे में उन पर मुस्लमानों का हिमायती या तुष्टीकरण की राजनीति करने और पाकिस्तान समर्थक होने जैसे आरोप भी लगाना आसान नहीं है।

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शिवसेना के पुराने रिकार्ड को देखते हुए हिंदूवादी एजेंडे पर राष्ट्रीय स्तर पर उनके सामने पहचान का भी कोई संकट नहीं है। जहां तक गैर बीजेपी वोटर्स के बीच अपनी स्वीकार्यता दिखाने की बात है तो महाराष्ट्र की गठबंधन सरकार के मुखिया के तौर पर वह इस काम को अंजाम देने में लगे ही हैं। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस अगर महाराष्ट्र में उनकी सरकार को साझा कर रही है तो विपक्ष में उन्हें अपनी निष्ठा साबित करने की भी जरूरत नहीं होगी। ऐसे में मिशन अयोध्या के जरिए एक तरफ जहां वो अपने हिंदूवादी छवि को और निखारने की कवायद में हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस और एनसीपी के साथ खुद को सॉफ्ट हिंदुत्व वाला नेता बनाने में भी लगे है। ऐसे में आने वाले वक्त में देखना होगा की उद्धव की ये दोहरी भूमिका वक्त के साथ क्या रंग लाती है और राजनीति में इसके क्या परिणाम होते हैं। 

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