यूक्रेन तो अमेरिका-इजरायल से भी बड़ा खिलाड़ी निकला, ईरान की मार से कतर, यूएई और सऊदी अरब को बचाने भेजे अपने मिलिट्री एक्सपर्ट्स

By अभिनय आकाश | Mar 11, 2026

एक ऐसा शब्द जो दुनिया की तस्वीर बदल देता है। सुपर पावर जब भी यह शब्द सुनते हैं, तो जहन में अमेरिका, रूस, चीन का नाम आता है। लेकिन अब ऐसी कहानी जो दुनिया के सबसे बड़े सैन्य विशेषज्ञों को भी चौंका रही है। वो देश जो महज कुछ साल पहले तक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। आज उसी देश को दुनिया का अगला मिलिट्री सुपर पावर कहा जा रहा है। वो देश यूक्रेन है। दरअसल, मध्य-पूर्व में दशकों बाद अमेरिकी सैन्य ताकत की सबसे बड़ी तैनाती के बीच अमेरिका-ईरान टकराव का एक दिलचस्प और थोड़ा विडंबनापूर्ण पहलू सामने आया है। इस संघर्ष की शुरुआत में अमेरिका ने चुपचाप अपना लो-कॉस्ट अनक्रूड कॉम्बैट अटैक सिस्टम (LUCAS) मैदान में उतारा। एक ऐसा एक-तरफ़ा हमला करने वाला ड्रोन, जिसकी अवधारणा उसी सस्ती ड्रोन तकनीक से मिलती-जुलती है, जिसे ईरान कई दशकों से विकसित करता रहा है। ईरान के ‘शाहेद’ ड्रोन आज उसके सबसे अहम हवाई हथियारों में गिने जाते हैं। माना जाता है कि इनकी तकनीक की प्रेरणा कभी इज़राइल में विकसित ड्रोन प्रणालियों से मिली थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सीमित संसाधनों ने ईरान को मजबूर किया कि वह इन्हीं ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों को अपने स्वदेशी सैन्य कार्यक्रम का केंद्र बना दे। इनका मकसद पश्चिमी रक्षा प्रणालियों को सीधे चुनौती देकर हराना नहीं, बल्कि लगातार हमलों के जरिए उन्हें थका देना और उनके संसाधन खत्म करना है। इसी श्रृंखला का शुरुआती मॉडल शाहेद-131 था, जिसने सितंबर 2019 में सऊदी अरब की एक तेल रिफाइनरी पर हुए हमले के दौरान पहली बार बड़े पैमाने पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और तभी से दुनिया को यह अहसास होने लगा कि सस्ते लेकिन घातक ड्रोन युद्ध की दिशा बदल सकते हैं। जो शुरुआत में केवल एक सैन्य मजबूरी का उपाय था, वही समय के साथ एक वैश्विक हथियार बन गया। सबसे पहले ईरान के क्षेत्रीय सहयोगियों जैसे यमन में हौती विद्रोहियों ने इन ड्रोन का इस्तेमाल किया और बाद में रूस ने भी यूक्रेन युद्ध में इन्हें बड़े पैमाने पर अपनाया। इसी वजह से यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने ईरान को पुतिन का सहयोगी तक कहा, क्योंकि ईरान ने न सिर्फ रूस को शाहेद ड्रोन दिए बल्कि उन्हें बनाने की तकनीक भी उपलब्ध कराई।

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अब 'सुपर पावर' की रक्षा करेगा यूक्रेन?

ब्रिटानिका के अनुसार सुपर पावर वो राष्ट्र है जिसे दुनिया की मंच पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और जिसके सहयोग के बिना दुनिया की कोई भी बड़ी समस्या हल नहीं हो सकती। इतिहास में देखें तो अब तक केवल दो देशों को निर्विवाद सुपर पावर का दर्जा मिला है। अमेरिका और सोवियत संघ। आज भले ही रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को कुछ मापदंडों पर सुपर पावर कहा जाए लेकिन अमेरिका अभी भी सबसे ऊपर है। लेकिन रूस से बीते् चार बरस से जंग ले रहा छोटा सा मुल्क यूक्रेन अभ चर्चाओं में है। यूक्रेन का कान्फिंडेंस कहे या सुपरपावर बनने की दिशा में कदम की अब उसने  जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों की रक्षा के लिए ड्रोन विशेषज्ञों और इंटरसेप्टर ड्रोन की एक विशेष टीम भेजी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि अमेरिका ने हाल ही में सुरक्षा सहायता के लिए अनुरोध किया था। उन्होंने बताया कि जैसे ही अमेरिका की ओर से मदद मांगी गई, यूक्रेन ने तुरंत सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और अपने विशेषज्ञों को भेजने का फैसला किया।

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यूक्रेन के राष्ट्रपति ने क्या कहा?

राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने पत्रकारों से कहा कि वे ईरानी ड्रोन को मार गिराने की विशेषज्ञता साझा करेंगे। यूक्रेन को रूस द्वारा दागे जाने वाले ईरानी डिज़ाइन के शाहेद हमलावर ड्रोनों के रात्रिकालीन हमलों का सामना करना पड़ता है। रूस तेहरान का सहयोगी है। यूक्रेन का कहना है कि इन हमलों को नाकाम करने में यूक्रेन के पास अद्वितीय विशेषज्ञता है। एएफपी समेत पत्रकारों को भेजे गए एक ऑडियो संदेश में ज़ेलेंस्की ने कहा कि समझौतों के अनुसार, हमने जिन पहले तीन देशों को ये ड्रोन भेजे हैं, वे हैं कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब। उन्होंने आगे कहा कि बड़े पैमाने पर शाहेद हमलों को मार गिराने के मामले में, आज केवल यूक्रेनी अनुभव ही वास्तव में मददगार साबित हो सकता है।" उनका इशारा रूस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ईरानी डिज़ाइन के ड्रोनों की ओर था। उनके संचार सलाहकार ने पत्रकारों को यह भी बताया कि यूक्रेनी विशेषज्ञों को जॉर्डन में एक अमेरिकी सैन्य अड्डे पर तैनात किया गया है, हालांकि उन्होंने इसके बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी। ज़ेलेंस्की ने खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों से यूक्रेनी ड्रोन इंटरसेप्टर के बदले में बेहद जरूरी हवाई रक्षा मिसाइलें सौंपने का आह्वान किया है।

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मिलिट्री सुपर पावर के 5 मुख्य मापदंड

पहला: ग्लोबल पावर प्रोजेक्शन है। यानी दुनिया के किसी भी कोने में अपनी सैन्य ताकत तैनात करने की क्षमता। अमेरिका के पास दुनिया भर में 800 से ज्यादा सैन्य अड्डे हैं। 11 परमाणु संचालित विमान वाहक पोत हैं और हजारों विमान व टैंकर हैं। अब यूक्रेन की बात करें तो यह वो देश है जिसकी नौसेना को 2014 में क्रीमिया पर कब्जे और 2022 में रूसी आक्रमण के दौरान लगभग नष्ट कर दिया गया था। लेकिन इसके बावजूद यूक्रेन के स्पेशल फोर्सेस सूडान, माली और ईरान तक सक्रिय हैं। यूक्रेन की मिलिट्री इंटेलिजेंस के प्रमुख किरिलो बुडानोव के शब्दों में हमारा मिशन है रूसी युद्ध अपराधियों को दुनिया में कहीं भी नष्ट करना। सूडान के गृह युद्ध में यूक्रेनी स्पेशल फोर्सेस ने रैपिड सपोर्ट फोर्सेस के खिलाफ ड्रोन स्ट्राइक और जमीनी अभियान चलाए हैं। रूस के वागनर ग्रुप के भारी के सैनिकों के खिलाफ भी यूक्रेन ने मोर्चा खोला है। यह है यूक्रेन का ग्लोबल फुटप्रिंट और यह दिन-बदिन बढ़ता जा रहा है। लेकिन जहां यूक्रेन ने समुद्र में सबसे बड़ा धमाका किया है।

समुद्री युद्ध: 2022 में जब रूस ने हमला किया तब यूक्रेन के पास एक छोटी कमजोर नौसेना थी। रूस का ब्लैक सी फ्लट सैकड़ों युद्ध पोतों से लैस था। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यूक्रेन इसे चुनौती दे सकता है। लेकिन यूक्रेन ने एक ऐसा हथियार तैयार किया जिसने दुनिया के सैन्य इतिहास की दिशा बदल दी। नेवल ड्रोंस समुद्री ड्रोन। मगरा V5 यह एक 18 फुट लंबा कार्बन फाइबर का बना समुद्री ड्रोन है। इसकी कीमत महज 2.5 से 3 लाख है। लेकिन यह उन युद्धपोतों को नष्ट करने में सक्षम है जिनकी कीमत अरबों डॉलर है। मई 2023 में तीन मगरा V5 ड्रोनों ने रूस के 4000 टन के इवान खुर्स जासूसी जहाज पर हमला किया जो यूक्रेन से सैकड़ों मील दूर था। फरवरी 2024 में मगरा V5 ने इतिहास रच दिया। यह दुनिया का पहला नेवल ड्रोन बना जिसने दुश्मन के युद्धपोध को डुबोया। रूस का इवानोवेट्स गाइडेड मिसाइल कारवेबेट और सेज़ार कुनिकोफ लैंडिंग शिप दोनों को इसने तबाह किया। एक साल में मगरा V5 ने आठ रूसी युद्धपोत नष्ट किए। छह को गंभीर नुकसान पहुंचाया। कुल नुकसान $50 करोड़ डॉलर से ज्यादा। 2025 के अंत तक कम से कम 20 रूसी युद्धपोत इसका शिकार बन चुके थे। 

समुद्र के बाद आसमान: एफपीवी का कामकाजे ड्रोंस ने जमीनी युद्ध की पूरी तस्वीर बदल दी। टैंक कॉलम्स जो कभी युद्ध में अजय माने जाते थे। अब यूक्रेनी एफपीवी ड्रोंस के सामने असहाय है।

ऑपरेशन स्पाइडर वेब:  यूक्रेन ने एक साथ पांच रूसी हवाई अड्डों पर हमला किया। साइबेरिया जितनी दूर तक।

 नष्ट हुए रूस के स्ट्रेटेजिक लॉन्ग रेंज बमबर्स, ट्रांसपोर्ट  और एक इवक्स टाइप रिकनेसेंस एयरक्राफ्ट: यह हमला हुआ सस्ते क्वाडकोप्टर ड्रोंस से। इन ड्रोनों के पुरजे रूस में चुपके से स्मगल किए गए। वहां उन्हें असेंबल किया गया। 

अमेरिका ने गुप्त रूप से शाहेद-136 ड्रोन की तकनीक को रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए समझा

युद्ध के मैदान में सस्ते लेकिन बड़े पैमाने पर किए गए ड्रोन हमलों की सफलता से अमेरिका भी चौंक गया। इसके बाद अमेरिका ने गुप्त रूप से शाहेद-136 ड्रोन को हासिल कर उनका तकनीकी विश्लेषण करने की कोशिश की। इन नमूनों को रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए समझा गया और उनके आधार पर प्रशिक्षण के लिए प्रतिरूप तैयार किए गए, जिन्हें बाद में विकसित करके मौजूदा लुकास (LUCAS) ड्रोन बेड़े का रूप दिया गया। इस कार्यक्रम की रफ्तार भी बेहद तेज रही। लॉन्च के महज़ पांच महीनों के भीतर पेंटागन ने मध्य-पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों को लुकास ड्रोन से लैस कर दिया। यहां तक कि अरब सागर के इलाके में एक युद्धपोत से इन्हें समुद्र से लॉन्च करने की क्षमता का भी सफल परीक्षण किया गया।

मिशन मादुरो में  LUCAS ड्रोन का इस्तेमाल

28 फरवरी को अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने पुष्टि की कि LUCAS ड्रोन का पहली बार वास्तविक युद्ध में इस्तेमाल किया गया। ये ड्रोन जमीन से लॉन्च किए गए थे और इन्हें “स्कॉर्पियन स्ट्राइक” (Scorpion Strike) नामक अमेरिकी टास्क फोर्स ने संचालित किया, जिसे दिसंबर 2025 में खास तौर पर ईरान की ड्रोन रणनीति का जवाब देने के लिए बनाया गया था। माना जाता है कि इन LUCAS ड्रोन का इस्तेमाल 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला की राजधानी कराकस में भी किया गया था, जहां अमेरिकी मिशन का लक्ष्य देश के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ना था। लेकिन ईरान के खिलाफ इनका आधिकारिक युद्धक इस्तेमाल एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। असल में यह सिर्फ एक नया हथियार नहीं, बल्कि अमेरिकी हवाई युद्ध की रणनीति में बदलाव का प्रतीक है। अब महंगे और सीमित हथियारों पर निर्भर रहने की बजाय अमेरिका भी अपेक्षाकृत सस्ते, बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जा सकने वाले ड्रोन की ओर बढ़ रहा है। ठीक उसी रणनीति की तरह जिसे ईरान लंबे समय से अपनाता रहा है।

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